🇮🇳 India’s home-grown full-stack ecosystem for Publishers, Authors, Writers, and Readers. 🎊🎊 Celebrate Your Language, Authors from Your Own Land, with Rachnaye!!! 🎊🎊 Enjoy 🎧 Audiobooks at Rachnaye, download the Rachnaye App from Play Store or App Store

Ahilyabai (& udaykiran)

Ships within 48 Hours

Free Shipping in India on orders above Rs. 1100


About the book

एक दरबारी ने दर्प के साथ कहा ‘एक पत्र में लिखा आया है कि बहुत से राजपूत राजा दक्खिनियों के विरुद्ध हो गए हैं । हमारी निंदा करते हैं, लुटेरा कहते हैं! जिन मराठों ने हिंदुस्थान के चारों कोनों तक धर्म की ध्वजा फहराई; जिन मराठों की देवी ने उत्तर में बदरीनाथ, केदारनाथ, कुरुक्षेत्र से लेकर मथुरा-वृंदावन, काशी, निजाम और टीपू राज्य रामेश्?वर तक एवं द्वारिका और सोमनाथ मे लेकर जगन्नाथपुरी तक मंदिर, घाट, सड़कें और धर्मशाला बनवाईं और प्यासों के लिए प्याऊ रखवाईं जिन देवी ने तीर्थक्षेत्रों के मंदिरों में गंगाजल भिजवाने का प्रबंध किया, जिन देवी ने... अहिल्याबाई से न सहा गया । चेहरे पर रुद्रता फैल गई । ‘बस, बस उन्होंने फटकारा, ‘मैंने कितनी बार मना किया है कि मुझे देवी कभी मत कहो। मेरी चाटुकारी मत करो...’ फिर धीरे से बोलीं, सारे भारत की जनता एक है। द्वेष तो राजाओं और नवाबों में है। ये एक-दूसरे की निंदा की आड़ में एक-दूसरे के प्रदेश को बुरा बतलाते हैं। यह प्रदेश छोटा और बुरा है, हमारा प्रदेश बड़ा और अच्छा है; वे जंगली हैं, हम श्रेष्ठ हैं; इस भेदभाव का विष हम सबको किसी दिन नरक में धकेलेगा। —इसी उपन्यास से चारों ओर घोर अराजकता; शासन- व्यवस्था के नाम पर घोर अत्याचार; प्रजाजन दीन-हीन अवस्था में; धर्म अंधविश्?वासों, भय-त्रासों और रूढि़यों की जकड़ में कसा हुआ; न्याय में न शक्ति रही थी, न विश्वास । ऐसे काल की उन विकट परिस्थतियों में अहिल्याबाई ने जो कुछ किया—और बहुत किया—वह चिरस्मरणीय है। महारानी अहिल्याबाई के जीवन पर आधारित यह ऐतिहासिक उपन्यास बाबू वृंदावनलाल वर्मा की श्रेष्ठ कृति है।

Read more

₹ 600

480 20% off

Available

Rachnaye membership

Pick a membership and see exactly what it gets you

  • 15 Free Deliveries
  • 1 Free Book up to ₹500 MRP

Format

Frequently bought together
Ahilyabai (& udaykiran) This book ₹480
Jhansi Ki Rani Vrindavan Lal Verma ₹700
Mrignayani Vrindavan Lal Verma ₹600
3 books selected ₹1,900 ₹1,780

100% Original

Fast Dispatch

Secure Payment

About the Book

एक दरबारी ने दर्प के साथ कहा ‘एक पत्र में लिखा आया है कि बहुत से राजपूत राजा दक्खिनियों के विरुद्ध हो गए हैं । हमारी निंदा करते हैं, लुटेरा कहते हैं! जिन मराठों ने हिंदुस्थान के चारों कोनों तक धर्म की ध्वजा फहराई; जिन मराठों की देवी ने उत्तर में बदरीनाथ, केदारनाथ, कुरुक्षेत्र से लेकर मथुरा-वृंदावन, काशी, निजाम और टीपू राज्य रामेश्?वर तक एवं द्वारिका और सोमनाथ मे लेकर जगन्नाथपुरी तक मंदिर, घाट, सड़कें और धर्मशाला बनवाईं और प्यासों के लिए प्याऊ रखवाईं जिन देवी ने तीर्थक्षेत्रों के मंदिरों में गंगाजल भिजवाने का प्रबंध किया, जिन देवी ने...
अहिल्याबाई से न सहा गया । चेहरे पर रुद्रता फैल गई । ‘बस, बस उन्होंने फटकारा, ‘मैंने कितनी बार मना किया है कि मुझे देवी कभी मत कहो। मेरी चाटुकारी मत करो...’ फिर धीरे से बोलीं, सारे भारत की जनता एक है। द्वेष तो राजाओं और नवाबों में है। ये एक-दूसरे की निंदा की आड़ में एक-दूसरे के प्रदेश को बुरा बतलाते हैं। यह प्रदेश छोटा और बुरा है, हमारा प्रदेश बड़ा और अच्छा है; वे जंगली हैं, हम श्रेष्ठ हैं; इस भेदभाव का विष हम सबको किसी दिन नरक में धकेलेगा।
—इसी उपन्यास से
चारों ओर घोर अराजकता; शासन- व्यवस्था के नाम पर घोर अत्याचार; प्रजाजन दीन-हीन अवस्था में; धर्म अंधविश्?वासों, भय-त्रासों और रूढि़यों की जकड़ में कसा हुआ; न्याय में न शक्ति रही थी, न विश्वास । ऐसे काल की उन विकट परिस्थतियों में अहिल्याबाई ने जो कुछ किया—और बहुत किया—वह चिरस्मरणीय है। महारानी अहिल्याबाई के जीवन पर आधारित यह ऐतिहासिक उपन्यास बाबू वृंदावनलाल वर्मा की श्रेष्ठ कृति है।

Book details

Fast dispatchShips within 48 hours
Secure paymentOnline, or cash on delivery on eligible orders
100% OriginalGenuine copy from Prabhat Prakashan
Format
Hardbound
Publisher
Prabhat Prakashan
Weight
393 grams
ISBN-13
9789390366842
Pages
256
Reading time
~9 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 21.5 cm
Language
Hindi

Recommended for you

Customer reviews

Be the first to write a review

Read this one? Tell other readers what you thought about the story, the translation and the print.

Offers

Loading offers…

whatsapp