Rahbari Ke Sawal
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‘रहबरी के सवाल’ में चन्द्रशेखर के ही शब्दों में उनके जीवन के कुछ प्रमुख पड़ावों और विचार-बिदुओं को नए सन्दर्भों में नए सिरे से प्रस्तुत किया गया है। चन्द्रशेखर का जीवन मूलत: एक भारतीय किसान का जीवन था जिसमें कोई दुराव-छिपाव नहीं। राजनीति के शिखर व्यक्तित्व होते हुए भी वे किसी भी विषय पर बिना लाग-लपेट के और दो टूक बोलते थे। यह भी भारतीय किसान का ही स्वभाव है। चन्द्रशेखर के व्यक्तित्व को समझने में यह अवधारणा बहुत मदद देती है। वे जिस विषय पर बोलते थे, उनके विचारों के केन्द्र में भारतीय समाज की परिस्थितियाँ और समाजवादी लोकतांत्रिक मूल्य प्रमुख रूप से दिखाई देते थे। अपनी वैचारिक दृढ़ता के कारण ही वे उथल-पुथल भरे राजनैतिक झंझावातों के बीच आज भी एक जलती मशाल की तरह दृष्टिगत होते हैं। इस पुस्तक के छह खंडों के नाम हैं : ‘राजनीति के सोपान’, ‘चौदहवीं लोकसभा और संसदीय प्रणाली’, ‘यक्ष प्रश्न’, ‘नज़रिया’, ‘अन्तरंग’ तथा ‘अनुलग्नक’। इन अध्यायों में उन प्रसंगों पर विस्तृत बातचीत की गई है जो आज के सन्दर्भ में भी जीवन्त हैं। चन्द्रशेखर का जीवन एक कभी न रुकनेवाला यायावर का जीवन था। इसमें कहीं ठहराव नहीं। यही वजह है कि उनका व्यक्तित्व उनके किसी भी समकालीन राजनैतिक व्यक्तित्व की तुलना में अधिक गतिशील दिखता है। इस पुस्तक में सार्थक और जीवन्त प्रश्नों के सहारे चन्द्रशेखर के अद्यतन वैचारिक चिन्तन और निष्कर्षों को दर्ज करने का ऐतिहासिक प्रयास किया गया है। ये विचार हमें आत्ममंथन के लिए तो प्रेरित करते ही हैं, भूमंडलीकरण के शोर में अपनी खोती हुई अस्मिता को बचाने के लिए नई शक्ति से भरते भी हैं। यही वजह है कि यह पुस्तक निराशा के राष्ट्रव्यापी माहौल में नई व्यवस्था बनाने के लिए एक सार्थक हस्तक्षेप की तरह है।
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‘रहबरी के सवाल’ में चन्द्रशेखर के ही शब्दों में उनके जीवन के कुछ प्रमुख पड़ावों और विचार-बिदुओं को नए सन्दर्भों में नए सिरे से प्रस्तुत किया गया है। चन्द्रशेखर का जीवन मूलत: एक भारतीय किसान का जीवन था जिसमें कोई दुराव-छिपाव नहीं। राजनीति के शिखर व्यक्तित्व होते हुए भी वे किसी भी विषय पर बिना लाग-लपेट के और दो टूक बोलते थे। यह भी भारतीय किसान का ही स्वभाव है। चन्द्रशेखर के व्यक्तित्व को समझने में यह अवधारणा बहुत मदद देती है। वे जिस विषय पर बोलते थे, उनके विचारों के केन्द्र में भारतीय समाज की परिस्थितियाँ और समाजवादी लोकतांत्रिक मूल्य प्रमुख रूप से दिखाई देते थे। अपनी वैचारिक दृढ़ता के कारण ही वे उथल-पुथल भरे राजनैतिक झंझावातों के बीच आज भी एक जलती मशाल की तरह दृष्टिगत होते हैं।
इस पुस्तक के छह खंडों के नाम हैं : ‘राजनीति के सोपान’, ‘चौदहवीं लोकसभा और संसदीय प्रणाली’, ‘यक्ष प्रश्न’, ‘नज़रिया’, ‘अन्तरंग’ तथा ‘अनुलग्नक’। इन अध्यायों में उन प्रसंगों पर विस्तृत बातचीत की गई है जो आज के सन्दर्भ में भी जीवन्त हैं। चन्द्रशेखर का जीवन एक कभी न रुकनेवाला यायावर का जीवन था। इसमें कहीं ठहराव नहीं। यही वजह है कि उनका व्यक्तित्व उनके किसी भी समकालीन राजनैतिक व्यक्तित्व की तुलना में अधिक गतिशील दिखता है। इस पुस्तक में सार्थक और जीवन्त प्रश्नों के सहारे चन्द्रशेखर के अद्यतन वैचारिक चिन्तन और निष्कर्षों को दर्ज करने का ऐतिहासिक प्रयास किया गया है। ये विचार हमें आत्ममंथन के लिए तो प्रेरित करते ही हैं, भूमंडलीकरण के शोर में अपनी खोती हुई अस्मिता को बचाने के लिए नई शक्ति से भरते भी हैं। यही वजह है कि यह पुस्तक निराशा के राष्ट्रव्यापी माहौल में नई व्यवस्था बनाने के लिए एक सार्थक हस्तक्षेप की तरह है।
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 4th
- Publication year
- 2018
- Weight
- 366 grams
- ISBN-13
- 9789388183468
- Pages
- 350
- Reading time
- ~12 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14.5 × 22 cm
- Language
- Hindi
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उन अनजाने किसानों के नाम, जिनके संघर्ष की कहानी बड़े बड़े संघर्षों की दास्तान के बीच अनकही रह गई। समय के रेत पर जो अपने जीवन के निशान छोड़कर चले गए, शायद वो उसे हमारे लिए ही बना गये हों, जिनको ढूंढने , सहेजने और किताबों के पन्नों पर स्याही से उकेरने के नाम, यह दास्तान।
Vedic Log : Unka Itihas Aur Bhugol
- Author Name:
Rajesh Kochhar +1
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क्या ऋग्वेद की रचना अफगानिस्तान में हुई थी? क्या किसी समय घग्गर नदी ही ऋग्वेद में वर्णित महान सरस्वती थी? क्या ऋग्वैदिक जन और हड़प्पा निवासी समान ही थे? क्या राम की अयोध्या भारत में ही थी? प्राचीन भारतीय इतिहास के इन निर्णायक प्रश्नों के उत्तर इस किताब ‘वैदिक लोग’ में मिलते हैं। इन प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए विख्यात खगोल-भौतिकीविद राजेश कोचर भाषाविज्ञान, साहित्य, प्राकृतिक इतिहास, पुरातत्व, प्रौद्योगिकी के इतिहास, भू-आकृति विज्ञान और खगोलशास्त्र आदि अनेक क्षेत्रों से प्राप्त आँकड़ों का विश्लेषण और संश्लेषण करते हैं और इस क्रम में ऐसे कई विरोधाभासों को सुलझाने की कोशिश करते हैं जो पेशेवर इतिहासकारों और पुरातत्वविदों, दोनों को उलझन में डालते आए हैं। यह तर्क देते हुए कि ऋग्वेद के ज़्यादातर हिस्से की रचना दक्षिण अफ़ग़ानिस्तान में (1700 ई.पू. के बाद), ऋग्वैदिक लोगों के पुन्जाल मैदान में प्रवेश करने और गंगा नदी के पूर्व की ओर जाने से भी बहुत पहले हुई, वे दावा करते हैं कि अपने प्रवसन के दौरान वे न सिर्फ अपने अनुष्ठान और भजन इत्यादि, बल्कि नदियों और स्थानों के नाम भी अपने साथ ले गए जिनका प्रयोग उन्होंने अपनी इच्छानुसार किया। हर कदम पर अपनी बात को तर्कों से प्रमाणित करते हुए एक वैज्ञानिक ने इस पुस्तक को ऐसी सरल और सुबोध शैली में लिखा है कि साधारण पाठक भी इसे रुचिपूर्वक पढ़ सकते हैं, इतिहासकारों, पुरातत्वशास्त्रियों और भारतविदों के लिए तो यह काम उल्लेखनीय रहा ही है।
Vishamta : Ek Punarvivechan
- Author Name:
Amartya Sen +1
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नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री प्रोफेसर अमर्त्य सेन की एक दार्शनिक रचना है—‘विषमता’। उनकी कई एक विश्व-प्रसिद्ध पुस्तकों के बीच इस रचना का शुमार उनकी सोच की कुंजी के बतौर होता है। निस्संदेह यह प्रोफेसर सेन की कुछ सर्वाधिक कठिन पुस्तकों में से भी एक है। कठिन यह इस अर्थ में नहीं है कि कोई लंबी-चौड़ी उलझी हुई लफ़्फ़ाज़ी इसमें की गई है, बल्कि इस अर्थ में कि स्वतंत्रता, समानता, विविधता आदि अवधारणाओं का प्रयोग यहाँ इतने व्यापक संदर्भों में हुआ है कि उनका आदी होने में किसी को भी काफी मेहनत करनी पड़ेगी। समानता और स्वतंत्रता के बीच का विवाद इस सदी का एक महत्त्वपूर्ण दार्शनिक विवाद रहा है। शीतयुद्ध के चार दशकों ने तो इसे विश्व राजनीति के केंद्रीय विवाद का ही रूप दे दिया था। इस पुस्तक में प्रोफेसर सेन इस विवाद की तह में जाते हैं। समानतावादियों और स्वतंत्रतावादियों के मतों का विश्लेषण करते हुए प्रोफेसर सेन यह सिद्ध करते हैं कि इन दोनों के बीच विवाद दरअसल इस बात पर है ही नहीं कि मनुष्यों के बीच समानता होनी चाहिए या नहीं। विवाद तो इस बात पर है कि मनुष्यों के बीच समानता किस चीज की होनी चाहिए। इस केंद्रीय प्रश्न ‘समानता किस चीज की?’ का जवाब खोजने के क्रम में प्रोफेसर सेन मनुष्यों के बीच मौजूद भारी विविधताओं को केंद्र में रखते हैं। अपंग व्यक्ति, गर्भवती स्त्री, कालाजार प्रभावित इलाकों में रहनेवाले आदिवासी या स्वेच्छया सारी सुख-सुविधाओं का त्याग कर जनता की सेवा करनेवाले सामाजिक कार्यकर्ता–सभी उनकी नजर में रहते हैं और मनुष्य की किसी भी गढ़ी-गढ़ाई परिभाषा से वे ठोस रूपाकार वाले मनुष्यों का कुछ खास भला होते नहीं देखते। उनका केंद्रीकरण आमतौर पर भिन्न-भिन्न लक्ष्यों के लिए प्रयास करने की मानवीय स्वतंत्रता पर और खासतौर पर विविध मूल्यों को अर्जित करने की अलग-अलग व्यक्तियों के सामर्थ्य पर है। स्वतंत्रता और समानता को लेकर आपके विचार चाहे जो भी हों और प्रोफेसर सेन के विचारों से उनकी कोई संगति बैठती हो या न बैठती हो पर इसमें कोई संदेह नहीं कि इस विश्लेषण से गुजरने के बाद आपकी सोच का दायरा पहले से बढ़ चुका होगा।
Aapka Manto
- Author Name:
Mohammed Aslam Parvez
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इस किताब में मंटो के अब तक मौजूद सभी खत संकलित किए गए हैं। हिंदी पढ़ने वालों के लिए मंटो साहब का नाम कोई नया नहीं। हिंदी वालों का भी मंटो पर उतना ही हक है, जितना उर्दू वालों का। इस वजह से हिंदी का एक बड़ा पाठक वर्ग इन खतों के जरिए मंटो की जिंदगी के उस हिस्से से भी रूबरू होगा, जिस पर अभी बहुत ज्यादा रौशनी नहीं पड़ी है। अब तक मंटो के मौजूद खत की संख्या 142 है, जो उसकी लिखी गई कहानियों की संख्या से भी बहुत कम है। मौजूद खत में सबसे ज्यादा खत मंटो ने अहमद नदीम कासमी को ही लिखे हैं। इन खतों के जरिए मंटो की जो तस्वीर कावि के मन में उभरती है, उसे अगर एक वाक्य में कहें तो हम ‘a man without a mask’ कह सकते हैं। उर्दू साहित्य की दुनिया में मोहम्मद असलम परवेज का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। एक लंबे समय से वे रंगकर्मी के तौर पर हिंदी, उर्दू, और हिंदुस्तानी रंगमंच से जुड़े हैं। उनके लिखे कई नाटक मुंबई के पृथ्वी और टाटा थिएटर के अलावा दूसरे शहरों में खेले जाते रहे हैं। इसके अलावा, मराठी और गुजराती में उनके नाटक पेशेवर मंच पर भी खेले जाते रहे हैं। मोहम्मद असलम परवेज की एक पहचान मंटो के आलोचक के रूप में भी है। उन्होंने मंटो को नित नए दृष्टिकोण से समझने की कोशिश की। मंटो के हवाले से उनकी किताबें ‘आप का मंटो’, ‘मंटो और चचा सैम’, ‘मंटो: अफसानों के दरमियान’, और ‘मंटो: स्याह हाशिए और हाशिया रेखाएँ’ अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं।
Meri Maa Meri Gangster
- Author Name:
Arundhati Roy +1
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अठारह बरस की उम्र में अरुंधति रॉय जिस माँ को छोड़कर भागीं, उनकी मौत से जज़्बाती तौर पर वह इस क़दर बिखर गईं कि उनकी यादों को सहेजते हुए उन्होंने यह असाधारण आख्यान लिखना शुरू किया। यह शानदार संस्मरण अन्तरंग है और प्रेरक भी, बहुत बार परेशान करने वाला और हैरानी की हद तक दिलचस्प भी। बचपन से लेकर वर्तमान तक, आयमनम से लेकर दिल्ली तक के सफ़र की यह गाथा हमें उन हालात से भी रूबरू कराती है, जिसने उन्हें वह इनसान और लेखक बना दिया, जो वह आज हैं।
HASHIYE PAR HASRAT
- Author Name:
Bhim Singh Bhavesh
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"‘हाशिए पर हसरत’ एक ऐसे कटु यथार्थ का दस्तावेज है, जो हमारे समाज के लिए आज भी शर्म का बायस है। भारतीय समाज की संरचना में जाति-वर्ण की विभाजक रेखा इतनी प्रतिगामी और अमानवीय साबित हुई है कि एक सभ्य समाज उससे जितनी जल्द मुक्त होगा, उसका उतना ही भला होगा। यह पुस्तक उसी परिप्रेक्ष्य में भारतीय समाज की जाति-व्यवस्था में अस्पृश्य जातियों की अंतिम पंक्ति में खड़े मुसहर जाति की स्थिति से रू-ब-रू कराने की कोशिश है। भीम सिंह भवेश की यह पुस्तक वस्तुतः समाज विज्ञान में एक शोध है। यह पुस्तक मुसहरों के जीवन, उनकी जीवन-दृष्टि, आपसी संबंधों, दशा-दिशा, भविष्य और समाज की मुख्यधारा के प्रति उनकी धारणाओं का प्रामाणिक दस्तावेज है। मुसहर-टोलों के जीवन को जिस संवेदना के साथ भवेश ने उकेरा है, उसका एहसास इसे पढ़ने पर होता है। उनके स्वास्थ्य, शिक्षा, मान्यताओं और जटिलताओं को लेखक ने बहुत करीब से देखा है। ग्रामीण जीवन के अमर चितेरे फणीश्वर नाथ रेणु के जन्म शताब्दी वर्ष में ‘हाशिए पर हसरत’ का प्रकाशन ‘मैला आँचल’ के लेखक को सबसे अच्छी श्रद्धांजलि भी है। भवेश ने जानकारियाँ जुटाने में मेहनत तो की ही है, उन्हें प्रस्तुत भी रोचक शैली में किया है। इसीलिए यह शुष्क शोध नहीं, बल्कि पठनीय कथ्य के माध्यम से संवेदनशील विषय के प्रति हमारे अंदर संवेदना जगाती है। यही इस पुस्तक की विशेषता है। यह पुस्तक मुसहर जाति को समझने, उनके दारुण दुःखों को महसूस करने और उन्हें उच्च मानवीय गरिमा प्रदान करने के प्रयासों को बल देगी। —अवधेश प्रीत "
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