Rogues and Rajas: Dark Tales for Tumultuous Times
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THE OLD STORIES TEACH US HOW SOME CONQUER TEMPTATION, SIDESTEP MISFORTUNE AND RISE ABOVE THEMSELVES. AND HOW SOME LOSE THEIR DISPUTE WITH THE DEVIL... A prince so reviled that he is determined to become the monster everyone calls him. A queen who crushes every challenger who dares to rise. A craftsman who uses his divine talents to steal from the state treasury. An executioner whose paradisiacal garden veils macabre designs. Be it king or knave, queen or slave, minister or minion, the barbaric instinct that might is right echoes and re-echoes across lifetimes. Dramatically revealing the gambles, betrayals and plots of fierce and ferocious rulers of ancient India – from Ashoka of Magadha to Shashanka of Bengal and from Didda of Kashmir to Peruvalathan of Tamilakam – and of commonfolk no less menacing, these are tales of an age when intrigue was rife and offence was the first defence. Gripping and intense, Rogues and Rajas opens a rare window to a shadowy past, eloquently exposing the underside of the soul and questioning how far we have come today.
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THE OLD STORIES TEACH US HOW SOME CONQUER TEMPTATION, SIDESTEP MISFORTUNE AND RISE ABOVE THEMSELVES.
AND HOW SOME LOSE THEIR DISPUTE WITH THE DEVIL...
A prince so reviled that he is determined to become the monster everyone calls him. A queen who crushes every challenger who dares to rise. A craftsman who uses his divine talents to steal from the state treasury. An executioner whose paradisiacal garden veils macabre designs. Be it king or knave, queen or slave, minister or minion, the barbaric instinct that might is right echoes and re-echoes across lifetimes.
Dramatically revealing the gambles, betrayals and plots of fierce and ferocious rulers of ancient India – from Ashoka of Magadha to Shashanka of Bengal and from Didda of Kashmir to Peruvalathan of Tamilakam – and of commonfolk no less menacing, these are tales of an age when intrigue was rife and offence was the first defence.
Gripping and intense, Rogues and Rajas opens a rare window to a shadowy past, eloquently exposing the underside of the soul and questioning how far we have come today.
Book Details
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ISBN9789357312622
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Pages232
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Avg Reading Time8 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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- Description: डॉ. पठाण यांच्या संभाजी चरित्राचे वैशिष्ट्य काय? या प्रश्नाचे उत्तर शोधण्याचा जेव्हा आम्ही प्रयत्न केला तेव्हा आमच्या लक्षात आले की, एका धर्मनिरपेक्षवादी मुस्लीम लेखकाने लिहिलेले हे महाराष्ट्रातील पहिले संभाजी चरित्र आहे. आज समाजातील काही विशिष्ट गट संभाजी महाराजांनी दिलेल्या लढ्यास हिंदू विरुद्ध मुस्लीम असा रंग देऊन तो धार्मिक लढा होता, असे भासवून या राजास ‘धर्मवीर' म्हणून घोषित करीतअसताना या ग्रंथाने या घोषणेला छेद दिला आहे. औरंगजेबाने सुरु केलेले हे युद्ध खऱ्या अर्थाने साम्राज्यवादी होते व त्याला विरोध करून त्याच्याशी लढणाऱ्या मराठ्यांचे युद्ध हे त्याच अर्थाने स्वातंत्र्यवादी होते. इथे हिंदू विरुद्ध मुस्लीम असा धर्माचा काही प्रश्नच निर्माण होत नाही, हे ऐतिहासिक सत्य डॉ. पठाण यांच्या या ग्रंथातून दृग्गोचर होते आहे आणि हेच सत्यकथन या ग्रंथाचे यश आहे असे आम्हांस वाटते. - डॉ. जयसिंगराव पवार ज्येष्ठ इतिहासकार Chhatrapati Sambhaji Maharaj | Dr. Ismail Pathan छत्रपती संभाजी महाराज । डॉ. इस्माईल पठाण
Jalianwala Bagh Ki Karahein : Pratibandhit Hindi Sahitya
- Author Name:
Rajwanti Mann
- Book Type:

- Description: ग़ुलामी के दौरान पंजाब पर अकल्पनीय अत्याचार के प्रतिवाद में रचित तथा ब्रिटिश शासन द्वारा प्रतिबन्धित और ज़ब्त रचनाएँ ‘जलियाँवाला बाग़ की कराहें’ पुस्तक जलियाँवाला बाग़ के नरसंहार की अतिशय वेदना और अंग्रेज़ी जुल्मों की व्यथा-कथा है जिसे हिन्दुस्तानियों ने अपनी आत्मा पर झेला, अपनी आँखों से देखा और साहित्यकारों ने अपनी क़लम से उकेरा। यह जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए लिखा गया साहित्य है जो एक सदी तक अन्वेषकों की नज़रों से लगभग छिपा रहा। इन रचनाकारों ने अंग्रेज़ी राज की प्रताड़नाएँ सहते हुए औपनिवेशिक काल की त्रासद स्थितियों को कलमबद्ध किया। रचनाएँ मौखिक यात्रा करती हुईं जन-चेतना के उद्देश्य तक पहुँचती रहीं। पुस्तक में कुल नौ अध्याय हैं जिनमें जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड के बाद रचित वे नाटक, कविताएँ, दोहे, ठुमरी, लावणी, क़व्वाली, ग़ज़ल आदि सम्मिलित हैं जो अलग-अलग पुस्तिकाओं में प्रकाशित हुईं। लगभग सभी विधाओं में रचित यह साहित्य जलियाँवाला बाग़ की पृष्ठभूमि से लेकर हर छोटी-बड़ी घटना, अंग्रेज़ों की क्रूरता, जुल्म और यातनाओं, लोगों की बेबसी, लाचारी, सामाजिक दशा-दुर्दशा का निर्भीक और वास्तविक विवरण प्रस्तुत करता है तो दूसरी तरफ़ साहस से उठ खड़े होने का आह्वान भी करता है। इनमें नृशंस हत्याओं के साथ-साथ हरे-भरे पेड़-पौधों की उखड़ी-जली छालों, घास चरती हुईं गाय-भैंसों का चरते-चरते मारे जाना, तोते, कोयल और मैना आदि पक्षियों तक का भी गोलियों से डरकर मरने का मार्मिक चित्रण है। इन रचनाओं की सत्यता पर कोई सन्देह इसलिए नहीं किया जा सकता कि आधिकारिक ऐतिहासिक दस्तावेज़ों में भी किसी न किसी रूप में इनका ज़िक्र है और इतिहास की पुस्तकों में भी इन्हें प्राय: उसी रूप में अभिव्यक्त किया गया है।
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