Bhoolana
(0)
Author:
Chandan PandeyPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Contemporary-fiction₹
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दिनोंदिन भीषण होते समय को भाषा में अंकित करने के संघर्ष को जीनेवाली, चन्दन पाण्डेय की कहानियों का बहुचर्चित संग्रह है—भूलना। हम भूल जाने लगे हैं, बिलकुल सामने बैठे को, जरा-सी दूरी पर वहाँ मरते हुए आदमी को। हमारी आँखें खुली हैं, पर उनके भीतर जो दृश्य नाच रहे हैं वे हमारे भीतर चल रहे विध्वंस के हैं, वे हमें किसी तक ले नहीं जाते, अपने अलावा किसी और का नहीं बनाते, और अपना भी कितना! संग्रह की शीर्षक कहानी उस विनाश का दस्तावेज़ है जिसके बीच हम कुछ भी न देखते, कुछ भी न याद रखते हुए आज आ खड़े हैं। यह अकारण नहीं कि चन्दन पाण्डेय की कथा-भाषा रस का सृजन नहीं करती। एक रचनाकार के रूप में वह इस विनाश को देख पा रहे हैं और उसे पूरा का पूरा इस तरह हम तक पहुँचा देना चाहते हैं कि उसकी निर्णायक भयावहता को हम समझ सकें। संग्रह की पहली कहानी प्रेम की हत्या के बारे में है—एक योजनाबद्ध हत्या—ख़बरिया अर्थ में योजनाबद्ध नहीं—संस्कृति की ज़मीन में दबी प्रेम-विरोध की सुरंगों की योजना जिसको अचूक बनाने पर यह समाज लगातार काम करता रहता है, और अर्थव्यवस्था के हिलते पाये जिसमें अपनी मददगार भूमिका निभाते हैं। इनके अलावा ‘नकार’, ‘परिन्दगी है या नाकामयाब है’, ‘सुनो’ और ‘सिटी पब्लिक स्कूल, वाराणसी’ शीर्षक कहानियाँ पुनः जीवन के किसी हलक़े या उम्र के किसी पड़ाव पर समाज की संरचना में स्वीकृति पातीं विसंगतियों को उनके सभी आयामों के साथ चिन्हित करती हैं। अपने कथाकार की क्षमता को रेखांकित करता यह संग्रह अविस्मरणीय है।
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दिनोंदिन भीषण होते समय को भाषा में अंकित करने के संघर्ष को जीनेवाली, चन्दन पाण्डेय की कहानियों का बहुचर्चित संग्रह है—भूलना।
हम भूल जाने लगे हैं, बिलकुल सामने बैठे को, जरा-सी दूरी पर वहाँ मरते हुए आदमी को। हमारी आँखें खुली हैं, पर उनके भीतर जो दृश्य नाच रहे हैं वे हमारे भीतर चल रहे विध्वंस के हैं, वे हमें किसी तक ले नहीं जाते, अपने अलावा किसी और का नहीं बनाते, और अपना भी कितना! संग्रह की शीर्षक कहानी उस विनाश का दस्तावेज़ है जिसके बीच हम कुछ भी न देखते, कुछ भी न याद रखते हुए आज आ खड़े हैं। यह अकारण नहीं कि चन्दन पाण्डेय की कथा-भाषा रस का सृजन नहीं करती। एक रचनाकार के रूप में वह इस विनाश को देख पा रहे हैं और उसे पूरा का पूरा इस तरह हम तक पहुँचा देना चाहते हैं कि उसकी निर्णायक भयावहता को हम समझ सकें।
संग्रह की पहली कहानी प्रेम की हत्या के बारे में है—एक योजनाबद्ध हत्या—ख़बरिया अर्थ में योजनाबद्ध नहीं—संस्कृति की ज़मीन में दबी प्रेम-विरोध की सुरंगों की योजना जिसको अचूक बनाने पर यह समाज लगातार काम करता रहता है, और अर्थव्यवस्था के हिलते पाये जिसमें अपनी मददगार भूमिका निभाते हैं। इनके अलावा ‘नकार’, ‘परिन्दगी है या नाकामयाब है’, ‘सुनो’ और ‘सिटी पब्लिक स्कूल, वाराणसी’ शीर्षक कहानियाँ पुनः जीवन के किसी हलक़े या उम्र के किसी पड़ाव पर समाज की संरचना में स्वीकृति पातीं विसंगतियों को उनके सभी आयामों के साथ चिन्हित करती हैं। अपने कथाकार की क्षमता को रेखांकित करता यह संग्रह अविस्मरणीय है।
Book Details
-
ISBN9789360867676
-
Pages200
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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पीयूष मिश्रा जब मंच पर होते हैं तो वहाँ उनके अलावा सिर्फ़ उनका आवेग दिखता है। जिन लोगों ने उन्हें मंडी हाउस में एकल करते देखा है, वे ऊर्जा के उस वलय को आज भी उसी तरह गतिमान देख पाते होंगे। अपने गीत, अपने संगीत, अपनी देह और अपनी कला में आकंठ एकमेक एक सम्पूर्ण अभिनेता! अब वे फिल्में कर रहे हैं, गीत लिख रहे हैं, संगीत रच रहे हैं; और यह उनकी आत्मकथा है जिसे उन्होंने उपन्यास की तर्ज पर लिखा है। और लिखा नहीं; जैसे शब्दों को चित्रों के रूप में आँका है। इसमें सब कुछ उतना ही ‘परफ़ेक्ट’ है जितने बतौर अभिनेता वे स्वयं। न अतिरिक्त कोई शब्द, न कोई ऐसा वाक्य जो उस दृश्य को और सजीव न करता हो। मध्य प्रदेश के ग्वालियर में एक ‘अनयूजुअल’—से परिवार में जन्मा एक बच्चा चरण-दर-चरण अपने भीतर छिपी असाधारणता का अन्वेषण करता है; और क़स्बाई मध्यवर्गीयता की कुंठित और करुण बाधाओं को पार करते हुए धीरे-धीरे अपने भीतर के कलाकार के सामने आ खड़ा होता है। अपने आत्म के सम्मुख जिससे उसे ताज़िन्दगी जूझना है; अपने उन डरों के समक्ष जिनसे डरना उतना ज़रूरी नहीं, जितना उन्हें समझना है। इस आत्मकथात्मक उपन्यास का नायक हैमलेट, यानी संताप त्रिवेदी यानी पीयूष मिश्रा यह काम अपनी ख़ुद की कीमत पर करता है। यह आत्मकथा जितनी बाहर की कहानी बताती है—ग्वालियर, दिल्ली, एनएसडी, मुम्बई, साथी कलाकारों आदि की—उससे ज़्यादा भीतर की कहानी बताती है, जिसे ऐसी गोचर दृश्यावली में पिरोया गया जो कभी-कभी ही हो पाता है। इसमें हम दिल्ली के थिएटर जगत, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और मुम्बई की फ़िल्मी दुनिया के कई सुखद-दुखद पहलुओं को देखते हैं; एक अभिनेता के निर्माण की आन्तरिक यात्रा को भी। और एक संवेदनशील रचनात्मक मानस के भटकावों-विचलनों-आशंकाओं को भी। लेकिन सबसे बड़ी उपलब्धि इस किताब की इसका गद्य है। पीयूष मिश्रा की कहन यहाँ अपने उरूज़ पर है। पठनीयता के लगातार संकरे होते हिन्दी परिसर में यह गद्य खिली धूप-सा महसूस होता है।
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