Naulakhi Kothi
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प्रस्तुत उपन्यास "नौलखी कोठी" हिन्दुस्तान में अग्रेज़ी सरकार के शासन और उसके बाद के दौर में बदलते सामाजिक हालात की कहानी है। इंग्लैंड में आठ लम्बे साल गुज़ारने के बाद विलियम विभाजन-पूर्व पंजाब में जलालाबाद के नवनियुक्त सहायक आयुक्त के रूप में हिंदुस्तान लौट आता है। वो अपने दादा द्वारा बनवाए गए आलीशान बंगले नौलखी कोठी में अपने 'घर' में लौटने का सपना देखता है, लेकिन घटनाओं का एक अपरिवर्तनीय मोड़ उसका इंतजार कर रहा है, जो न केवल उसकी क़िस्मत बदल देता है, बल्कि ज़मीन की क़िस्मत भी हमेशा के लिए बदल देता है। अली अकबर नातिक़ का ये उपन्यास "नौलखी कोठी" उस समय की युगचेतना का व्यावहारिक चित्रण है। ये कहानी विभाजन से पहले के वर्षों में शुरू होती है और अस्सी के दशक तक चलती है।
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प्रस्तुत उपन्यास "नौलखी कोठी" हिन्दुस्तान में अग्रेज़ी सरकार के शासन और उसके बाद के दौर में बदलते सामाजिक हालात की कहानी है। इंग्लैंड में आठ लम्बे साल गुज़ारने के बाद विलियम विभाजन-पूर्व पंजाब में जलालाबाद के नवनियुक्त सहायक आयुक्त के रूप में हिंदुस्तान लौट आता है। वो अपने दादा द्वारा बनवाए गए आलीशान बंगले नौलखी कोठी में अपने 'घर' में लौटने का सपना देखता है, लेकिन घटनाओं का एक अपरिवर्तनीय मोड़ उसका इंतजार कर रहा है, जो न केवल उसकी क़िस्मत बदल देता है, बल्कि ज़मीन की क़िस्मत भी हमेशा के लिए बदल देता है। अली अकबर नातिक़ का ये उपन्यास "नौलखी कोठी" उस समय की युगचेतना का व्यावहारिक चित्रण है। ये कहानी विभाजन से पहले के वर्षों में शुरू होती है और अस्सी के दशक तक चलती है।
Book Details
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ISBN9789394494350
-
Pages584
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Avg Reading Time19 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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मैं पागलों की तरह उसे देख रही थी। उसके लब्ज़ कानों में गूँज रहे थे और जबान सच में मुँह में चिपक गई थी। शादी को एक दिन भी पूरा नहीं हुआ था और झुबेर से ऐसा कुछ सुनने को मिलेगा, मैं सोच भी नहीं सकती थी। मुझे तो यकीन था कि झुबेर कभी भी मेरा दिल नहीं दुखाएगा। मुझे जैसे उसने झिंझोड़कर रख दिया। उसकी बातें बरदाश्त के बाहर थीं। मैं चुपचाप सिर झुकाकर आँसू बहाती रही। शराफत का नकाब पहने हुए झुबेर का असली चेहरा मेरे सामने आ रहा था। वह मेरे घरवालों को, धर्म को, समाज को गालियाँ दे रहा था, रुक ही नहीं रहा था। वह ऐसा क्यों कर रहा था? उस वत की उसकी नजर एकदम सूखी और ठंडी थी। होंठों के एक कोने से उसका हँसना, गुस्से से जलने वाली आँखें मेरे दिल में खंजर की तरह चुभ रही थीं। सुबह पाँच बजे वह चुप हो गया और पेट के बल गहरी नींद में सो गया। शादी के पहले का झुबेर, मेरी आँखों के आँसू देखना भी जिसे पसंद नहीं था, मुझे हमेशा हँसते देखना चाहता था, उम्र भर मुझे फूलों जैसा सँभालकर रखने का दावा करनेवाला या यह वही झुबेर है? —इसी उपन्यास से ——1—— झूठ, फरेब, धोखा, ढकोसला, झूठी संवेदना—यही है ‘लव जिहाद’। भोली-भाली लड़कियों को नाना युतियों से अपने झूठे प्रेमजाल में फाँसकर उनका भावनात्मक और शारीरिक शोषण ही है ‘लव जिहाद’। एक भूतभोगी की यथकथा है यह उपन्यास ‘लव जिहाद’।
Ameeri Rekha Ki Khoj Mein
- Author Name:
Vijay Kumar
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काफी सिर खपाने के बाद पिछले दिनों मुझे इस बारे में अंतिम सत्य पता लग ही गया। वह यह है कि अमीरी की रेखा मकान, गाड़ी, घड़ी, कपड़े या कलम से नहीं, शौचालय से तय होती है। हमारे देश के महान् ‘योजना आयोग’ के कार्यालय में दो शौचालयों की मरम्मत में 35 लाख रुपए खर्च कर दिए गए। जरा सोचिए, मरम्मत में इतने खर्च हुए, तो नए बनने में कितने होते होंगे? जब कुछ लोगों ने इस पर आपत्ति की, तो योजना आयोग के मुखिया श्री मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने इसे बिल्कुल ठीक बताया। मैं उनकी बात से सौ प्रतिशत सहमत हूँ। बहुत से विचारकों का अनुभव है कि यही एकमात्र ऐसी जगह है, जहाँ व्यक्ति बिल्कुल एकांत में कुछ देर बैठकर, शांत भाव से मौलिक चिंतन कर सकता है। कई लेखकों को कालजयी उपन्यासों के विचार यहीं बैठकर आए हैं। श्री अहलूवालिया और उनके परम मित्र मनमोहन सिंह की जिन योजनाओं से रुपया रसातल में जा रहा है, उसके बारे में चिंतन और मनन इतने आलीशान शौचालय में ही हो सकता है। —इसी संग्रह से ——1—— समाज की विषमताओं और विद्रूपताओं पर मारक प्रहार करके अंतरावलोकन करने का भाव जागृत करने वाले व्यंग्य। ये न केवल आपको हँसाएँगे-गुदगुदाएँगे, बल्कि आपके अंतर्मन को उद्वेलित कर मानवीय संवेदना को उभारेंगे।
Ajanta Ki Rajkumari
- Author Name:
Sourabh Sharma
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अजंता की गुफाओं ने भारत के क्लासिकल समाज को ज्यों का त्यों अपने भीतर सहेज लिया है। अजंता अपने भीतर आश्चर्य लोक है। अपने सुंदर समय की स्मृतियों को सहेजने का विचार जब राजपुरुषों के मन में आया होगा तो इस अद्भुत गैलरी का निर्माण हुआ होगा। इसका निर्माण भी उतना ही रहस्यमयी और रोचक होगा जितनी ये गुफाएं हैं। संभवतः राजा ने इसके निर्माण के लिए एक्सप्रेशन आफ इंटरेस्ट बुलवाया होगा। चित्रकारों का चुनाव किया होगा और चित्रों का भी। इतने गहरे भावों को सृजित कराने वाले आश्रयदाताओं की भावभूमि भी गहन होगी। इनकी कहानियों पर एक कथा रचने का प्रयास है अजंता की राजकुमारी।
Gaon Wala Angrezi School
- Author Name:
Pranjal Saxena
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गाँव वाला अंग्रेजी स्कूल एक ऐसी पुस्तक है जिसमें बच्चों से लेकर बड़ों सबके लिए कुछ न कुछ है। एक ऐसी किताब जिसमें कोई बकवास न हो, जिसमें कठिन वाला इतिहास न हो और जिसे पढ़कर कोई उदास न हो। कोई ऐसी किताब जिसे पढ़कर शिक्षा मिले और पता भी न चले कि कुछ सिखाया गया है। जिसे पढ़कर हँसी छूटे और कोई न रूठे। यह पुस्तक गाँव और शहर के बच्चों की सोच को एक पुल प्रदान करती है। हम लोग पिज्जा, बर्गर, टॉयज के लिए अपने पैरेंट्स से डिमांड पर डिमांड किए जाते हैं और न पूरी होने पर मुँह फुलाकर बैठ जाते हैं। लेकिन विलेज के बच्चों को तो कई बार लंच ही नहीं मिल पाता, लंच मिल जाए तो डिनर मिलेगा कि नहीं ये उन्हें नहीं पता। हमारे पेंसिल बॉक्स की जितनी कॉस्ट होती है उतनी कॉस्ट में यहाँ के बच्चे साल भर की स्कूल कॉपीज खरीद लेते हैं। हम ब्रांडेड नोट बुक्स की डिमांड करते हैं और प्रमोद जैसे बच्चों के पास तो स्लीपर्स तक नहीं हैं। जब हम दीपावली पर क्रैकर्स के लिए जिद कर रहे होते हैं उस समय हमसे भी छोटे बच्चे मिट्टी के दिये बना रहे होते हैं ताकि उन्हें बेचकर त्योहार पर तो एक ही दिन में लंच और डिनर दोनों कर सकें। प्रांजल सक्सेना
Secrets
- Author Name:
Sanjana Anand
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इंतकाम का फ़साना बयान करने, मौत के उस पार से वो लौट आया... आर्किड विला की लेखिका संजना आनंद की कलम से पैरानॉर्मल मर्डर मिस्ट्री पर आधारित रोंगटे खड़े कर देने वाला उपन्यास "सिक्रेट्स : पैरानॉर्मल मर्डर मिस्ट्री"
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Book
Naulakhi Kothi inhabits the psychological fault line of pre-Partition Punjab, where personal inheritance collides with the collapse of empire. William, the new Assistant Commissioner of Jalalabad, returns after eight years in England expecting to reclaim his grandfather's grand bungalow—the titular mansion that represents both colonial prestige and familial legacy. Instead, he encounters an "irreversible turn of events" that rewrites not only his own trajectory but the fate of the land itself. The novel's power lies in its dual focus: the intimate drama of a man caught between two worlds, and the seismic social transformations sweeping through late British India. Published by Rekhta Publications, this work captures the twilight of the Raj through the lens of architecture, ambition, and the fragility of belonging. It asks what happens when the symbols of power—grand bungalows, official titles, inherited privilege—become relics overnight, and how individuals navigate the wreckage of certainties they once took for granted.
यह उपन्यास पढ़ते समय मुझे किस तरह का अनुभव मिलेगा?
यह उपन्यास एक धीमी, विचारशील यात्रा है जो औपनिवेशिक भारत के अंतिम दिनों की मनोवैज्ञानिक उथल-पुथल को महसूस कराती है। नौलखी कोठी में विलियम का व्यक्तिगत संकट और विभाजन-पूर्व पंजाब के सामाजिक बदलाव एक साथ चलते हैं। यह उन पाठकों को संतुष्ट करेगा जो ऐतिहासिक विवरण, चरित्र की आंतरिक दुविधा, और उस समय की सराहना करते हैं जब पुरानी दुनिया नई दुनिया को रास्ता दे रही थी।
यह किताब किस तरह के पाठकों के लिए सबसे उपयुक्त है?
- जो पाठक ब्रिटिश राज के अंतिम चरण और विभाजन के सामाजिक प्रभावों में रुचि रखते हैं
- जो औपनिवेशिक विरासत, पहचान के द्वंद्व, और ऐतिहासिक परिवर्तन के व्यक्तिगत आयामों को समझना चाहते हैं
- जिन्हें धैर्यपूर्वक विकसित होने वाली कथाएँ और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद पसंद है
इस उपन्यास की विषयवस्तु का आज के भारतीय पाठकों के लिए क्या सांस्कृतिक या ऐतिहासिक महत्व है?
विभाजन-पूर्व पंजाब की यह कहानी आज भी प्रासंगिक है क्योंकि यह दिखाती है कि कैसे राजनीतिक उथल-पुथल व्यक्तिगत भाग्य को बदल देती है। नौलखी कोठी उस समय को पकड़ती है जब सत्ता के प्रतीक—भव्य बंगले, आधिकारिक उपाधियाँ—रातोंरात अप्रासंगिक हो गए। यह समकालीन भारत में पहचान, विरासत, और सामाजिक परिवर्तन के सवालों से जुड़ती है।
इस विषय पर इस लेखक का दृष्टिकोण क्या विशिष्ट बनाता है?
यह उपन्यास विभाजन की कहानी को एक ब्रिटिश-भारतीय अधिकारी विलियम की आंखों से देखता है, जो दो दुनियाओं के बीच फंसा है। जलालाबाद में नवनियुक्त सहायक आयुक्त के रूप में उसका संघर्ष—अपने दादा की विरासत को पुनः प्राप्त करने की इच्छा और साम्राज्य के पतन की वास्तविकता—एक अनोखा कोण प्रदान करता है। यह व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और ऐतिहासिक अपरिहार्यता के बीच की खाई को उजागर करता है।
यह उपन्यास पाठक के साथ भावनात्मक, बौद्धिक या सांस्कृतिक रूप से क्या छोड़ जाता है?
यह उपन्यास पाठक को विरासत की नाजुकता और इतिहास की अपरिवर्तनीय शक्ति की गहरी समझ देता है। नौलखी कोठी यह सवाल छोड़ जाती है कि जब हमारी निश्चितताएं ध्वस्त हो जाती हैं तो हम कौन होते हैं। यह औपनिवेशिक अतीत के दीर्घकालिक प्रभाव और उस व्यक्तिगत कीमत पर विचार करने को प्रेरित करती है जो सामूहिक परिवर्तन की मांग करती है।