Vicharon Ke Gyaraha Adhyaya
(0)
Author:
Rabindra Nath MahtoPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
300
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विचारों के ग्यारह अध्याय' झारखंड विधानसभा के अध्यक्ष श्री रबींद्रनाथ महतो द्वारा लिखित पुस्तक है, जिसमें उन्होंने राज्य गठन आंदोलन के दौरान और अपने लंबे राजनीतिक अनुभव से स्वयं में उपजे विचारों की प्रस्तुति की है। अलग-अलग विषयों पर लिखे गए ग्यारह अध्याय राज्य निर्माण के दर्शन, वर्तमान दशा तथा भविष्य की दिशा के विषय में तथ्यपरक एवं विचारोत्तेजक जानकारी प्रस्तुत करते हैं । संथाल, हूल से गांधीवाद तक, संसदीय परंपराओं से कार्यपालिका, विधायिका तथा न्यायपालिका के पारस्परिक संबंधों तक लेखक ने जहाँ एक ओर अलग-अलग सैद्धांतिक पहलुओं को छूने का प्रयास किया है, वहीं कृषि, शिक्षा, खेल और पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों पर भी अपने विचार प्रस्तुत किए हैं । पुस्तक के अंतिम भाग में अध्यक्ष के रूप में उनके द्वारा विधानसभा में दिए गए कुछ प्रमुख भाषण संकलित हैं।
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विचारों के ग्यारह अध्याय' झारखंड विधानसभा के अध्यक्ष श्री रबींद्रनाथ महतो द्वारा लिखित पुस्तक है, जिसमें उन्होंने राज्य गठन आंदोलन के दौरान और अपने लंबे राजनीतिक अनुभव से स्वयं में उपजे विचारों की प्रस्तुति की है।
अलग-अलग विषयों पर लिखे गए ग्यारह अध्याय राज्य निर्माण के दर्शन, वर्तमान दशा तथा भविष्य की दिशा के विषय में तथ्यपरक एवं विचारोत्तेजक जानकारी प्रस्तुत करते हैं । संथाल, हूल से गांधीवाद तक, संसदीय परंपराओं से कार्यपालिका, विधायिका तथा न्यायपालिका के पारस्परिक संबंधों तक लेखक ने जहाँ एक ओर अलग-अलग सैद्धांतिक पहलुओं को छूने का प्रयास किया है, वहीं कृषि, शिक्षा, खेल और पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों पर भी अपने विचार प्रस्तुत किए हैं ।
पुस्तक के अंतिम भाग में अध्यक्ष के रूप में उनके द्वारा विधानसभा में दिए गए कुछ प्रमुख भाषण संकलित हैं।
Book Details
-
ISBN9789394534018
-
Pages136
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Book Type:

- Description: उन्नीसवीं सदी उनमें से ज़्यादातर मूल्यों की जन्मदाता रही है जो बीसवीं सदी में भारत के जन-गण, राजनीति और सामाजिक गति-प्रगति के आधार-मूल्य रहे। आधुनिकता का विचार इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण है जो इसी सदी में भारत आया और जिसने हमें अपनी चारित्रिक बनावट को देखने के लिए एक नई दृष्टि दी। राष्ट्र का विचार और विभिन्न सांस्कृतिक प्रश्नों का उत्तर खोजने की ललक भी इसी सदी में पैदा हुई। परम्परा और आधुनिकता, तर्क और आस्था, विज्ञान और धर्म के तार्किक घात-प्रतिघात का यह समय आनेवाली सदियों में हमारी चिन्तनधारा की पृष्ठभूमि होना था। यह पुस्तक इस आलोड़नकारी समय में जाति के प्रश्न को टटोलती है। क्या आर्थिक आत्मनिर्भरता, विदेशी शोषकों के विरोध, स्त्री-शिक्षा और सामाजिक उत्थान के अन्य प्रश्नों की चेतना का यह दौर जाति को लेकर भी उतना ही उद्विग्न था? या फिर भारतीय समाज को आज तक अपने चंगुल में दबोचे रखनेवाली 'जाति' देश के जातीय पुनर्जागरण की समग्र धारणा में कहीं पीछे छूट गई थी? छूट गई थी तो क्या वह निष्क्रिय भी थी? क्या वह देश और मनुष्यता के बोध को भीतर-भीतर खा नहीं रही थी? और भारत का अग्रणी बौद्धिक वर्ग उसे लेकर कितना सचेत और विचलित था? यह सुदीर्घ पुस्तक इन्हीं प्रश्नों का उत्तर तलाशते हुए नवजागरणकालीन हिन्दी साहित्य को लेकर हुए नए शोध-कार्यों की रोशनी में एक सन्तुलित दृष्टि बनाने की कोशिश करती है। भारतेन्दुकालीन साहित्य और पत्रकारिता आदि के परिप्रेक्ष्य में जाति और स्त्री विषयक चिन्तन को लेकर जो एकांगी मान्यताएँ इधर प्रचलन में आई हैं, इसमें उनका भी निवारण करने का प्रयास किया गया है। इतिहास और साहित्येतिहास की श्रेणी से स्वयं को बाहर रखते हुए भी यह शोध-ग्रंथ इन दोनों विधाओं को जोड़ते हुए आलोचना की एक नई समझ का विस्तार करता है। भाषा की सामाजिक व्याप्ति, सत्ता की भाषा, वर्ण-धर्म-जाति के समीकरण, 1857 के स्वाधीनता संग्राम में जातियाँ और जातीय बोध आदि कई विषयों को व्यापक अध्ययन के आधार पर विश्लेषित करते हुए यह पुस्तक पाठकों, शोध-छात्रों और अध्येताओं को दृष्टि तथा ज्ञान, दोनों स्तरों पर समृद्ध करेगी।
Pragaitihas
- Author Name:
S. Irfan Habib
- Book Type:

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Description:
इस पुस्तक में उस युग की कहानी है जिस पर लिखित दस्तावेज़ों से कोई रोशनी नहीं पड़ती। यह पुस्तक ‘भारत का लोक इतिहास’ (पीपुल्स हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया) नामक एक बड़ी परियोजना का हिस्सा है, लेकिन इसे एक स्वतंत्र पुस्तक के रूप में भी देखा जा सकता है। तीन अध्यायों की इस पुस्तक के पहले अध्याय में भारत की भूगर्भीय संरचनाओं, मौसम में परिवर्तन तथा प्राकृतिक पर्यावरण (वनस्पति और प्राणी जगत) की उस हद तक चर्चा की गई है, जहाँ तक हमारे प्रागैतिहास और इतिहास को समझने के लिए प्रासंगिक है।
दूसरे अध्याय में मानव जाति की कहानी को पूरी दुनिया के सन्दर्भ में और फिर उसके अन्दर भारत के सन्दर्भ में पेश किया गया है। उसके औज़ार समूहों में परिवर्तन को औज़ार निर्माता लोगों के प्रकार के साथ जोड़कर देखा गया है। तीसरा अध्याय मूल रूप से खेती के विकास और उसके साथ-साथ शोषणकारी सम्बन्धों की शुरुआत का वर्णन करता है।
इस पुस्तक में इस बात की कोशिश की गई है कि ताज़ातरीन सूचनाएँ उपलब्ध प्रामाणिक ग्रन्थों और पत्रिकाओं से ही उद्धृत की जाएँ। यह भी कोशिश की गई है कि चीज़ों को ‘लोक-लुभावन’ तथा आडम्बरपूर्ण बनाए बग़ैर शैली को सरलतम रखा जाए। तकनीकी शब्दों के प्रयोग को न्यूनतम रखा गया है और यह भी प्रयास किया गया है कि प्रत्येक तकनीकी शब्द का प्रयोग करते समय वहीं पर उसकी एक परिभाषा प्रस्तुत कर दी जाए। प्रत्येक अध्याय के अन्त में एक पुस्तक सूची टिप्पणी भी दी गई है जहाँ उस विषय पर और अधिक सूचना देनेवाली महत्त्वपूर्ण पुस्तकों और लेखों को संक्षिप्त टिप्पणियों के साथ दर्ज किया गया है।
Dravida Rajneeti : Periyar Se Jayalalithaa Tak
- Author Name:
Praveen Kumar Jha
- Book Type:

- Description: दुनिया में ऐसा जन-समूह शायद ही कोई हो जिसकी आनुवंशिकी मिश्रित न हो। भारत में ही ख़ानाबदोश समाज से लेकर अनेक तरह के सैन्य और व्यापारिक आवागमन होते रहे जिनसे रक्त और भाषा दोनों का मिश्रण हुआ। देखें तो ये विषय विज्ञान के हैं लेकिन तमाम आर्थिक और सामाजिक कारणों से राजनीति का विषय हो जाते हैं। मिसाल के तौर पर उन्नीसवीं सदी में आर्य और द्रविड़ नस्लों का विभाजन जो आज़ादी के बाद आज तक कभी भाषा और कभी संस्कृति के विवादों में सामने आ जाता है। द्रविड़ राजनीति को आरम्भ से लेकर लगभग वर्तमान तक देखती-समझती यह पुस्तक इसी नस्ली विभाजन से अपनी बात शुरू करती है और थियोसोफ़िकल सोसायटी की स्थापना को इसका पूर्व-बिन्दु मानते हुए, कांग्रेस के गठन, दक्षिण में गांधी जी के हिन्दी प्रचार की शुरुआत और उसी दौरान पेरियार के रूप में एक ब्राह्मण-विरोधी व्यक्तित्व के उदय को द्रविड़ आन्दोलन की पहली निर्णायक घटना मानती है। उसके बाद दक्षिण बनाम उत्तर का समीकरण सामने आया। जब कांग्रेस ‘अंग्रेजो, भारत छोड़ो’ कह रही थी तब पेरियार ने ‘आर्यो, बाहर जाओ’ का नारा दिया और 1946 में ‘द्रविड़ कड़गम’ का झंडा तैयार हुआ। फिर अन्नादुरइ ने पेरियार से अलग अपने दल द्रविड़ मुनेत्र कड़गम की घोषणा की। स्वतंत्रता पूर्व इतिहास की इन पेचीदा गलियों से होती हुई द्रविड़ राजनीति की यह समीक्षा, एम.जी.आर., करुणानिधि, जयललिता, तमिल ईलम, राजीव गांधी की हत्या से होते हुए उत्तर और दक्षिण के ध्रुवीकरण की पड़ताल भी उसी गहराई से करती है और कोशिश करती है कि यह विरोध न रहे, भाषाओं का द्वन्द्व न हो, श्रेष्ठ और हीन का झगड़ा न हो। इतिहास और राजनीति पर केन्द्रित होते हुए भी इस किताब ‘द्रविड़ राजनीति : पेरियार से जयललिता तक’ की विशेषता ये है कि यह अत्यन्त तथ्य-संकुल पाठ को भी एकदम बोलचाल की भाषा और संवादधर्मी शैली में पाठक के सामने रखती है, ताकि वह इस मसले पर अपने निजी विषय की तरह सोच सके।
JYOTIPUNJ
- Author Name:
Narendra Modi
- Book Type:

- Description: The life of only those people in the world is purposeful who are able to dedicate a part or whole of their life in others’ good and service. Such great people have made special contribution in constructing the world’s history. In Bharat, in 1925 Rashtriya Swayamsevak Sangh was established to achieve the exalted goals of nation-building and individual-building. The work of the Rashtriya Swayamsevak Sangh has been progressing continuously. A large number of people have contributed in taking ahead this task. Prime Minister Shri Narendra Modi, a Swayamsevak himself, during his journey for refinement and transformation got an opportunity to come into contact with a number of selfless and devoted people who dedicated every moment of their lives and every particle of their bodies in the service of the Motherland. Reminiscences of some greatest social workers who relentlessly and untiringly burnt their lives to glow the motherland Maa Bharati.
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