Naulakhi Kothi
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प्रस्तुत उपन्यास "नौलखी कोठी" हिन्दुस्तान में अग्रेज़ी सरकार के शासन और उसके बाद के दौर में बदलते सामाजिक हालात की कहानी है। इंग्लैंड में आठ लम्बे साल गुज़ारने के बाद विलियम विभाजन-पूर्व पंजाब में जलालाबाद के नवनियुक्त सहायक आयुक्त के रूप में हिंदुस्तान लौट आता है। वो अपने दादा द्वारा बनवाए गए आलीशान बंगले नौलखी कोठी में अपने 'घर' में लौटने का सपना देखता है, लेकिन घटनाओं का एक अपरिवर्तनीय मोड़ उसका इंतजार कर रहा है, जो न केवल उसकी क़िस्मत बदल देता है, बल्कि ज़मीन की क़िस्मत भी हमेशा के लिए बदल देता है। अली अकबर नातिक़ का ये उपन्यास "नौलखी कोठी" उस समय की युगचेतना का व्यावहारिक चित्रण है। ये कहानी विभाजन से पहले के वर्षों में शुरू होती है और अस्सी के दशक तक चलती है।
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प्रस्तुत उपन्यास "नौलखी कोठी" हिन्दुस्तान में अग्रेज़ी सरकार के शासन और उसके बाद के दौर में बदलते सामाजिक हालात की कहानी है। इंग्लैंड में आठ लम्बे साल गुज़ारने के बाद विलियम विभाजन-पूर्व पंजाब में जलालाबाद के नवनियुक्त सहायक आयुक्त के रूप में हिंदुस्तान लौट आता है। वो अपने दादा द्वारा बनवाए गए आलीशान बंगले नौलखी कोठी में अपने 'घर' में लौटने का सपना देखता है, लेकिन घटनाओं का एक अपरिवर्तनीय मोड़ उसका इंतजार कर रहा है, जो न केवल उसकी क़िस्मत बदल देता है, बल्कि ज़मीन की क़िस्मत भी हमेशा के लिए बदल देता है। अली अकबर नातिक़ का ये उपन्यास "नौलखी कोठी" उस समय की युगचेतना का व्यावहारिक चित्रण है। ये कहानी विभाजन से पहले के वर्षों में शुरू होती है और अस्सी के दशक तक चलती है।
Book Details
-
ISBN9789394494350
-
Pages584
-
Avg Reading Time19 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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ददा से भेंट करे बर गए रहै का, दाई?” “हाहो।” “भेंट होए रहिसे?” “ना, टाइम नहीं रहिसे, कल आए बर बोले हे।” “दाई, शिवराम कका आए रहै।” “अच्छा, क्या कहता रहा?” “कहता रहा, कोर्ट से जमानत कराना हो तो जमानतदार लाना होगा, वकील करना होगा।” “हाँ, ये तो है।” लक्षन ने एक आह भरी थी, “घर मा मनखे जात के रहे ले घर के मरजादा तोपाय रहिथय, मनखे बिगर सबके डौकी जात के कोनों पूछ नई होवय।” दिन भर थाने, जेल, सुनार सबके पास से दुरदुराए जाने की पीड़ा लक्षन के स्वर में उभर आई थी। “दाई, का राँधवो?” मनबोधनी उसके सिरहाने चिंतित खड़ी थी। “कुछ कानी राँध ले।” लक्षन दिन भर के परिश्रम व थकान के कारण नीम बेहोश-सी हो चली थी। ताप की कमजोरी तो थी ही देह में। “हाहो।” —इसी उपन्यास से हमारे देश में सभ्य और संभ्रांत समाज से इतर एक ऐसा समाज भी है, जो झोंपड़-पट्टी में रहकर दुनिया के तमाम दु:ख भोगता है। इसे उसकी नियति कहें या विडंबना अथवा क्या? प्रस्तुत उपन्यास में ऐसे ही समाज के रहन-सहन, आचार-विचार, रीति-रिवाज, शादी-विवाह आदि का बड़ी खोजपरक दृष्टि से विशद वर्णन पाठकों के सामने प्रस्तुत किया गया है। यह उपन्यास मनोरंजन के साथ-साथ पाठकों को बहुत कुछ सोचने के लिए भी विवश करता है।
Ameeri Rekha Ki Khoj Mein
- Author Name:
Vijay Kumar
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काफी सिर खपाने के बाद पिछले दिनों मुझे इस बारे में अंतिम सत्य पता लग ही गया। वह यह है कि अमीरी की रेखा मकान, गाड़ी, घड़ी, कपड़े या कलम से नहीं, शौचालय से तय होती है। हमारे देश के महान् ‘योजना आयोग’ के कार्यालय में दो शौचालयों की मरम्मत में 35 लाख रुपए खर्च कर दिए गए। जरा सोचिए, मरम्मत में इतने खर्च हुए, तो नए बनने में कितने होते होंगे? जब कुछ लोगों ने इस पर आपत्ति की, तो योजना आयोग के मुखिया श्री मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने इसे बिल्कुल ठीक बताया। मैं उनकी बात से सौ प्रतिशत सहमत हूँ। बहुत से विचारकों का अनुभव है कि यही एकमात्र ऐसी जगह है, जहाँ व्यक्ति बिल्कुल एकांत में कुछ देर बैठकर, शांत भाव से मौलिक चिंतन कर सकता है। कई लेखकों को कालजयी उपन्यासों के विचार यहीं बैठकर आए हैं। श्री अहलूवालिया और उनके परम मित्र मनमोहन सिंह की जिन योजनाओं से रुपया रसातल में जा रहा है, उसके बारे में चिंतन और मनन इतने आलीशान शौचालय में ही हो सकता है। —इसी संग्रह से ——1—— समाज की विषमताओं और विद्रूपताओं पर मारक प्रहार करके अंतरावलोकन करने का भाव जागृत करने वाले व्यंग्य। ये न केवल आपको हँसाएँगे-गुदगुदाएँगे, बल्कि आपके अंतर्मन को उद्वेलित कर मानवीय संवेदना को उभारेंगे।
Kabira Soi Peer Hai
- Author Name:
Pratibha Katiyar
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मूलतः एक संवेदनशील कवि के रूप में अपनी पहचान बनाने वाली प्रतिभा कटियार का यह पहला उपन्यास अपनी पठनीयता और अपने सरोकार दोनों वजहों से लगभग चकित करता है। उपन्यास एक कोचिंग सेंटर से शुरू होता है जहाँ अलग-अलग वर्गों के छात्र एक-सी महत्वाकांक्षा के साथ पहुँचते हैं। मगर वहाँ भी छात्रों की पसन्द-नापसन्द, उनकी मैत्री और उनके सम्बन्धों में एक स्पष्ट भेदभाव चला आता है। उपन्यास में ऐसे किरदार हैं जो इस भेदभाव को तोड़कर आगे बढ़ते हैं और बताते हैं कि दुनिया इन खानों से बड़ी है। जाहिर है, यह प्रेम और आपसी समझ के रसायन से बनी मनुष्यता है जो सामाजिक चाल-चलन पर भारी पड़ रही है। उपन्यास की नायिका दलित समाज से आती है और बचपन से ही देखती है कि उसकी प्रतिभा दूसरों की आँख का काँटा बनी हुई है। उसकी सफलता भी उसका अभिशाप है। जब उसे कोचिंग सेंटर में ऐसा दोस्त मिलता है जो बराबरी पर भरोसा करता है और उससे प्रेम करने लगता है तब वह कुछ बदलती दिखती है। उपन्यास अगर इसी दिशा में बढ़कर एक सुखान्त पर खत्म हो जाता तो तो शायद वह बराबरी की कामना का एक रूमानी बयान होकर रह जाता। यहाँ लेखिका साबित करती हैं कि उनके लहजे में चाहे जितनी रूमानियत हो, यथार्थ की उनकी समझ बहुत खरी है। वे घर-परिवार और समाज के सारे पूर्वग्रह और पाखंड जैसे तार-तार कर देने पर तुली हैं। वे एक पल के लिए भी इस बात को ओझल नहीं होने देतीं कि यह समाज बहुधा कुछ लोगों के प्रति बहुत अमानुषिक व्यवहार करता है और अगर यह भी न हो तो अपनी उदारता के चरम लम्हों में भी वह उनके अवसर छीनने में कोई कोताही नहीं करता, कोई हिचक नहीं दिखाता। इसमें सन्देह नहीं कि यह उपन्यास एक साँस में पढ़ा जा सकता है, लेकिन उसके बाद जिस गहरी और लम्बी साँस की ज़रूरत पड़ती है, वह कहीं हलक में अटकी रह जाती है। कई किरदारों और स्थितियों के बीच रचा गया यह उपन्यास हमारे समय की एक बड़ी विडम्बना पर उँगली रखता है और अपने छोटे कलेवर के बावजूद एक बड़ा वृत्तान्त रचता है। —प्रियदर्शन
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Book
Naulakhi Kothi inhabits the psychological fault line of pre-Partition Punjab, where personal inheritance collides with the collapse of empire. William, the new Assistant Commissioner of Jalalabad, returns after eight years in England expecting to reclaim his grandfather's grand bungalow—the titular mansion that represents both colonial prestige and familial legacy. Instead, he encounters an "irreversible turn of events" that rewrites not only his own trajectory but the fate of the land itself. The novel's power lies in its dual focus: the intimate drama of a man caught between two worlds, and the seismic social transformations sweeping through late British India. Published by Rekhta Publications, this work captures the twilight of the Raj through the lens of architecture, ambition, and the fragility of belonging. It asks what happens when the symbols of power—grand bungalows, official titles, inherited privilege—become relics overnight, and how individuals navigate the wreckage of certainties they once took for granted.
यह उपन्यास पढ़ते समय मुझे किस तरह का अनुभव मिलेगा?
यह उपन्यास एक धीमी, विचारशील यात्रा है जो औपनिवेशिक भारत के अंतिम दिनों की मनोवैज्ञानिक उथल-पुथल को महसूस कराती है। नौलखी कोठी में विलियम का व्यक्तिगत संकट और विभाजन-पूर्व पंजाब के सामाजिक बदलाव एक साथ चलते हैं। यह उन पाठकों को संतुष्ट करेगा जो ऐतिहासिक विवरण, चरित्र की आंतरिक दुविधा, और उस समय की सराहना करते हैं जब पुरानी दुनिया नई दुनिया को रास्ता दे रही थी।
यह किताब किस तरह के पाठकों के लिए सबसे उपयुक्त है?
- जो पाठक ब्रिटिश राज के अंतिम चरण और विभाजन के सामाजिक प्रभावों में रुचि रखते हैं
- जो औपनिवेशिक विरासत, पहचान के द्वंद्व, और ऐतिहासिक परिवर्तन के व्यक्तिगत आयामों को समझना चाहते हैं
- जिन्हें धैर्यपूर्वक विकसित होने वाली कथाएँ और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद पसंद है
इस उपन्यास की विषयवस्तु का आज के भारतीय पाठकों के लिए क्या सांस्कृतिक या ऐतिहासिक महत्व है?
विभाजन-पूर्व पंजाब की यह कहानी आज भी प्रासंगिक है क्योंकि यह दिखाती है कि कैसे राजनीतिक उथल-पुथल व्यक्तिगत भाग्य को बदल देती है। नौलखी कोठी उस समय को पकड़ती है जब सत्ता के प्रतीक—भव्य बंगले, आधिकारिक उपाधियाँ—रातोंरात अप्रासंगिक हो गए। यह समकालीन भारत में पहचान, विरासत, और सामाजिक परिवर्तन के सवालों से जुड़ती है।
इस विषय पर इस लेखक का दृष्टिकोण क्या विशिष्ट बनाता है?
यह उपन्यास विभाजन की कहानी को एक ब्रिटिश-भारतीय अधिकारी विलियम की आंखों से देखता है, जो दो दुनियाओं के बीच फंसा है। जलालाबाद में नवनियुक्त सहायक आयुक्त के रूप में उसका संघर्ष—अपने दादा की विरासत को पुनः प्राप्त करने की इच्छा और साम्राज्य के पतन की वास्तविकता—एक अनोखा कोण प्रदान करता है। यह व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और ऐतिहासिक अपरिहार्यता के बीच की खाई को उजागर करता है।
यह उपन्यास पाठक के साथ भावनात्मक, बौद्धिक या सांस्कृतिक रूप से क्या छोड़ जाता है?
यह उपन्यास पाठक को विरासत की नाजुकता और इतिहास की अपरिवर्तनीय शक्ति की गहरी समझ देता है। नौलखी कोठी यह सवाल छोड़ जाती है कि जब हमारी निश्चितताएं ध्वस्त हो जाती हैं तो हम कौन होते हैं। यह औपनिवेशिक अतीत के दीर्घकालिक प्रभाव और उस व्यक्तिगत कीमत पर विचार करने को प्रेरित करती है जो सामूहिक परिवर्तन की मांग करती है।