Haldighati ka Yuddh
(0)
₹
350
₹ 280 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
"यह सार्वभौम सत्य है कि जैसे-जैसे मानव समुदाय, स्वराज्य व स्वराष्ट्र की रक्षा की जिम्मेदारी रहेगी, युद्ध अनिवार्य रहेगा। वर्तमान काल में युद्ध की प्रक्रिया एवं साधन के रूपों में नवीनतम बदलाव आया है। इसके साथ ही युद्धनीति एवं नवीन शस्त्रों में भी मूलभूत बदलाव हुआ है। वर्तमान समय में प्रत्येक युद्ध विगत युद्ध से कठिन एवं भयानक होता जा रहा है। यह सभी जानते हैं कि युद्ध एक आवश्यक बुराई है। इसलिए हम युद्ध संबंधी तथ्यों का अध्ययन कर इसकी बुराइयों की अवहेलना करते हुए शांति की खोज को वास्तविक रूप में बताना चाहते हैं, जो बहुत ही आवश्यक है। इस पुस्तक में युद्ध संबंधी घटनाओं का जो भी वर्णन है, उसमें मानव समुदाय को इस संकट से उबारने का भरसक प्रयास किया गया है। हल्दीघाटी का युद्ध क्यों हुआ?इसके क्या कारण थे? यह सब इस पुस्तक में बड़े ही मार्मिक ढंग से ऐतिहासिक शोधों के आधार पर प्रस्तुत किया गया है। आज इस बात की बड़ी आवश्यकता है कि आनेवाली पीढ़ी को किस प्रकार से युद्धों से बचाया जाए, जिससे वे शांति का मार्ग अपना सकें। यह पुस्तक निस्संदेह अध्यापन एवं संग्रह के योग्य है। इसमें हल्दीघाटी के युद्ध का प्रारंभिक काल से लेकर युद्ध के अंतिम छोर तक वर्णन किया गया है।
Read moreAbout the Book
"यह सार्वभौम सत्य है कि जैसे-जैसे मानव समुदाय, स्वराज्य व स्वराष्ट्र की रक्षा की जिम्मेदारी रहेगी, युद्ध अनिवार्य रहेगा। वर्तमान काल में युद्ध की प्रक्रिया एवं साधन के रूपों में नवीनतम बदलाव आया है। इसके साथ ही युद्धनीति एवं नवीन शस्त्रों में भी मूलभूत बदलाव हुआ है।
वर्तमान समय में प्रत्येक युद्ध विगत युद्ध से कठिन एवं भयानक होता जा रहा है। यह सभी जानते हैं कि युद्ध एक आवश्यक बुराई है। इसलिए हम युद्ध संबंधी तथ्यों का अध्ययन कर इसकी बुराइयों की अवहेलना करते हुए शांति की खोज को वास्तविक रूप में बताना चाहते हैं, जो बहुत ही आवश्यक है।
इस पुस्तक में युद्ध संबंधी घटनाओं का जो भी वर्णन है, उसमें मानव समुदाय को इस संकट से उबारने का भरसक प्रयास किया गया है। हल्दीघाटी का युद्ध क्यों हुआ?इसके क्या कारण थे? यह सब इस पुस्तक में बड़े ही मार्मिक ढंग से ऐतिहासिक शोधों के आधार पर प्रस्तुत किया गया है। आज इस बात की बड़ी आवश्यकता है कि आनेवाली पीढ़ी को किस प्रकार से युद्धों से बचाया जाए, जिससे वे शांति का मार्ग अपना सकें। यह पुस्तक निस्संदेह अध्यापन एवं संग्रह के योग्य है। इसमें हल्दीघाटी के युद्ध का प्रारंभिक काल से लेकर युद्ध के अंतिम छोर तक वर्णन किया गया है।
Book Details
-
ISBN9789390825332
-
Pages136
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Aadhunik Itihas Mein Vigyan
- Author Name:
Om Prakash Prasad
- Book Type:

-
Description:
भारत में आधुनिक विज्ञान का नक़्शा बनाने में हिन्दुओं से ज़्यादा मुसलमानों और मुसलमानों से ज़्यादा भूमिका अंग्रेज़ों की रही। आज़ादी के पूर्व से ही भारत जात-पाँत और ऊँच-नीच के दलदल में फँसा हुआ है। आधुनिक भारतीय इतिहास पर भारत में जितनी पुस्तकें लिखी गईं, उनमें से अधिकांश के लेखक हिन्दू रहे। उनके द्वारा अधिकांश पुस्तकें भारत के प्रमुख नेताओं के पक्ष में, अंग्रेज़ों के विरोध में, मुसलमानों के योगदान और वैज्ञानिक गतिविधियों को नज़रअन्दाज़ करते हुए लिखी गईं।
आधुनिक काल के क़रीब सभी भारतीय वैज्ञानिक इंग्लैंड से विज्ञान पढ़-लिख-जान कर आए। भारत के निवासियों को अंग्रेज़ों ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अथवा छूत-अछूत अथवा हिन्दू-मुसलमान में कोई भेदभाव न कर सबको एक नाम भारतीय दिया। भारत का मानचित्र भी अंग्रेज़ों ने तैयार किया। अंग्रेज़ी शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाएँ, बैंक, प्रयोगशाला, रेलवे आदि सब अंग्रेज़ों की देन है। कलकत्ता में अंग्रेज़ों ने अपने कर्मचारियों को भारतीय भाषाओं से परिचित कराने के लिए फ़ोर्ट विलियम कॉलेज नमक विशेष विद्यालय की स्थापना की थी, जहाँ भारतीय भाषाओं में अनेक पाठ्य-पुस्तकों की रचना भी की गई। अठारहवीं सदी में महलों, सड़कों, पुलों आदि से युक्त अनेक नए नगर पैदा हुए। अठारहवीं सदी में भारत में विशेष रूप से बंगाल में यूरोपीय शैली के भवन भी बनने लगे थे। 1882 में टेलीफ़ोन आया। 1914 में प्रथम ऑटोमेटिक टेलीफ़ोन एक्सचेंज लगाया गया। अगस्त 1945 से लम्ब्रेटा स्कूटर बनना शुरू हुआ।
प्रस्तुत पुस्तक में आधुनिक वैज्ञानिकों पर संक्षेप में प्रकाश डाला गया है। इन सभी वैज्ञानिकों को सर्वाधिक प्रोत्साहन एवं प्रेरणा इंग्लैंड से मिली। प्रथम अध्याय में आधुनिक भारतीय वैज्ञानिक उपलब्धियों की चर्चा की गई है। प्रथम और द्वितीय महायुद्ध के दौरान भारत में विज्ञान की एक विशेष धारा दिखाई देती है। आधुनिक तकनीक और सामाजिक विकास से भारत किन-किन रूपों में प्रभावित हुआ, इसका विशद वर्णन दूसरे अध्याय में किया गया है। इसके अलावा 'द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान तकनीक एवं समाज’, 'द्वितीय महायुद्ध के उपरान्त’, 'विज्ञान एवं पेट्रोल’, 'प्लास्टिक और चलचित्र तकनीक’, 'आपदा प्रबन्धन’ और 'भारतीय विज्ञान एवं अंग्रेज़ों का योगदान’ आदि अध्यायों में आधुनिक भारत में विज्ञान के विभिन्न चरणों पर संक्षेप में प्रकाश डाला गया है।
Bhajpa Hinduttva Aur Musalman
- Author Name:
Vedpratap Vaidik
- Book Type:

-
Description:
‘भाजपा, हिन्दुत्व और मुसलमान’ अपने ढंग की अनूठी कृति है। इस विषय का यह पहला मौलिक और विचारोत्तेजक ग्रन्थ है। उक्त तीनों मुद्दों और उनके आपसी सम्बन्धों पर जितनी गहराई और जितने कोणों से विद्वान लेखक ने विचार किया है, अब तक किसी भी ग्रन्थ में नहीं किया गया है। भाजपा का असली संकट क्या है, उसका समाधान क्या है, उसका भविष्य कैसा है, वह कहीं कांग्रेस की कार्बन-कॉपी तो नहीं बन गई है, संघ और भाजपा के बीच अन्तर्द्वन्द्व के मुद्दे कौन-कौन से हैं, आदि अनेक प्रश्नों पर डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया है।
सावरकर का हिन्दुत्व अब कितना प्रासंगिक रह गया है? उसमें से क्या घटाया और क्या जोड़ा जाए, इस जटिल और विवादास्पद विषय पर डॉ. वैदिक ने जो मौलिक विचार प्रस्तुत किए हैं, वे भाजपा ही नहीं, 21वीं सदी के भारत के लिए भी ध्यातव्य हैं। हिन्दुत्व और इस्लाम के नाम पर चले अभियानों पर लेखक के जिन बेबाक निबन्धों ने देश की तत्कालीन राजनीति पर सीधा असर डाला था, वे भी इस ग्रन्थ में संकलित किए गए हैं। इस ग्रन्थ में कुछ निबन्ध ऐसे भी हैं, जिनके बारे में आपको लगेगा कि वे अपने आप में एक-एक ग्रन्थ के बराबर हैं। मुस्लिम राजनीति और मुसलमानों के प्रति भाजपा के रवैए पर भी लेखक ने अपनी दो-टूक राय ज़ाहिर की है। मुसलमान भारतीय इतिहास को कैसे देखें और शेष भारत मुसलमानों को कैसे देखे, आदि अत्यन्त पेचीदा और नाजुक मुद्दों पर भी लेखक ने अपने निर्भीक विचार प्रस्तुत किए हैं। डॉ. वैदिक के ये निबन्ध राजनेताओं, विद्वानों, पत्रकारों और प्रबुद्ध पाठकों के लिए दिशा-बोधक और उपयोगी हैं।
Dekho Hamri Kashi
- Author Name:
Hemant Sharma
- Book Type:

- Description: काशी ज्ञान की शलाका है और बनारस औघड़ों का ठहाका है। काशी रहस्यों की गहराई है, बनारस किस्सों की ठंडाई है। काशी दिव्य है, बनारस भव्य है। काशी प्रणम्य है, बनारस रम्य है | काशी मुक्ति है, विरक्ति है; लेकिन बनारस हेमंतजी की परम आसक्ति है। यदि काशी में बनारस की तलाश है तो “देखो हमरी काशी ' की उँगली पकड़िए'''रस-ही- रस। गद्य में पद्य का रस, राग और लय का आनंद इस पुस्तक की हर कथा की प्रत्येक पंक्ति में है। इन कथाओं में तथ्य, तर्क और भाव-प्रवाह भरपूर है। जैसा रस “बैताल पचीसी' की कथाओं में है कि उन्हें कोई सामान्य पाठक भी पढ़े तो उसका मनोरंजन होगा। कोई समझदार व्यक्ति पढ़े तो उसे जहाँ ज्ञान प्राप्त होगा, वहीं उसे जीवन जीने का मार्ग भी मिल सकता है। यही बात हेमंतजी की इन कथाओं में है । इसमें ऐसे पात्र हैं, जो हेमंतजी के या हमारे-आपके अपने रोजमर्रा के जीवन के ताने-बाने में गुँथे हुए हैं । वे इतने अभिन्न हैं कि उन्हें अलग-अलग देखना संभव नहीं हो पाता । यह पुस्तक संस्मरण विधा में एक नवोन्मेष है। यह संस्मरण काशी की संस्कृति और बनारसी जीवन का रंगमंच प्रतीत होता है। इसमें वर्णित व्यक्तियों के जरिए काशी की संस्कृति, परंपरा और जीवनधारा की खोज की गई है। जो सदियों से सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन के अपरिहार्य अंग रहे हैं । ऐसे लोगों को केंद्र में रखकर कथा बुनी गई है । इस पुस्तक के पात्र चाहे जो हों, वे सामाजिक जीवन में साधारण भले माने जाते हों, पर कथा में वे असाधारण हैं ।
Asahmati Ki Aawazein
- Author Name:
Romila Thapar
- Book Type:

-
Description:
असहमति भारतीय जनजीवन का हमेशा से हिस्सा रही है लेकिन इन दिनों किसी भी असहमति को भारत-विरोधी ठहरा दिया जाता है। भारतीय अतीत को दोषमुक्त मानने वाले लोग असहमति की अवधारणा को विदेशी मानते हैं और असहमतिपूर्ण विचारों की ज़रूरत को नकारते हैं। लेकिन ‘असहमति की आवाज़ें’ बतलाती है कि भारतीय उपमहाद्वीप में असहमति का लम्बा इतिहास रहा है, भले ही सदियों में इसके रूप विकसित या परिवर्तित हो गए हैं। लेखक असहमति की अभिव्यक्ति और उसके अहिंसक रूपों पर विचार करते हुए इसे भारतीय ऐतिहासिक अनुभव के अंग के रूप में समय के विभिन्न बिन्दुओं और सन्दर्भों से जोड़ती हैं। प्राचीन वैदिक काल से शुरू करते हुए जैन, बौद्ध, आजीविक आदि समूहों के उद्भव और इससे आगे, मध्यकाल के भक्ति सन्तों और अन्य के विचारों को परखती हुई वह हमें असहमति के उस प्रमुख बिन्दु, महात्मा गांधी के सत्याग्रह, तक ले जाती हैं जिसने आज़ाद और लोकतांत्रिक भारत की स्थापना में मदद की। वह इस बात पर बल देती हैं कि किस तरह धर्म ने हमेशा सामाजिक परिवर्तन को प्रतिबिम्बित किया है, और वर्तमान में धर्म के राजनीतिकरण के साथ अपनी बात पूरी करती हैं। वह असहमति के विशेष रूपों पर जन-प्रतिक्रिया को रेखांकित करते हुए सीएए और एनआरसी के ख़िलाफ़ शाहीनबाग़ जैसे शान्तिपूर्ण विरोध का हवाला देती हैं। इसमें यह प्रश्न निहित है कि धर्म का मुहावरा ज़रूरी है या नहीं। उनके अनुसार, हमारे वक़्त में असहमति सुनने लायक, स्पष्ट, अन्याय-विरोधी और लोकतांत्रिक अधिकारों का समर्थक होनी चाहिए। संवाद के ज़रिये असहमति और बहस की अभिव्यक्ति ही समाज में सकारात्मक बदलाव लाती है।
भारत की शीर्षस्थ जन-बुद्धिजीवी की यह किताब उन सबके लिए एक आवश्यक पाठ है, जो न सिर्फ़ भारत के अतीत को बल्कि भारतीय समाज और राष्ट्र की दिशा को भी उसके सही परिप्रेक्ष्य में जानना-समझना चाहते हैं।
Uttar Pradesh Ka Swatantrata Sangram : Sant Kabir Nagar
- Author Name:
Ajay K. Pandey
- Book Type:

- Description: संत कबीर नगर की भौगोलिक व सांस्कृतिक सीमा के अंतर्गत प्राचीनकाल से लेकर मध्यकाल और विशेष रूप से स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के दौरान ऐतिहासिक महत्त्व की अनेक घटनाएँ हुई हैं जिनका विवरण इस पुस्तक में दिया गया है। 1857 से लेकर 1947 तक इस क्षेत्र ने देश की आजादी के लिए लड़ी जा रही लड़ाई में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। इसके अलावा देश की सांस्कृतिक अस्मिता के लिहाज से भी इस जनपद का विशेष स्थान है। इस क्षेत्र में शृंगार के कवि रंग नारायण पाल 'रंगपाल' और रामदेव सिंह 'कलाधर' जैसी साहित्यिक विभूतियाँ भी रही हैं जिनकी विस्तृत जानकारी इस पुस्तक में दी गई है। इसके अलावा यहाँ के औद्योगिक तथा वाणिज्यिक परिदृश्य को भी इस अध्ययन में शामिल किया गया है ताकि स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों का संपूर्ण परिप्रेक्ष्य स्पष्ट हो सके। प्राचीन मंदिर और उनसे जुड़ी जनश्रुतियाँ भी इस परिदृश्य का अभिन्न अंग हैं।
END OF INDENTURE An Agonising Journey To Freedom
- Author Name:
Dr. Ruchi Verma +2
- Book Type:

- Description: Growing public outrage finally forced the abolition of the curse of slavery starting with the year 1833. An immensely welcome step soon brought to the fore another major challenge of severe labour shortages in the plantation colonies. The colonial rulers devised another deceptive tool of engaging large scale cheap labour for their plantations under the so-called ‘Indenture system’. The British carried out the largest such operation and mobilised close to 2 million workers from India and carried them to far off lands in the Caribbean, Africa and the Pacific. On the face of it, these workers were taken under a mutually agreed contract, called the ‘agreement’ which also led to the popular folklore of ‘girmit’. However, in terms of protection of the workers’ basic rights, this system was really no different from the erstwhile slavery. Generations of these workers struggled in agony for achieving the eventual liberation from this de-facto bondage. The plight of the indentured workers also deeply moved the Indian leadership especially Mahatma Gandhi who personally witnessed their sufferings in South Africa and Mauritius. Rising and loud criticism started demanding the abolition of indentureship in the plantation colonies, India and elsewhere. There was another unexpected pressure for able-bodied men for the First World War operations in Europe. These factors together forced the colonial powers to finally abolish the indenture system in the year 1917. Hence, the year 2017 marked the centenary of this landmark development widely celebrated along the entire 'indentured route' namely Mauritius, Fiji, Trinidad & Tobago, Guyana and Suriname. As in most of these countries, the majority of the populations are of Indian origin, this was also a cause for celebration in India. The Antar Rashtriya Sahayog Parishad with its 40 years of outreach with the Indian diaspora, especially the Girmitiya countries organised a special commemorative International conference on 20-22 April 2017 in collaboration with Indira Gandhi National Centre for the Arts (IGNCA) and Indian Council for Cultural Relations (ICCR). In addition to being addressed by Indian leadership, the conference was attended by over 100 experts from India and abroad. This book is a compilation of the proceedings, presentations and the outcomes of this important event. We hope that this publication would be useful to academics and scholars dealing with diaspora and history of the indentured system.
Manipur in Flames: Conspiracy of The Cross
- Author Name:
Jagdamba Mall
- Book Type:

- Description: This book is a compelling analysis of the causes behind the unrest in Manipur since 3rd May 2023. It examines the factors, consequences and involvement of national and international organisations, including Church bodies like AMCO, CBCNEI, BWA and WCC along with global players like USA, UK, China and UNO. The book narrates the history of Manipur. The contribution of Meitei community in nation building is highlighted. It explores the immigration of Kuki population from Myanmar, encouraged by British Political Agent Major W. McCulloch (1844-67) with ulterior motives, the separation of Hills administration and the Church's conspiracy to convert Kukis to Christianity to create a rift with Meitei Hindus and India. This is a must-read for historians, sociologists, political activists, social workers and research scholars.
Rohtasgarh Fort
- Author Name:
Wopendranath Ghosh
- Book Type:

- Description: The republication of the book, Rohtas Garh, by Wopendranath Ghosh, a member of the Bengal Provincial Civil Service in the early decades of the twentieth century, is an important step in this direction. The book was first published in 1908 and derives from the author’s sincere and keen interest in the history of the notable places with which he came into contact during the course of his service. This deeply researched book is about Rohtas Garh Fort, an important historical and cultural site in Bihar, located in the present-day Rohtas district. It has a history connected with the ancient, medieval and modern history of Bihar. The place in ancient India is associated with the exploits of Satyavadi Raja Harishchandra, who is famous for his love of truth and charity. A must-read classic book for people who have an interest in history.
Kranti Ki Ibarten
- Author Name:
Sudhir Vidyarthi
- Book Type:

- Description: Kranti Ki Ibarten
Papa Restart Na Hue
- Author Name:
Alok Puranik
- Book Type:

- Description: ज़िंदगी जीने की तकनीक भले ही सबको समझ न आई हो, पर तकनीक बहुत गहराई से जिंदगी में घुस गई है। मोबाइल फोन जीवनसाथी से भी बड़ा जीवनसाथी हो गया है—24×7 का साथ है। नई पीढ़ी को फ्रेंडशिप के नाम पर फेसबुक याद आने लगता है। बहुत चीजें बदली हैं, पर बहुत चीजें नहीं भी बदली हैं। यह असंभव है कि जिसके फेसबुक पर पाँच हजार फ्रेंड हों, मौकेजरूरत पर उसे चार फ्रेंड का साथ भी उपलब्ध न हो। नई पीढ़ी नए फेसबुक के संदर्भ में नई फ्रेंडशिप के आशय को बखूबी समझने की कोशिश कर रही है। यह व्यंग्यसंग्रह बदलती तकनीक के संदर्भ में बुनियादी मानवीय रिश्तों को जाननेसमझने की कोशिश करता है। बाजार, तकनीक के बदलावों ने इनसान को किस तरह से बदला है और कहाँ से न बदल पाया है, इसका लेखाजोखा इस संग्रह में है। बदलते समाजशास्त्रअर्थशास्त्र को पकड़ने की कोशिश आलोक पुराणिक ने इस व्यंग्यसंग्रह में की है। वे इस काम को बेहतर तरीके से इसलिए कर पाते हैं कि वे एक तरफ कॉमर्स के एसोसिएट प्रोफेसर हैं, तो दूसरी तरफ समाज, तकनीक के महीन बदलावों पर पैनी नजर रखनेवाले व्यंग्यकार। बदलती तकनीक, बदलते बाजार के आईने में बदलते समाज को समझने के लिए यह व्यंग्यसंग्रह पढ़ना जरूरी है। व्यंग्यसंग्रह पूरा पढ़ने के बाद सिर्फ हँसी ही आपके साथ नहीं होगी, बल्कि अपने वक्त के बारे में ज्यादा समझदारी भी आप पैदा कर चुकेंगे।
Sensex Kshetriya Dalon Ka
- Author Name:
Aaku Shrivastava
- Book Type:

- Description: प्रसिद्ध पत्रकार अकु श्रीवास्तव की यह पुस्तक आजाद भारत की राजनीति के इतिहास में केंद्र के बरक्स राज्यों के बीच अंतर्विरोधों और द्वंद्वो के साथ उपजे क्षेत्रीय दलों के उतार-चढ़ाव का समग्र अध्ययन करती है। ये अंतर्विरोध सबसे पहले पिछली सदी के सत्तर के दशक में तब प्रकट हुए थे, जब सात-आठ राज्यों में स्थानीय राजनीतिक स्पृहाओं ने अपनी संयुक्त सरकारें बनाकर केंद्रवादी कांग्रेस की नीतियों की जगह स्थानीयतावादी विकल्प पेश किए। भाषागत व स्थानीय सांस्कृतिक अस्मिताओं ने इस परिवर्तन को संभव किया केंद्र में भी दो बार गैर कांग्रेसी दलों व स्थानीय स्पृहमाओं ने सरकारें बनाईं। ग्लोबलाइजेशन के दौर में विकेंद्रीकरण की यह वृत्ति और भी ताकतवर हुई। शायद इसीलिए अब जब कांग्रेस के केंद्रवाद की जगह भाजपा ले चुकी है, तब भी बहुत सी स्थानीयतावादी अस्मिताएँ भाजपा के केंद्रवाद से भी टकराती रहती हैं। जम्मू- कश्मीर, तमिलनाड, केरल, बंगाल, ओडिशा, केरल आदि तो केंद्रवाद को अरसे से टक्कर देते ही रहे हैं, महाराष्ट्र पंजाब और दिल्ली भी इसी लाइन में है और सत्ता से बाहर होकर भी बिहार, यू.पी. आदि के स्थानीय दल केंद्रवाद से टकराते रहते हैं । अकु श्रीवास्तव भारतीय राजनीति के इस बुनियादी अंतर्विरोध के विविध आयामों को गहराई में जाकर पकड़ते हैं और बताते हैं कि यह अंतर्विरोध हमारी समकालीन राजनीति का वह अतरंग अंतर्विरोध है, जो प्रत्यक्षतः जनतंत्र के लिए अभिशाप नजर आता है, लेकिन परोक्षतः वही जनतंत्र को जीवित रखनेवाला मालूम होता है । मेरी नजर में यह पुस्तक समकालीन और भावी राजनीति की नब्ज को समझने के लिए एक एकदम पठनीय है। --सुधीश पचौरी
Bharatiya Videsh Neeti
- Author Name:
Jn Dixit
- Book Type:

- Description: प्रस्तुत पुस्तक में भारत के पूर्व विदेश सचिव श्री जे.एन. दीक्षित द्वारा पचास वर्षो की अवधि के विस्तृत फलक पर भारतीय विदेश नीति के विभिन्न चित्र सशक्त तथा प्रभावशाली ढंग से उकेरे गए हैं । लेखक ने 1947 को भारतीय विदेश नीति का आरंभ काल माना है । इन्होंने बताया है कि पं. जवाहरलाल नेहरू ने भारत की विदेश नीति का मूलाधार रखा तथा इसके बाद उनके उत्तराधिकारियों ने इस दिशा में किस प्रकार से व्यापक और महत्त्वपूर्ण योगदान दिया । इस महत्त्वपूर्ण आख्यान का वर्णन करते समय लेखक ने कालक्रमानुसार भारत की विदेश नीति के विविध पक्षों को उजागर किया है । इसके साथ ही उन पक्षों के राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पड़नेवाले प्रभावों का भी विवेचन किया है तथा ऐसी युगांतकारी घटनाओं को शामिल किया है जिनका भारतीय विदेश नीति की प्राथमिकताओं पर प्रभाव पड़ा है । इसके अतिरिक्त इस पुस्तक में उन घटनाओं के परिणामों तथा प्रतिक्रियाओं का भी विश्लेषण किया गया है । उदाहरण के तौर पर-सन् 1947-48, 1965 तथा 1971 में भारत-पाक युद्ध; संयुक्त राष्ट्र का संदेहास्पद रवैया तथा कश्मीर का मुद्दा; 1962 में भारत-चीन युद्ध; 1979 में अफगानिस्तान पर सोवियत संघ का कब्जा; महाशक्तिशाली सोवियत संघ का विघटन; कश्मीर की समस्या तथा पाकिस्तान की ' परोक्ष युद्ध ' की कार्यनीति; 1991 में खाड़ी युद्ध; मई 1998 में भारत-पाक द्वारा किए गए परमाणु परीक्षण । इस पुस्तक में विश्व के विभिन्न देशों-विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका, सोवियत संघ, चीन तथा पाकिस्तान के साथ भारत के संबंधों का आलोचनात्मक मूल्यांकन करते हुए घटनाओं के संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय संबंधों का विशद विवेचन किया गया है । भारतीय विदेश नीति को आधार बनाकर लिखी गई यह पुस्तक निस्संदेह एक उत्कृष्ट कृति है ।
Marang Gomke Jaipal Singh Munda
- Author Name:
Ashwani Kumar 'Pankaj'
- Book Type:

- Description: कौन थे जयपाल सिंह मुंडा? इनका भारतीय स्वतंत्रता और नए भारत के निर्माण में राजनीतिक-बौद्धिक योगदान क्या था? वे जिस आदिवासी समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, उसकी आकांक्षाएँ क्या थीं? इस बारे में आजादी के सत्तर साल बाद भी इतिहास चुप है। एक तरफ गांधी-नेहरू, जिन्ना, अंबेडकर सहित अनेक राजनीतिज्ञों पर सैंकड़ों पुस्तकें हैं, पर जयपाल सिंह मुंडा पर एक भी नहीं है। यह कितनी हैरत की बात है कि झारखंड आंदोलन में कूदने से पहले और देश के संविधान निर्माण सभा में लाखों आदिवासियों के लिए निडरता से दहाड़नेवाले जिस आदिवासी ने देश के लिए आई.सी.एस. छोड़ी, जिसकी कप्तानी में भारत ने पहला हॉकी का ओलंपिक स्वर्ण जीता, जिसने अफ्रीका और भारत के कॉलेजों में अध्यापन के दौरान अपनी शिक्षकीय योग्यता से प्रभु वर्ग को प्रभावित किया, जो गुलाम भारत में किसी ब्रिटिश कंपनी में सर्वोच्च पद पर काम करनेवाला पहला भारतीय (वह भी आदिवासी) था, जिससे पढ़ने के लिए भारत के राजा-रजवाड़े लालायित रहते थे, जो ऑक्सफोर्ड से अर्थशास्त्र में गोल्डमेडलिस्ट था, हॉकी में एकमात्र भारतीय ‘ऑक्सफोर्ड ब्लू’ खिलाड़ी था और जो कॉलेज के दिनों में विभिन्न सभा-सोसायटियों का नेतृत्वकर्ता संयोजक-अध्यक्ष था, उसे इस लायक भी नहीं समझा गया कि उसकी चर्चा हो। —इसी पुस्तक से
Itihas, Sanskriti Aur Sampradayikta
- Author Name:
Gunakar Muley
- Book Type:

-
Description:
गुणाकर मुळे को हम विज्ञान विषयों के लेखक के रूप में जानते हैं। उन्होंने हिन्दी पाठकों को सरलतम शब्दावली में विज्ञान की कठिन अवधारणाओं, आविष्कारों और खोजों से परिचित कराया। लेकिन उनके लेखन का उद्देश्य वैज्ञानिक दृष्टि को आमजन की जीवन-शैली और विचार का हिस्सा बनाना था। इसीलिए उन्होंने शुद्ध सूचनात्मक वैज्ञानिक लेखक के साथ संस्कृति, समाज, धर्म, अंधविश्वास आदि पर भी हमेशा लिखा। मार्क्सवाद उनकी वैचारिक भूमि रहा और आधुनिक जीवन-मूल्य उनके अभीष्ट। यह किताब उनके ऐसे ही लेखन का संकलन है जिसमें संस्कृति, धर्म, हिन्दुत्व की राजनीति, आर्यों का मूल आदि विभिन्न विषयों पर उनका लेखन शामिल है। पाठक इन लेखों में काफ़ी कुछ नया पाएँगे।
रामकथा को लीजिए। आज राम को लेकर देश में साम्प्रदायिक तनाव पैदा करने के प्रयास जारी हैं। मगर राम काफ़ी हद तक एक मिथकीय चरित्र है, इस बात के पर्याप्त सबूत वाल्मीकि-रामायण में ही मौजूद हैं।
शिवाजी जैसे कई ऐतिहासिक चरित्रों को विकृत रूप में पेश करके मुस्लिम-द्वेष को उभारने के प्रयास हो रहे हैं। मगर प्रामाणिक इतिहास इस बात की गवाही देता है कि शिवाजी रत्ती-भर भी मुस्लिम-द्वेषी नहीं थे। इस बात को 'ऐसा था शिवाजी का राजधर्म' लेख में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
इधर के वर्षों में देश में धार्मिक असहिष्णुता और साम्प्रदायिकता में तेज़ी से वृद्धि हुई है। इस पर रोक लगाने के लिए आम जनता को शिक्षित करना अत्यावश्यक है—उनकी अपनी भाषा में। साम्प्रदायिकता अपने प्रचार-प्रसार के लिए आम जनता की भाषा का भरपूर उपयोग कर रही है। साम्प्रदायिकता के प्रतिकार के लिए भी जनता की भाषा का ही उपयोग होना चाहिए। इस तरह गुणाकर मुळे की यह पुस्तक तमाम मुद्दों से टकराते हुए ऐसे कैनवस की रचना करती है, जहाँ विचार-विमर्श अपने सृजनात्मक रूप में सम्भव हो सके।
Rashtriya Swayamsevak Sangh : Swarnim Bharat Ke Disha-Sootra
- Author Name:
Sunil Ambekar
- Book Type:

- Description: यद्यपि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दीर्घ-यात्रा पर अनेक पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं, फिर भी संघ सदैव ही सुर्खियों में रहता है। हाल के दिनों में संघ के कामकाज को लेकर उत्सुकता बढ़ गई है, क्योंकि एक ओर इन दिनों में बहुत से स्वयंसेवक सरकार में शीर्ष पदों पर पहुँचे हैं, वहीं दूसरी ओर संघ के हिंदू-राष्ट्र और एकात्मता के मूल विचार अब हमारे सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र की मुख्यधारा बन गए हैं। भारत के लिए संघ का दृष्टिकोण क्या है? यदि भारत एक हिंदू-राष्ट्र बन जाता है, तो इसमें मुसलमानों और अन्य धर्मों का क्या स्थान होगा? इतिहास-लेखन की संघ की परियोजना कितनी बड़ी है? क्या हिंदुत्व जाति की राजनीति को खत्म कर देगा? परिवार की बदलती प्रकृति और विभिन्न सामाजिक अधिकारों पसंघ का क्या दृष्टिकोण है? संघ के वरिष्ठ प्रचारक सुनील आंबेकरजी ने इस पुस्तक में इन सवालों का विश्लेषण किया है। आंबेकरजी को तथ्यों की गहरी समझ है, इसी कारण से वे विचार की स्पष्टता और उसके विस्तार, दोनों पर ध्यान केंद्रित करने में सफल हुए हैं। एक स्वयंसेवक के रूप में उन्होंने शाखा पद्धति में कार्य किया है और उसे अपने जीवन में जिया है, उसी के आधार पर संघ की आंतरिक कार्य-प्रणाली, निर्णय-प्रक्रिया और समन्वयक-दृष्टि पर गहराई से दृष्टिपात किया है। वास्तविक जीवन के अनुभवों से भरपूर ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ : स्वर्णिम भारत के दिशा-सूत्र’ उन सभी के लिए एक पठनीय पुस्तक है, जो संघ-शक्ति की कार्यप्रणाली और इसकी भविष्य की योजनाओं को समझने के इच्छुक हैं।
Hindu Muslim Rishte
- Author Name:
Aashutosh Varshney
- Book Type:

-
Description:
समाज-विज्ञान के क्षेत्र में ऐसी किताबें कम ही हैं जो अपने भारी-भरकम विषय में प्रमुख स्थान बनाने के साथ ही अपने लेखक को स्थापित कर दें। यह एक ऐसी ही किताब है। पर इसके लिए तर्कों और विचारों की नवीनता और विलक्षणता के साथ लेखक का श्रम भी श्रेय का हक़दार है। हिन्दू-मुस्लिम दंगों सम्बन्धी काफ़ी विवरणों को छान डालने के बाद लेखक ने छह शहरों का सघन अध्ययन भी किया है—इसमें वर्षों का श्रम लगा है, अनेक सहयोगियों की मदद लेनी पड़ी है और सम्भवतः लाखों डॉलर ख़र्च हुए हैं।
लेकिन दंगों और नागरिक समाज की मुस्तैदी या ढील में एकदम स्पष्ट रिश्ता देखने-दिखाने वाली इस किताब ने इस सब श्रम-ख़र्च और बौद्धिक ऊर्जा के ख़र्च की सार्थकता साबित की है, लेखक ने ठोस प्रमाणों के आधार पर अभी तक प्रचलित जातीय दंगों सम्बन्धी उन सब सिद्धान्तों को ख़ारिज किया है जो अनेक प्रश्न अनुत्तरित ही छोड़ देते थे। यही कारण है कि भारतीय शहरों के अध्ययन पर आधारित इस पुस्तक की चर्चा दुनिया-भर में हुई है।
पर यह किताब सिर्फ़ अकादमिक जगत् की चर्चा-भर की चीज़ नहीं है। यह हर पाठक, इस विषय में दिलचस्पी रखनेवाले हर व्यक्ति के मन में कुछ सवाल उठाती है, विभिन्न क़िस्म के संगठनों से जुड़कर अपना कुछ वक़्त समाज को देने की प्रेरणा देती है, पार्टियों-मजदूर संघों, व्यापार संगठनों, पेशागत संगठनों वग़ैरह से सामाजिक चौकसी की माँग करती है। यह स्थापित करती है कि बड़े शहरों के उदय के साथ इस चौकसी के बिना दंगे होंगे ही और सामाजिक चौकसी ही दंगे रोकने का अचूक मंत्र है।
Gupt Rajvansh Tatha Uska Yug
- Author Name:
Uday Narayan Rai
- Book Type:

-
Description:
अपने शिखर काल में गुप्त साम्राज्य गुजरात से लेकर पूरब में बंगाल तक फैला था। सामाजिक, राजनीतिक अव्यवस्था को समाप्त कर, गुप्त राजाओं ने शासन का अनुकरणीय रूप प्रस्तुत किया। यही वजह है कि विदेशी लेखकों ने भी समृद्ध सामाजिक संरचना, बृहत्तर भारत की अवधारणा को क्रियान्वित करने के उनके सफल प्रयासों, धार्मिक सहिष्णुता और अर्थव्यवस्था के सुसंचालन की प्रशंसा की है।
राष्ट्र को विदेशी आक्रान्ताओं से मुक्त करने के लिए भी गुप्त शासकों की उपलब्धियों को उल्लेखनीय माना जाता है। कुषाणों और शकों के उन्मूलन तथा हूणों को पराजित करके उन्होंने अपनी सीमाओं को सुरक्षित किया।
यह पुस्तक विभिन्न ऐतिहासिक और साहित्यिक स्रोतों के साथ-साथ इस समय की पुस्तकों, यात्रा-वृत्तान्तों, शिलालेखों और मुद्राओं से प्राप्त साक्ष्यों की रोशनी में गुप्त सम्राटों और उनके समय का सहायक-सुग्राह्य वर्णन करती है।
विशेष तौर पर छात्रों के लिए तैयार की गई इस पुस्तक में इस समूचे काल को क्रमश: तथा उपलब्ध सूचनाओं को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया गया है। स्कन्दगुप्त की मृत्यु के पश्चात् गुप्त साम्राज्य के पतन के कारणों और उसके बाद की परिस्थितियों पर भी प्रकाश डाला गया है। संस्कृत, पालि, प्राकृत आदि भाषाओं में उपलब्ध सामग्री के आधार पर लिखी गई यह पुस्तक इतिहास के क्षेत्रों के लिए अत्यन्त उपयोगी सिद्ध हुई है।
Gandhi Banam Bhagat : Ek Sant, Ek Sainik
- Author Name:
Navin Gulia
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Poorv Madhyakalin Samaj
- Author Name:
Ratna
- Book Type:

- Description: प्रस्तुत पुस्तक में पूर्वमध्यकालीन सामाजिक संरचना को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है, क्योंकि पूर्वमध्यकाल प्राचीन भारतीय इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण काल माना जाता है। इस काल के दौरान राजनीतिक मंच पर ही केवल उतार-चढाव नहीं आए, अपितु सामाजिक और आर्थिक धरातल पर भी अनेक परिवर्तन दृष्टिगत होते हैं। परिणामस्वरूप भारतीय सामाजिक संरचना नया रूप ग्रहण करती है। इसी कारण पूर्वमध्यकालीन सामाजिक आर्थिक धरातल पर निहित व्यावसायिक समुदायों का अर्थपूर्ण विवेचना करने का पूर्ण प्रयास किया गया है और समाजार्थिक घटक के रूप में मान्य कृषि, व्यापार, उद्योग तथा अन्य विविध व्यवसायों से सम्बन्धित व्यावसायिक समुदायों का गहराई के साथ अध्ययन करना ही हमारा मुख्य केन्द्र रहा है। साथ-ही-साथ पेशेवर समुदायों की सामाजिक आर्थिक स्थिति का निरूपण तत्कालीन अभिलेखीय एवं साहित्यिक साक्ष्यों के आधार पर किया है और उनकी विविध व्यावसायिक गतिविधियों का विश्लेषण करना हमारा मुख्य ध्येय रहा है। जैसाकि स्पष्ट है कि भारतीय सामाजिक आर्थिक जीवन में पेशेवर समुदायों के स्थान-निर्धारण बिना सामाजिक जीवन का चित्रण एकांगी रह जाएगा।
1857 Ka Swatantraya Samar
- Author Name:
Vinayak Damodar Savarkar
- Book Type:

- Description: वीर सावरकर रचित ‘१८५७ का स्वातंत्र्य समर’ विश्व की पहली इतिहास पुस्तक है, जिसे प्रकाशन के पूर्व ही प्रतिबंधित होने का गौरव प्राप्त हुआ। इस पुस्तक को ही यह गौरव प्राप्त है कि सन् १९०९ में इसके प्रथम गुप्त संस्करण के प्रकाशन से १९४७ में इसके प्रथम खुले प्रकाशन तक के अड़तीस वर्ष लंबे कालखंड में इसके कितने ही गुप्त संस्करण अनेक भाषाओं में छपकर देश-विदेश में वितरित होते रहे। इस पुस्तक को छिपाकर भारत में लाना एक साहसपूर्ण क्रांति-कर्म बन गया। यह देशभक्त क्रांतिकारियों की ‘गीता’ बन गई। इसकी अलभ्य प्रति को कहीं से खोज पाना सौभाग्य माना जाता था। इसकी एक-एक प्रति गुप्त रूप से एक हाथ से दूसरे हाथ होती हुई अनेक अंतःकरणों में क्रांति की ज्वाला सुलगा जाती थी। पुस्तक के लेखन से पूर्व सावरकर के मन में अनेक प्रश्न थे—सन् १८५७ का यथार्थ क्या है?क्या वह मात्र एक आकस्मिक सिपाही विद्रोह था? क्या उसके नेता अपने तुच्छ स्वार्थों की रक्षा के लिए अलग-अलग इस विद्रोह में कूद पड़े थे, या वे किसी बड़े लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एक सुनियोजित प्रयास था? यदि हाँ, तो उस योजना में किस-किसका मस्तिष्क कार्य कर रहा था?योजना का स्वरूप क्या था?क्या सन् १८५७ एक बीता हुआ बंद अध्याय है या भविष्य के लिए प्रेरणादायी जीवंत यात्रा?भारत की भावी पीढि़यों के लिए १८५७ का संदेश क्या है? आदि-आदि। और उन्हीं ज्वलंत प्रश्नों की परिणति है प्रस्तुत ग्रंथ—‘१८५७ का स्वातंत्र्य समर’! इसमें तत्कालीन संपूर्ण भारत की सामाजिक व राजनीतिक स्थिति के वर्णन के साथ ही हाहाकार मचा देनेवाले रण-तांडव का भी सिलसिलेवार, हृदय-द्रावक व सप्रमाण वर्णन है। प्रत्येक देशभक्त भारतीय हेतु पठनीय व संग्रहणीय, अलभ्य कृति!
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book