Aapaatnama
(0)
₹
400
320 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में आपातकाल के जख्म बड़े गहरे हैं। ‘आपातनामा’ उस काली रात की दास्तान है, जिसने उन्नीस महीने तक प्रजातंत्र के सूर्य को उगने ही नहीं दिया। सत्ता का नशा कैसे भ्रष्ट व्यक्तियों को जन्म देता है, यह ‘आपातनामा’ उपन्यास के कथानक से झलकता है। कैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, नौकरशाहों और नेताओं के पास बंदी बना ली गई थी। कैसे न्यायपालिका को कार्यपालिका के हाथों की कठपुतली बनाकर नचाया जा रहा था। देश में किस प्रकार से अराजक तत्त्व मनमानी करने लगे थे और किस प्रकार से तानाशाही को खुलकर खेलने का अवसर मिल रहा था, यह सब इस कथानक के मूल मुद्दे हैं। ‘आपातनामा’ में आपातकाल की हकीकत को बड़ी ही संजीदगी से मर्मस्पर्शी शैली में अभिव्यक्त किया गया है। सरकार के मौखिक आदेश लोगों पर इस कदर कहर बरसा रहे थे कि कुछ लोग अंग्रेजों के दमनचक्र से भी अधिक खौफनाक दौर से गुजरने लगे थे। सरकार की अमानुषिक एवं आतंकित कर देनेवाली गतिविधियों से बेबस, समझौतापरस्त, उदासीन जनता को लेखक ने विद्रोह-चेतना का हथौड़ा मारकर जगाया है, जिसे वह क्रांति का लघुदर्शन मानता है, ताकि संसदीय प्रजातंत्र का मजाक न बन सके, अभिव्यक्ति की आजादी कुंठित न हो और व्यक्ति के मौलिक अधिकार सुरक्षित रहें।
Read moreAbout the Book
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में आपातकाल के जख्म बड़े गहरे हैं। ‘आपातनामा’ उस काली रात की दास्तान है, जिसने उन्नीस महीने तक प्रजातंत्र के सूर्य को उगने ही नहीं दिया। सत्ता का नशा कैसे भ्रष्ट व्यक्तियों को जन्म देता है, यह ‘आपातनामा’ उपन्यास के कथानक से झलकता है। कैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, नौकरशाहों और नेताओं के पास बंदी बना ली गई थी। कैसे न्यायपालिका को कार्यपालिका के हाथों की कठपुतली बनाकर नचाया जा रहा था। देश में किस प्रकार से अराजक तत्त्व मनमानी करने लगे थे और किस प्रकार से तानाशाही को खुलकर खेलने का अवसर मिल रहा था, यह सब इस कथानक के मूल मुद्दे हैं।
‘आपातनामा’ में आपातकाल की हकीकत को बड़ी ही संजीदगी से मर्मस्पर्शी शैली में अभिव्यक्त किया गया है।
सरकार के मौखिक आदेश लोगों पर इस कदर कहर बरसा रहे थे कि कुछ लोग अंग्रेजों के दमनचक्र से भी अधिक खौफनाक दौर से गुजरने लगे थे।
सरकार की अमानुषिक एवं आतंकित कर देनेवाली गतिविधियों से बेबस, समझौतापरस्त, उदासीन जनता को लेखक ने विद्रोह-चेतना का हथौड़ा मारकर जगाया है, जिसे वह क्रांति का लघुदर्शन मानता है, ताकि संसदीय प्रजातंत्र का मजाक न बन सके, अभिव्यक्ति की आजादी कुंठित न हो और व्यक्ति के मौलिक अधिकार सुरक्षित रहें।
Book Details
-
ISBN9789382901495
-
Pages184
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Suni Ghati Ka Suraj
- Author Name:
Shrilal Shukla
- Book Type:

- Description: ‘सूनी घाटी का सूरज’ एक ग्रामीण युवक के बारे में है जो शिक्षित और प्रतिभाशाली होने के बावजूद स्वयं को एक ऐसे समाज में पाता है, जहाँ उसकी सोच, आदर्शों और गुणों के व्यापारी प्रतिष्ठित हैं। लेकिन उस बाज़ार में अपनी गुणवत्ता और उपयोगिता को साबित करने के लिए उसके पास न तो सिफ़ारिश है, न उसके सम्बन्ध किसी ‘बड़े’ से हैं और न ही रिश्वत देने के लिए उसके पास धन हैं। उसने अपने पिता को क़र्ज़दार होकर एक ख़ानदानी ठाकुर के यहाँ बँधुआ जैसा जीवन जीते देखा है, और उनकी मृत्यु के बाद उसकी अपनी पढ़ाई एक हेडमास्साब के पास अनाथ की तरह रहकर, सेवा करके और फिर ट्यूशन आदि करके पूरी हुई, इसी तरह उसने एक मेधावी छात्र के रूप में प्रथम श्रेणी की डिग्रियाँ हासिल कीं। लेकिन अपनी उन सीमाओं के चलते जिनके लिए वह ख़ुद नहीं, बल्कि व्यवस्था ज़िम्मेदार है, वह अपने लिए कहीं जगह नहीं पाता। फलस्वरूप युग के आकर्षण, अतीत की प्रताड़ना और वर्तमान की निराशा को झाड़कर वह उसी अँधेरी और सुनसान घाटी में उतरने का फ़ैसला करता है, जहाँ उसकी सर्वाधिक आवश्यकता है।
Narak Masiha
- Author Name:
Bhagwandas Morwal
- Book Type:

-
Description:
आधुनिक समाज के हाशियों की उपेक्षित उदासियों का अन्वेषण करनेवाले भगवानदास मोरवाल ने इस उपन्यास में मुख्यधारा की ख़बर ली है। वह मुख्यधारा जो क़िस्म-क़िस्म की अमानवीय और असामाजिक गतिविधियों से उस ढाँचे का निर्माण करती है जिसे हम समाज के रूप में देखते-जानते हैं।
उपन्यास का विषय ग़ैर-सरकारी संगठनों की भीतरी दुनिया है, जहाँ देश के लोगों के दुःख दुकानों पर बिक्री के लिए रखी चीज़ों की तरह बेचे-ख़रीदे जाते हैं, और सामाजिक-आर्थिक विकास की गम्भीर भंगिमाएँ पलक झपकते बैंक बैलेंस में बदल जाती हैं।
यह उपन्यास बताता है कि आज़ादी के बाद वैचारिक-सामाजिक प्रतिबद्धताओं के सत्त्व का क्षरण कितनी तेज़ी से हुआ है, और आज वह कितने समजघाती रूप में हमारे बीच सक्रिय है। कल जो लोग समाज के लिए अपना सबकुछ न्योछावर करने की उदात्तता से दीप्त थे, कब और कैसे पूरे समाज, उसके पवित्र विचारों, विश्वासों, प्रतीकों और अवधारणाओं को अपने हित के लिए इस्तेमाल करने लगे और वह भी इतने निर्लज्ज आत्मविश्वास के साथ, इस पहेली को खोलना शायद आज के सबसे ज़रूरी कामों में से एक है। यह उपन्यास अपने विवरणों से हमें इस ज़रूरत को और गहराई से महसूस कराता है।
उपन्यास के पात्र अपने स्वार्थों की नग्नता में जिस तरह यहाँ प्रकट हुए हैं, वह डरावना है; पैसा कमाने के तर्क को वे जहाँ तक ले जा चुके हैं, वह एक ख़ौफ़नाक जगह है—सचमुच का नरक; और जिस भविष्य का संकेत यहाँ से मिलता है, वह वीभत्स है।
Sati Maiya Ka Chaura
- Author Name:
Bhairavprasad Gupt
- Book Type:

-
Description:
‘सती मैया का चौरा’ में भैरवप्रसाद गुप्त गाँवों की मुक्ति का सवाल उठाते हैं। वे साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए किए जानेवाले संघर्ष को भी विस्तारपूर्वक अंकित करते हैं। उपन्यास की कहानी दो सम्प्रदायों के किशोरों—मुन्नी और मन्ने को केन्द्र में रखकर विकसित होती है। मन्ने गाँव के ज़मींदार का लड़का है, जबकि मुन्नी एक साधारण हैसियत वाले वैश्य परिवार से है। उनके किशोर जीवन के चित्र साम्प्रदायिक कट्टरता के विरुद्ध एक आत्मीय और अन्तरंग हस्तक्षेप के रूप में अंकित हैं।
भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन में ही उत्पन्न साम्प्रदायिक राजनीति की शक्तियाँ गाँव को भी प्रभावित करती हैं। सती मैया के चौरा के लिए शुरू हुआ संघर्ष उन निहित स्वार्थों को निर्ममतापूर्वक उद्घाटित करता है जो धर्म और सम्प्रदाय के नाम पर लोक-चेतना और लोक-संस्कृति के प्रतीकों को नष्ट करते हैं। ‘हिन्दू-मुसलमान की बात कभी अपने दिमाग़ में उठने ही न दो, यह समस्या धार्मिक नहीं राजनीतिक है और सही राजनीति ही साम्प्रदायिकता का अन्त कर सकती है।’ यह सही राजनीति क्या है? ‘मैं कभी भी महत्त्वाकांक्षी नहीं रहा। धन, यश, प्रशंसा को कभी भी मैंने कोई महत्त्व नहीं दिया। पढ़ाई ख़त्म होने के बाद जो तकलीफ़ मैंने झेली, उसमें और आश्रम के जीवन में जो भी ग्रहण किया है, सच्चाई से किया है। आश्रम, जेल जीवन और पार्टी जीवन ने मुझे बिलकुल सफ़ेद कर दिया, सारी रंगीनियों को जला दिया...मैंने जीवन में जो भी ग्रहण किया है, सच्चाई से किया है। आश्रम में, जेल जीवन में, पार्टी जीवन में और अब पत्रकारिता और लेखक के जीवन में...।’
‘सती मैया का चौरा’ भैरवप्रसाद गुप्त का ही नहीं, समूचे हिन्दी उपन्यास में एक उल्लेखनीय रचना के रूप में समादृत रहा है।
Sukhi Ghar Society
- Author Name:
Vinod Das
- Book Type:

- Description: v data-content-type="html" data-appearance="default" data-element="main">‘सुखी घर सोसाइटी’ उपन्यास महानगर मुम्बई के उपनगर स्थित एक रिहाइशी परिसर का ऐसा वृत्तान्त है जिसमें क़स्बे के एक मुहल्ले की तरह विविधवर्णी जीवन की आपाधापी है, वहीं उसमें महानगर के अन्तर्द्वन्द्व, रहवासियों की हताशाएँ और उनके दैनिक संघर्ष की छोटी-छोटी ऐसी मार्मिक कथाएँ भी हैं जो रिसते ज़ख़्मों की तरह हमेशा उनके भीतर दुखती रहती हैं। लेकिन इसकी कथा-भूमि केवल महानगर तक सीमित नहीं है। इसमें गाँव से उखड़े हाशियों पर रहनेवालों की व्यथा-कथाएँ भी हैं जो महानगर पर्यटन के लिए नहीं, रोजी-रोटी के लिए आते हैं और हर दिन वहाँ तिल-तिल मरते हुए अपने गाँव लौटने का सपना देखते रहते हैं। विस्थापन की टीस, पानी की किल्लत, समय पर काम के लिए पहुँचने के लिए लोकल ट्रेन की रगड़ा-रगड़ी, बदबूदार सीवर की जानलेवा सफ़ाई, बार में नाचती देह बेचने की मजबूरी, स्थानीय भाषा न बोल पाने पर पिटाई-धुनाई जैसी तमाम ज़िल्लतों और घृणा के बीच मनुष्य अपने भीतर प्रेम सरीखी कोमल अनुभूति को किस तरह बचाता है, यह उपन्यास इसका अद्भुत आख्यान है। इसमें जहाँ मुम्बई के इतिहास की हल्की झलक है, वहीं देश की दरकती हुई लोकतान्त्रिक व्यवस्था का वर्तमान भी है। उपन्यास में वर्तमान और इतिहास की सहज आवाजाही हमें विस्मित करती है। इसे पढ़ते हुए जहाँ बार-बार इस बात की पुष्टि होती है कि इतिहास को बीते समय का कंकाल मानने से इसकी स्याह छायाएँ कई बार वर्तमान की ज़मीन को भी ऊसर बनाती हैं। हालाँकि, इसके कथ्य में समय की अनुभूति इतनी गहरी है कि वह ऐतिहासिकता भी रचती चलती है। सोसाइटी के बहुसंख्य फ़्लैटों की तरह इसकी कथा में विविध चरित्रों का रंगारंग संसार गुंफित है। इस उपन्यास का हर अध्याय अपने आप में एक स्वतंत्र कहानी पढ़ने का विरल अनुभव देता है जबकि हर अध्याय अपने में स्वायत्त होने के बावजूद अपने पूर्व के अध्याय की कोख से निकला भी लगता है। कहना न होगा कि काव्यात्मक भाषा में अपने समय की धड़कनों को जीवित यथार्थ की तरह अपनी रक्त की धमनियों में पढ़ना आज के अमानवीय दौर में मनुष्य बने रहने के लिए एक सकारात्मक कारवाई है जिसकी सृजनात्मक कसौटी पर विनोद दास का यह उपन्यास पूरी तरह खरा उतरता है।
Unmad
- Author Name:
Bhagwan Singh
- Book Type:

-
Description:
साम्प्रदायिक उन्माद को उन्माद की ही एक क़िस्म के रूप में पकड़ने की कोशिशें हिन्दी में बहुत कम हुई हैं—उँगलियों के पोरों पर भी नहीं, सिर्फ़ उँगलियों पर गिनने लायक़। भगवान सिंह का यह उपन्यास शायद पहली बार इतने सारे मानवीय ब्योरों में जाकर यह काम कर रहा है। दूसरे तमाम पहलू छोड़ भी दें तो इसका यह महत्त्व दस्तावेज़ी क़िस्म का है। एक सहज, प्यारी-सी प्रेमकथा हमारे असहज समाज में इतने सारे टकरावों का केन्द्र बन जाती है और यह अकेली गुत्थी सुलझाने के क्रम में इतनी सारी उलझी गुत्थियाँ रफ़्ता-रफ़्ता सुलझती जाती हैं कि ताज्जुब होता
है।साम्प्रदायिकता जैसी जटिल समस्या को महज़ कुछ साजिशों के ज़रिए व्याख्यायित करने का चलन कम-से-कम साहित्य में नहीं चलते रहना चाहिए। साहित्य तो चीज़ों को ज़्यादा ठोस ढंग से, ज़्यादा गहराई में और ज़्यादा ब्योरेवार पकड़ता है। साहित्य पर यही भरोसा गेटे से कहलवाता है, 'सारे सिद्धान्त धूसर पड़ जाते हैं पर जीवन का वृक्ष हमेशा हरा रहता है।' साम्प्रदायिकता की एक गहरी समझ पर केन्द्रित इस उपन्यास में आपको जीवन-वृक्ष की हरियाली मिलेगी, उसे समझने के दशकों पुराने धूसर सिद्धान्त नहीं।
एक बड़ी चुनौती यह उपन्यास हमारे सामने रखता है—अपने समाज के असहज पहलू को नए सिरे से समझने की चुनौती। अगर आप यह मानकर चलें कि आप दिमाग़ी गुत्थियों से भरे एक असहज समाज में जी रहे हैं तो अनजाने में की गई अपनी ऐसी कई हरकतों से बच सकते हैं, जो किसी को गहरा दु:ख पहुँचानेवाली और यहाँ तक कि कुछ बड़े विध्वंसों का कारण भी बन सकती हैं। प्रौढ़ता और संवेदना के अद्भुत तालमेल से जनमी यह रचना हमें पहले से ज़्यादा प्रौढ़, ज़्यादा संवेदनशील बना सकने में सक्षम है।
Unwritten Letters
- Author Name:
Monica Mujumdar Dixit
- Book Type:

- Description: Anthology
Sidhyon Par Cheetah
- Author Name:
Tejinder
- Book Type:

-
Description:
उत्तराखंड के देहरादून से चेन्नई जा पहुँचा भारत सरकार का एक क्लास वन सिख ऑफ़िसर रंधावा। समुद्र के और वहाँ के दरिद्रनारायण बाशिन्दों के क़रीब पहुँच जाने पर उसे अनुभव होने लगा है कि ‘ग़रीब आदमी की हथेलियों में लिखी हुई रेखाएँ, पेंसिल से खींची हुई होती हैं और उन्हें मिटानेवाले सारे रबर पैसेवालों के हाथों में होते हैं।’ “अंकल, आप नहीं समझते, इस डायरी के शब्दों में कितनी एनर्जी और कितना पैशन है।”
“लेकिन ये सड़ी और तर्कहीन नफ़रत से भरे हुए हैं...”
“पर अंकल, जागीरसिंह ठीक कहता था, मैं भी अपने रास्ते में जो आएगा, उसे छोड़ूँगा नहीं, आई विल किल हिम।”
“तुम्हारे रास्ते का मतलब?”
“समुद्र की पीठ पर अपना घर बनाने का रास्ता।” समुद्र की पीठ पर अपना घर बनाने का रास्ता महज़ शिवा के दिमाग़ में नहीं, अनेक विद्वानों के मस्तिष्कों से उपजा है। प्रोफ़ेसर लक्ष्मीनारायण श्रीनिवास राघवन ने एक दिन शिवा को कान्नेमारा लाइब्रेरी की सीढ़ियों पर बैठकर समझाया था—‘अंग्रेज़ कलकत्ते से ज़्यादा मद्रास को प्यार करते थे, इसीलिए उन्होंने यहाँ कान्नेमारा लाइब्रेरी बनवाई। यहाँ पर जो किताबें हैं और उनमें द्रविड़ियन ज्ञान की जो फ़ायर है, वह सोने की तरह है, जिसके सामने काशी के वेद फीके हैं। नो आर्यन फ़िलासफ़र कैन ईवन स्टैंड नीयरबाय।’
“आप यह समुद्र के उस पार के द्वीप में जो लड़ाई चल रही है, उसके बारे में क्या सोचती हैं?” रंधावा ने नीला नारायणन से पूछा था।
“दे डोन्ट नो देम सेल्व्स, उन्हें क्या चाहिए। वे अपने घर के लिए लड़ रहे हैं इसीलिए हमारे घर बन रहे हैं।” टी.वी. पर ब्रेकिंग न्यूज़ के तहत बताया जा रहा था कि बारिश से हुई बर्बादी के बाद रात के टोकन बटोरने की कोशिश में एक तमिल क़स्बे में अपने ही लोगों की भीड़ से कुचलकर बयालीस लोग मर गए थे।
जागीरसिंह और शिवा दोनों दिग्भ्रमित नौजवानों ने अन्ततः अपने विचारों को सच मानते हुए, उनकी रक्षा में मौत का चोग़ा ओढ़ लिया था। उपन्यास में धड़ल्ले से किए गए तमिल वाक्यों के उपयोग से यह विश्वास नहीं हो सकता कि लेखक एक हिन्दीभाषी क्षेत्र का निवासी है।
सिर्फ़ हिन्दी ही नहीं, एक ज्वलन्त, अछूते विषय पर अब तक किसी भी भारतीय भाषा में लिखी गई एक अनोखी, कालजयी रचना।
—विद्यासागर नौटियाल
Patiya
- Author Name:
Kedarnath Agrawal
- Book Type:

-
Description:
‘पतिया’ यशस्वी कवि केदारनाथ अग्रवाल का उपन्यास है। अब तक अनुपलब्ध होने के कारण केदार-साहित्य के सहृदय पाठक और आलोचक इस उल्लेखनीय कृति से वंचित रहे। उनके लिए वस्तुत: ‘पतिया’ एक अनमोल उपहार है।
हिन्दी साहित्य में स्त्री-विमर्श की औपचारिक रूप से चर्चा प्रारम्भ होने से बहुत पहले रची गई कृति ‘पतिया’ में स्त्री-जीवन की जाने कितनी विडम्बनाएँ चित्रित हो चुकी थीं। परिवार, दाम्पत्य, यौन स्वातंत्र्य, शोषण और अलगाव आदि से जुड़े प्रसंगों के छायाचित्र ‘पतिया’ को महत्त्वपूर्ण बनाते हैं। उपन्यास की नायिका का जीवन-संघर्ष स्वयं बहुत कुछ कहता है। स्त्री समलैंगिकता की स्थितियाँ भी प्रस्तुत उपन्यास में हैं। इससे सिद्ध होता है कि कोई भी प्रवृत्ति या घटना सामाजिक स्थिति और व्यक्तिगत मन:स्थिति का संयुक्त परिणाम होती है।
इस उपन्यास का गद्य विशिष्ट है...एक कवि का गद्य। छोटे-छोटे वाक्य। बिम्ब, प्रतीक समृद्ध भाषा। संवेदनशील और प्रवाहपूर्ण। यथार्थवादी गद्य का उदाहरण। पतिया की ननद मोहिनी का यह चित्र कितना व्यंजक है, “मैली-सी चौड़े किनारे की धोती पहिने है। हाथ और पैरों में चाँदी के गहने खनक रहे हैं। धोती का पल्ला सिर से उतरकर गरदन पर आ गया है। पीछे से एक बड़ा-सा जूड़ा उठा दिखता है। जूड़ा गोल घेरे में बँधा है। सामने से देखने पर सिर में सिन्दूर भरी चौड़ी-सी माँग दिखती है। कानों में तरकियाँ, नाक में पीतल की फुल्ली और गले में रंगीन काँच और मूँगे के दानों से बनी दुलरी पड़ी है। बड़ी-बड़ी आँखों में काजल खिंचा है। दाहिनी ओर गाल पर एक तिल है। चेहरे पर तेल की चिकनाहट जवानी को चमका रही है। कोई कुरती या सलूका नहीं पहने है। बर्तन माँजते वक़्त, उसके दोनों उरोज, छलक पड़ते हैं। रंग ज़्यादा गोरा नहीं, पर साँवले से कुछ निखरा हुआ है।
Chiwar
- Author Name:
Rangeya Raghav
- Book Type:

-
Description:
उपन्यासकार रांगेय राघव ने ‘सीधा सादा रास्ता’ और ‘कब तक पुकारूँ’ जैसे समकालीन विषय-वस्तु पर आधारित उपन्यासों के साथ ऐतिहासिक उपन्यासों से भी हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया है। अपनी मार्क्सवादी विश्व-दृष्टि के आधार पर वे प्रत्येक विषय को अपने ख़ास नज़रिए से चित्रित करते हैं।
‘चीवर’ उनके प्रमुखतम ऐतिहासिक उपन्यासों में से एक है। इसमें उन्होंने हर्षवर्धन काल के पतनशील भारतीय सामन्तवाद को रेखांकित किया है। ब्राह्मण और बौद्ध मतों के परस्पर संघर्ष के साथ-साथ मालव गुप्तों, वर्धनों और मौखरियों के बीच राजनीतिक सत्ता के लिए होनेवाला संघर्ष भी हमें यहाँ दिखाई देता है।
भाषा के स्तर पर यह उपन्यास सिद्ध करता है कि शब्दावली अगर घोर तत्समप्रधान हो तब भी उसमें रस की सर्जना की जा सकती है—बशर्ते लेखनी किसी समर्थ रचनाकार के हाथ में हो। यह इस उपन्यास की प्रवहमान भाषा का ही कमाल है कि इसमें विचरनेवाले पात्र, वह चाहे राज्यश्री हो या हर्षवर्धन या कोई और हमारी स्मृति पर अंकित हो जाते हैं।
Kali-Katha : Via Bypass
- Author Name:
Alka Saraogi
- Book Type:

-
Description:
‘श्रीकांत वर्मा पुरस्कार’ और 'साहित्य अकादेमी पुरस्कार' से सम्मानित यह उपन्यास अलका सरावगी की पहली औपन्यासिक रचना थी। इस उपन्यास ने न सिर्फ़ उन्हें हिन्दी साहित्य-जगत का सितारा लेखक बना दिया, बल्कि अब तक चली आ रही उपन्यास-परम्परा को भी एक नया मोड़ दिया। इसने कथा-लेखन की एक ठहरी और इकहरी शैली से ऊबे हिन्दी पाठक को एक ऐसी भाषा और कहन दी जिससे उसने अचानक अपने को समृद्ध अनुभव किया।
एक मारवाड़ी परिवार की कई पीढ़ियों की दास्तान कहनेवाला यह उपन्यास शायद भाषा में उस दृष्टि को पिरोनेवाला पहला उपन्यास था जिसने नब्बे के दशक में देश में उदारीकरण के बाद जन्म लिया था। आज़ाद भारत में निर्मित सामाजिकता के प्रचलित पैमानों पर जीते मनुष्य की भीतरी अजनबीयत की पहचान से शुरू होती यह कथा अंग्रेज़ों द्वारा भारत में रेलवे लाने के शुरुआती दिनों से लेकर सन् 2000 तक के इतिहास का अवलोकन करती है। इसमें कोलकाता शहर का इतिहास भी पढ़ा जा सकता है, और मोटा-मोटी ढंग से भारत में सामाजिक-नैतिक मूल्यों के निर्माण और ध्वंस का भी।
कहानी किशोर बाबू की है जो अपनी बाइपास सर्जरी के बाद दुनिया को बिलकुल ही अलग सिरे से देखने लगते हैं, वे किशोर बाबू जो जीवन-भर दक्षिणी कोलकाता के अभिजात समाज का हिस्सा रहे अचानक ‘सड़कमाप’ बन जाते हैं, कोलकाता की अभद्र सड़कों पर भटकते दिखने लगते हैं और अपनी इसी यात्रा में अपने परिवार के पुरखों से लेकर अपनी तीन वर्षीय नातिन तक के समय को खँगाल देते हैं।
Our Love That Fell Apart
- Author Name:
Nupur Luthra
- Rating:
- Book Type:

- Description: Brian serves grey with divorce papers, announces he’s gay and is in love with someone else. Her whole world falls apart, filled with rage, she has no one to turn too. Brian feels bad and is miserable for causing her a lot of pain, but the heart wants what it wants. Brian and his lover get married, which causes grey further pain. What happens next? How does grey deal with the pain and agony? Does it all end well or does someone die in the end? Find out in our love falls apart.
Ta-Taa Professor
- Author Name:
Manohar Shyam Joshi
- Book Type:

-
Description:
स्वीकृत मानदंडों की दृष्टि से पूरी तरह तर्कसंगत और प्रासंगिक नहीं होने के बावजूद ‘ट-टा प्रोफ़ेसर’ हिन्दी उपन्यासों में विशिष्ट दर्जा रखता है। दरअसल दास्ताने अलिफ़ लैला की शैली में यह ऐसी उत्तर-आधुनिक कथा है, जिसके अन्दर कई-कई कथा निर्बाध गतिमान है, सीमित कलेवर में होने के बाद भी कहानी पूरे उपन्यास का रसास्वादन कराती है। ‘ट-टा प्रोफ़ेसर’ एक पात्र की ही नहीं, एक कहानी की भी कहानी है। ऐसी कहानी जिसका आदि और अन्त, लेखक के आदि और अन्त के साथ होता है।
प्रेम और काम जैसे अति संवेदनशील विषयों को केन्द्र में रखकर लिखा गया यह उपन्यास मज़ाक़ को भी त्रासदी में तब्दील कर देता है। कहीं ‘कॉमिक’ कामुकता में परिवर्तित होता नज़र आता है, लेकिन जीवन और मर्म की धड़कन निरन्तर सुनाई पड़ती रहती है। सत्य, कल्पना और अनुभूति की प्रामाणिकता और भाषा के सहज प्रवाह के चलते कथा पाठक को आद्यन्त बाँधे रखती है। अपने विलक्षण लेखन के नाते जाने जानेवाले मनोहर श्याम जोशी ने एक सामान्य प्रोफ़ेसर को केन्द्र में रखकर रचित इस कृति में अपने कथा-कौशल का अद्भुत प्रमाण दिया है।
Match Box 81
- Author Name:
Dr. Lata Kadambari Goel
- Book Type:

- Description: "फास्ट फूड तथा पाउच के जमाने में वक्त की कमी को देखते हुए कहानियाँ भी छोटी-छोटी होनी चाहिए न! बिल्कुल ऐसी कि माचिस की एक डिब्बी में समा जाएँ। इस पुस्तक में लेखिका ने अपने समाजोपयोगी विचारों और भावों को ‘मैच बॉक्स 81’ में डाला है। जरा जलाइए न उसको। कैसी नीली, पीली, लाल, गुलाबी ‘लौ’ छोड़कर अचानक बुझ जाती है वो नन्हीं सी तीली। ऐसी ही नन्हीं-नन्हीं कहानियों की शक्ल लिये ये ‘तीलियाँ’ मतलब कि ये छोटी-छोटी कहानियाँ हैं, जो अपने ज्ञान की रोशनी से पाठकों के जीवन को प्रकाशमान करेंगी। लेखिका ने इन कहानियों के माध्यम से जीवन की छोटी-छोटी, लेकिन महत्त्वपूर्ण समस्याओं को सुलझाने के लिए एक व्यावहारिक ताना-बाना बुनने का कुछ इस प्रकार से प्रयास किया है कि कहानी भीतर तक झकझोर देनेवाला एक सवाल उठाकर खत्म हो जाती है। जीवन के अंधकार से निकलने का एक छोटा सा प्रयास है ये पठनीय कहानियाँ। "
Hool
- Author Name:
Bhalchandra Nemade
- Book Type:

-
Description:
हूल में चांगदेव पाटील नाम के एक युवा के जरिए भालचन्द्र नेमाड़े भारतीय जीवन और समाज की कमजोरियों के साथ उसकी जिजीविषा को भी एक बड़े फलक पर अंकित करते हैं। मन का सूक्ष्म और संसार का स्थूल यहाँ साथ-साथ चलता है जिसे उनकी व्यापक विश्वदृष्टि एक महाकाव्यात्मक आयाम देती है।
हूल का चांगदेव एक बदला हुआ चांगदेव है, मुम्बई में अपने विद्यार्थी काल में हुए आदर्शनाशी अनुभवों के बाद अब वह यथार्थ का सामना करने के लिए तैयार है जिसके लिए वह एक छोटे से कस्बे में आकर अध्यापक हो जाता है। ‘कन्वर्टेड’ ईसाइयों के इस विद्यालय में उसे जातिवाद, लिंगभेद और संकीर्ण विभागीय राजनीति के अनेक ऐसे रूप देखने को मिलते हैं जो पुनः उसे उतना ही सम्भ्रमित कर छोड़ते हैं, जितना वह यहाँ आने से पहले था। उसे चिढ़ होती है, अपने आप पर दया आती है, और अपने आसपास के लोगों और जीवन पर क्रोध। प्रोफेसर बनने का उसका सुन्दर सपना यहाँ धराशायी हो जाता है।
लेकिन चांगदेव उनमें से नहीं हैं जो धारा के साथ चलने लगें और अन्ततः उसी का हिस्सा हो जाएँ, उनमें से भी नहीं जो शक्तिमन्त संरचनाओं के आगे घुटने टेक दें, और स्वयं के शक्तिशाली होने के लिए अपने अस्तित्वगत मूल्यों को तिलांजलि दे दें। विरोध करने का, खुद के सत्त्व को बचाने का उसका अपना तौर-तरीका है। अन्तस की लाख गुंजलकों के बीच अपनी असहमति की रक्षा करना वह जानता है, इसलिए बेहतर की ओर उठे अपने कदम को वह कभी वापस नहीं लेता। जगत को जिस वृहत रूप में वह देखता है, व्यक्ति और समाज के बीच जो प्राकृतिक सम्बन्ध उसे महसूस होता है, उसके साथ चेतना की अपनी यात्रा को वह सतत जारी रखता है।
हूल स्वतंत्र रूप से भी उतना ही दिलचस्प और पूर्ण पाठ है, जितना कि शृंखला की एक कड़ी के रूप में। यह एक बड़ी विशेषता है।
Kavi Ki Preyasi
- Author Name:
Ilachandra Joshi
- Book Type:

- Description: ‘कवि की प्रेयसी’ एक काल्पनिक उपन्यास है जिसमें प्रसिद्ध उपन्यासकार इलाचन्द्र जोशी ने अपनी सशक्त लेखनी के माध्यम से अपने ही एक परिचित मित्र के पूर्व जन्म की कहानी का चित्रण किया है। इसमें वर्णित प्रसंगों की सटीकता प्रमाणित करने के लिए किसी पुरातत्त्वेत्ता की दृष्टि को व्यर्थ प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं है। इस उपन्यास में पात्रों के मनोभावों को बड़ी सटीकता और सघनता से लिखा गया है जिससे कोई भी संवेदनशील पाठक अछूता नहीं रह सकता। अन्त:बाह्य जीवन के संघर्ष व रोमांचकता से परिपूर्ण सार्थकता को प्रस्तुत करनेवाला यह उपन्यास पाठकों को शुरू से अन्त तक बाँधे रखने में सक्षम है।
Alama Kabutari
- Author Name:
Maitreyi Pushpa
- Book Type:

-
Description:
मंसाराम कज्जा है और कदमबाई कबूतरी। नाजायज़ सन्तान है राणा—न कबूतरा न कज्जा। दोनों के बीच भटकता त्रिशंकु—संवेदनशील और स्वप्नदर्शी किशोर। अल्मा और राणा के बीच पनपते रागात्मक संबंधों की यह कहानी सिर्फ़ इतनी ही नहीं है कि राणा कल्पनालोक में रहता है और अल्मा जि़ंदगी के कठोर अनुभवों में पक रही है—वह हर स्थिति को सीढ़ी बनाकर दीवारें फाँदती कबूतरी है। 'अल्मा कबूतरी’ उस वास्तविक यथार्थ की जटिल नाटकीय कहानी है जो हमारे अनजाने ही आस-पास घटित हो रही है। अपनी उपस्थिति से हमें बेचैन करती है...
कभी-कभी सड़कों, गलियों में घूमते या अख़बारों की अपराध-सुर्ख़ियों में दिखाई देनेवाले कंजर, साँसी, नट, मदारी, सँपेरे, पारदी, हाबूड़े, बनजारे, बावरिया, कबूतरे—न जाने कितनी जन-जातियाँ हैं जो सभ्य समाज के हाशियों पर डेरा लगाए सदियाँ गुज़ार देती हैं—हमारा उनसे चौकन्ना सम्बन्ध सिर्फ़ कामचलाऊ ही बना रहता है। उनके लिए हम हैं कज्जा और 'दिकू’—यानी सभ्य-संभ्रांत परदेसी’, उनका इस्तेमाल करनेवाले शोषक—उनके अपराधों से डरते हुए, मगर उन्हें अपराधी बनाए रखने के आग्रही। हमारे लिए वे ऐसे छापामार गुरिल्ले हैं जो हमारी असावधानियों की दरारों से झपट्टा मारकर वापस अपनी दुनिया में जा छिपते हैं। कबूतरा पुरुष या तो जंगल में रहता है या जेल में...स्त्रियाँ शराब की भट्टियों पर या हमारे बिस्तरों पर...
अंग्रेज़ों के गज़टों-गज़ेटियरों में उनके नाम हैं 'अपराधी कबीले’ या सरकश जन-जातियाँ। मगर रामसिंह की माँ भूरी कबूतरी अपना सम्बन्ध जोड़ती है रानी पद्मिनी और राणा प्रताप से, शिवाजी और झाँसी की प्रति-रानी झलकारी बाई से—यानी उन सबसे जिन्होंने किसी साम्राज्य के आगे सिर नहीं झुकाया, भले ही इसके लिए वनवास की गुमनामी का ही वरण क्यों न करना पड़ा हो।
स्वतंत्र भारत में समाज की मुख्यधारा के किनारे फेंक दिए गए इन 'अदृश्य’ लोगों की लड़ाई आज भी जारी है, आज भी वे कमंद और सीढ़ियाँ लगाकर हमारी दुर्ग-दीवारों पर चढ़ते हें तो ऊपर बैठे हम तीर-कमान साधे उनका शिकार करने का सुख पाते हैं।
इन्हीं 'अपरिचित’ लोगों की कहानी इस बार उठाई है कथाकार मैत्रेयी पुष्पा ने 'अल्मा कबूतरी’ में। यह 'बुंदेलखंड की विलुप्त होती जनजातीय का समाज-वैज्ञानिक अध्ययन’ बिलकुल नहीं है, हालाँकि कबूतरा समाज का लगभग सम्पूर्ण ताना-बाना यहाँ मौजूद है—यहाँ के लोग-लुगाइयाँ, उनके प्रेम-प्यार, झगड़े, शौर्य इस क्षेत्र को गुंजान किए हैं।
Grihdaah
- Author Name:
Sharatchandra
- Book Type:

-
Description:
‘गृहदाह’ सामाजिक विसंगतियों, विषमताओं और विडम्बनाओं का चित्रण करनेवाला शरतचन्द्र का एक अनूठा मनोवैज्ञानिक उपन्यास है।
मनोविज्ञान की मान्यता है कि व्यक्ति दो प्रकार के होते हैं—एक अन्तर्मुखी और दूसरा बहिर्मुखी। ‘गृहदाह’ के कथानक की बुनावट मुख्यत: तीन पात्रों को लेकर की गई है। महिम, सुरेश और अचला। महिम अन्तर्मुखी है, और सुरेश बहिर्मुखी है। अचला सामाजिक विसंगतियाँ, विषमताओं और विडम्बनाओं की शिकार एक अबला नारी है, जो महिम से प्यार करती है। बाद में वह महिम से शादी भी करती है। वह अपने अन्तर्मुखी पति के स्वभाव से भली-भाँति परिचित है। मगर महिम का अभिन्न मित्र सुरेश महिम को अचला से भी ज़्यादा जानता–पहचानता है। सुरेश यह जानता है कि महिम अभिमानी भी है और स्वाभिमानी भी। सुरेश और महिम दोनों वैदिक धर्मावलम्बी हैं जबकि अचला ब्रह्म है। सुरेश ब्रह्म समाजियों से घृणा करता है। उसे महिम का अचला के साथ मेल–जोल क़तई पसन्द नहीं है। लेकिन जब सुरेश एक बार महिम के साथ अचला के घर जाकर अचला से मिलता है, तो वह अचला के साथ घर बसाने का सपना देखने लगता है। लेकिन विफल होने के बावजूद सुरेश अचला को पाने की अपनी इच्छा को दबा नहीं सकता है। आख़िर वह छल और कौशल से अचला को पा तो लेता है, लेकिन यह जानते हुए भी कि अचला उससे प्यार नहीं करती है, वह अचला को एक विचित्र परिस्थिति में डाल देता है।
सामाजिक विसंगतियों, विषमताओं और विडम्बनाओं का शरतचन्द्र ने जितना मार्मिक वर्णन इस उपन्यास में किया है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। महिम अचला की बात जानने की कोशिश तक नहीं करता है। निर्दोष, निरीह नारी की विवशता और पुरुष के अभिमान, स्वाभिमान और अहंकार का ऐसा अनूठा चित्रण गृहदाह को छोड़ और किसी उपन्यास में नहीं मिलेगा।
Nirmohi Bhanvara
- Author Name:
Prabodh Kumar Sanyal
- Book Type:

-
Description:
सुबह के पक्षी का प्रभात-वन्दना सुनकर तो हम उसकी प्रशंसा करते हैं, किन्तु पक्षी का धर्म स्वीकार करने में क्यों हिचकिचाते हैं? पक्षी का धर्म यानी स्वतंत्रता का उछाह-भरा आवेग और अपने जमाए-जुटाए से निर्मोह!
बांग्ला के प्रख्यात कथाकार प्रबोध कुमार सान्याल के चर्चित उपन्यास ‘बिबागी भ्रमर’ का यह अनुवाद बांग्ला के माधुर्य को बरकरार रखते हुए संलग्नता और विराग की इस कथा को हम तक पहुँचाता है।
पार्थ, नवेन्दु और हिना की यह कहानी रिश्तों के त्रिकोण की उतनी नहीं है जितनी पक्षी-धर्म यानी स्वातंत्र्य की चाहना की है। हिना अपनी व्यक्ति-चेतना को पत्नी की उस सीमित परिभाषा में नहीं ढल पाती जिसकी उम्मीद अन्तत: हर पुरुष करने लगता है, वह चाहे अपनी मान्यताओं में कितना भी प्रगतिशील क्यों न हो। पार्थ एक ठिकाना है जहाँ वे दोनों न सिर्फ़ अपना मन खोल पाते हैं, बल्कि स्वयं को भी नए सिरे से देखने की कोशिश करते हैं।
बांग्ला उपन्यासों-कहानियों की पठनीयता का प्रवाह और पात्रों का अपने जीवन-जगत में गहरे तक पैठे होना उन्हें लेखक से मुक्त करके हर पाठक की अपनी रचना बना देता है। यह कौशल इस उपन्यास में भी है। साथ ही है मानव-प्रकृति की अज्ञात तहों में उतरने का साहस जो समाजशास्त्रीय-वैचारिक आग्रहों से नहीं, जीवन को जस का तस देखने, उसे समझने की कोशिश करने और वास्तविकता को यथारूप ग्रहण करने की तैयारी से आता है।
Dehari Par Thithaki Dhoop
- Author Name:
Amit Gupta
- Book Type:

-
Description:
समलिंगी प्रेम की स्वाभाविकता और उसके इर्द-गिर्द उपस्थित सामाजिक-नैतिक जड़ताओं को उजागर करता यह उपन्यास अपने छोटे-से कलेवर में कुछ बड़े सवालों और पेचीदा जीवन-स्थितियों का धैर्यपूर्वक सामना करता है। परिवार की मौजूदा संरचना के बीचोबीच जाकर वह सम्बन्धों, भावनाओं और कामनाओं के संजाल में आपसी समझ का ऐसा रास्ता निकालता है जो पीड़ाजनक तो है, लेकिन आधुनिक वयस्क मन को फिर भी स्वीकार्य है।
समाज लेकिन उतना वयस्क अभी नहीं हो सका है, न ही तमाम तकनीकी कौशल के बावजूद उतना आधुनिक, उदार और मानवीय कि किसी नई शुरुआत को स्वीकार कर सके। अस्तित्व के यौन-पक्ष को लेकर आज भी भारतीय समाज उत्कंठा और वितृष्णा के विपरीत बिन्दुओं के बीच डोलता रहता है। जिसे वह प्राकृतिक कहता है, वह सेक्स भी उसे सहज नहीं रहने देता; जिसे वह कहता ही अप्राकृतिक है, उसकी तो बात ही क्या!
श्लोक सिंह को अपने यौन रुझान के चलते नौकरी से निकाल दिया जाता है, और अनुराग जो उसका प्रेमी है, और संयोग से श्लोक की पत्नी का भाई, हर उस लांछना का सामना करता है जो किसी सफल-सुखी व्यक्ति के लिए यूँ भी लोगों की जेबों में हर समय तैयार रहती हैं। गालियाँ, फटकार, हत्या की धमकी आदि।
लेकिन मीरा, श्लोक की पत्नी, जिसे उन दोनों के प्रेम की सबसे ज़्यादा क़ीमत चुकानी पड़ी, इतनी वयस्क है कि मनुष्य-मन की सूक्ष्मतर आत्मोप्लब्धियों को स्वीकार कर सके, अपनी स्वयं की क्षति को लाँघकर जीवन की नई दिशाओं के लिए द्वार खुला रख सके।
सरल और संक्षिप्त कथानक के माध्यम से यह उपन्यास धारा 377 के हटाए जाने के कुछ ही समय पहले शुरू होता है, और कोर्ट के इस वक्तव्य के कुछ बाद तक चलता है, कि ‘इतिहास को LGBTQ समुदाय से, उन्हें दी गई यातना के लिए माफ़ी माँगनी चाहिए।’
वस्तुत: यह उपन्यास समाज की खोखली मान्यताओं और संकीर्ण घेरेबन्दियों के विरुद्ध ज़्यादा खुली दुनिया के निर्माण की एक मार्मिक पुकार है।
Dalamber Ka Sapna
- Author Name:
Denis Diberot
- Book Type:

- Description: दिदेरो की यह कृति दरअसल तीन संवादों—‘दलाम्बेर और दिदेरो का संवाद’, ‘दलाम्बेर का सपना’ और ‘संवाद का उत्तर भाग’—की शृंखला है। बेहद दिलचस्प और मौलिक ढंग से विज्ञान के सवालों पर चर्चा करते हुए भी इसका मूल उद्देश्य जीवविज्ञान की प्रस्थापनाएँ प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि अधिभूतवाद, पारम्परिक नैतिकता, अलौकिक शक्तियों में विश्वास और दकियानूसी के विरुद्ध भौतिकवादी नियत्ववाद का बिगुल फूँकना था जिनका इस्तेमाल प्रभुत्वशाली वर्ग बाक़ी मनुष्यों के जीवन को नियंत्रित करने के लिए करता था। दिदेरो की ख़ास शैली में वैज्ञानिक चिन्तन और गीतात्मकता का मेल करनेवाली यह रचना इसीलिए क़रीब ढाई सौ वर्ष बाद भी दुनिया-भर के पाठकों को आकर्षित करती है।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book