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Author:
Ram NaikPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
EnglishCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
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After a childhood spent in three different accommodations in Atpadi, I had to repeatedly shift from one place to another in Pune, every six months, during my four years there because of a paucity of funds and out of compulsion. I had stayed at six different places in Pune before shifting into Gadimaa’s Panchavati bungalow. Furthermore, I shifted my residence to seven places in Mumbai and three in Delhi. Today, I reside at the Raj Bhavan, Lucknow. In all, I have resided at twenty different places over the past eighty years. Although shelter has been unstable, I have remained steady in character – still looking forward and moving ahead. (Page 35) Life often takes unexpected turns, and the direction one has in mind is completely transposed. My life has witnessed many such twists and turns, and every bend has posed a new challenge. I have had to face them all and continue to move ahead. (Page 37) Wishing me a long and healthy life, Atal jee said, “Just consider why you have been brought back from the brink of death. We have dreamt of a glorious Bharat. You have been reborn to fulfill this task.” I promised Atal jee that I would spend my bonus life for and only for serving society. (Page 231) One of my favourite poems by Atal jee may be translated as, “I am not deterred by defeat, nor elated by victory. Whatever comes my way on the path of duty is right.” I had never imagined that this would resonate with the reality of my own life – that I would ever be defeated. But I had to swallow two election defeats. These unexpected losses were not a deterrent, since I had entered public life with the firm conviction that the electoral process offered an effective medium to serve the people, and I faced this reality with Atal jee’s pragmatic words, ‘not deterred by defeat’. (Page 305) For me, the Raj Bhavan has not been a place of rest or retirement. This forty-seven-acre landmass has a beautiful garden, numerous trees, a cowshed, and tiny farms. The building is about two hundred years old and is a heritage structure. The weather here inspires me to work, so that the reputation of this precinct is enhanced. Every bathroom in Raj Bhavan is larger than my first two-room residence in Mumbai, with trappings fit for a king. It would not be an exaggeration to say that Raj Bhavan is like a palace. But I am unable to relish these luxuries, as I prefer being a commoner, among people. (Page 343)
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After a childhood spent in three different accommodations in Atpadi, I had to repeatedly shift from one place to another in Pune, every six months, during my four years there because of a paucity of funds and out of compulsion. I had stayed at six different places in Pune before shifting into Gadimaa’s Panchavati bungalow. Furthermore, I shifted my residence to seven places in Mumbai and three in Delhi. Today, I reside at the Raj Bhavan, Lucknow.
In all, I have resided at twenty different places over the past eighty years. Although shelter has been unstable, I have remained steady in character – still looking forward and moving ahead.
(Page 35)
Life often takes unexpected turns, and the direction one has in mind is completely transposed. My life has witnessed many such twists and turns, and every bend has posed a new challenge. I have had to face them all and continue to move ahead.
(Page 37)
Wishing me a long and healthy life, Atal jee said, “Just consider why you have been brought back from the brink of death. We have dreamt of a glorious Bharat. You have been reborn to fulfill this task.”
I promised Atal jee that I would spend my bonus life for and only for serving society.
(Page 231)
One of my favourite poems by Atal jee may be translated as, “I am not deterred by defeat, nor elated by victory. Whatever comes my way on the path of duty is right.”
I had never imagined that this would resonate with the reality of my own life – that I would ever be defeated. But I had to swallow two election defeats. These unexpected losses were not a deterrent, since I had entered public life with the firm conviction that the electoral process offered an effective medium to serve the people, and I faced this reality with Atal jee’s pragmatic words, ‘not deterred by defeat’.
(Page 305)
For me, the Raj Bhavan has not been a place of rest or retirement. This forty-seven-acre landmass has a beautiful garden, numerous trees, a cowshed, and tiny farms. The building is about two hundred years old and is a heritage structure. The weather here inspires me to work, so that the reputation of this precinct is enhanced.
Every bathroom in Raj Bhavan is larger than my first two-room residence in Mumbai, with trappings fit for a king. It would not be an exaggeration to say that Raj Bhavan is like a palace. But I am unable to relish these luxuries, as I prefer being a commoner, among people.
(Page 343)
Book Details
-
ISBN9789386231635
-
Pages344
-
Avg Reading Time11 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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भीष्म साहनी की कथा-शैली से जो बात सबसे पहले ध्यान खींचती है, वह ये कि हम एक ऐसे लेखक के पाठ के साथ हैं, जो लेखक बाद में है, पहले साथ बैठा हुआ मित्र है। ऐसा मित्र जो आपको कम-से-कम चौंकाते हुए, बल्कि शायद इस बात का ध्यान रखते हुए, अपनी बात कहता है कि उसकी कोई बात अगर आपके साथ कुछ करे तो आपके व्यक्तित्व की सबसे भीतरी तहों में वह सबसे पहले घटित हो। 'आज के अतीत’ में उनका यह मित्र भाव चरम पर है, और संयोग यह कि यहाँ वे अपने बारे में बता रहे हैं जो हमारा दोहरा लाभ है। हम अपने प्रिय लेखक को जान रहे हैं और उसकी कला के जादुई दायरे में ख़ुद को भी नवीकृत कर रहे हैं। इस आत्मकथा से हम उनके जीवन के साथ-साथ उनकी कई कृतियों की रचना-प्रक्रिया से भी अवगत होंगे, जानेंगे कि 'तमस’ कैसे बना, 'हानूश’ ने आकार कैसे लिया, और किस तरह भीष्म जी ने बतौर लेखक अपने समय, समाज, साथियों और इतिहास को देखा-समझा। इसमें उनके मास्को प्रवास का ब्यौरा भी आता है जहाँ वे काफ़ी समय रहे, और अनुवादक के रूप में कई पुस्तकों के अनुवाद हम तक पहुँचाए। यह हिस्सा ख़ास तौर पर पठनीय इसलिए है कि यहाँ हमें साम्यवादी सोवियत संघ के भीतर जारी उस प्रक्रिया की जानकारी भी मिलती है, जो धीरे-धीरे सोवियत संघ के पतन की तरफ़ गई। 'आज के अतीत’ से हमें उनके इप्टा के दौर और बड़े भाई बलराज साहनी के साथ उनके रिश्तों के बारे में भी बहुत कुछ जानने को मिलता है। हिन्दी आत्मकथाओं में ईमानदारी और पारदर्शी सहजता को स्थापित करनेवाली एक अनूठी रचना।
Syama Prasad Mookerjee : His Death In Detention
- Author Name:
Uma Prasad Mookerjee
- Book Type:

- Description:
When it appeared in 1953, Uma Prasad’s book on Dr. Syama Prasad Mookerjee’s detention and death in Kashmir created a wave of indignation. It reproduced documents connected to Dr. Mookerjee’s arrest and death and gave a gripping account of the manner in which he was arrested, detained and allowed to die. Dr. Mookerjee’s mother Jogmaya Debi’s letter to Nehru, pleading for an enquiry, Nehru’s refusal to order it, Sheikh Abdullah’s obfuscations, all of these find place in this book. Why was Dr. Mookerjee allowed to enter Jammu and Kashmir and then arrested? Why were high doses of a particular injection, to which he was allergic, administered to him? How did his diary disappear—are among the many questions that this book raises and attempts to answer. Above all it gives the readers an idea of how obstinate, self-obsessed, arrogant and scheming a man was Jawaharlal Nehru, who, as it comes across in this book, was not only economical with the truth but had literally pushed Dr. Mookerjee to his end. A must read for all those who wish to understand the truth behind the sudden end of a momentous and promising life.
S.D. Burman: The Prince Musician
- Author Name:
Balaji Vittal +1
- Book Type:

- Description:
SD, or Sachin Dev Burman, is arguably the most mysterious figure in Indian film history, credited with shaping the grammar of Hindi film music. As a young heir of the Tripura royal family, he ventured into cinema and popular music amidst challenging times. His unconventional career choices and marriage to a 'commoner' led to family ostracism, and despite formal training, he faced rejection. This detailed biography honors his artistry and investigates what made his music exceptional. It goes beyond listing hits, revealing little-known stories behind classics like 'Mera sundar sapna beet gaya' (Do Bhai, 1948), 'Thandi hawaein' (Naujawan, 1951), and others. The book offers insights into SD's life, work, and understanding of Hindi cinema. Though he was an outsider with limited Hindi and Urdu, he introduced Sahir Ludhianvi to the world and recognized Kishore Kumar's talent. His adaptability to modern sounds, belief in Lata Mangeshkar's virtuosity, close ties with Dev Anand, and controversies over nepotism and plagiarism highlight his complex persona. S.D. Burman: The Prince-Musician provides unique insights into one of India's greatest composers and a vital chapter in cinematic history, making it essential for every film music enthusiast.
Omkar The Stealth Warrior
- Author Name:
Balraj Tiwari
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ओंकार' एक गुमनाम देश-सेवक के संस्मरणों का संग्रह है। इसका कालखंड अस्सी के दशक के आखिरी वर्षों से लेकर नब्बे के दशक के मध्य तक का है। यह वह समय था, जब देश में राजनीतिक व आंतरिक सुरक्षा की दृष्टि से हालात काफी नाजुक थे।1 उस समय भारत के कई राज्यों में कट्टरपंथी ताकतें व आतंकवाद अपने चरम पर था। ऐसे समय में भारत की सुरक्षा एजेंसियों द्वारा आतंकवाद से लड़ने के लिए अलग-अलग कदम उठाए गए। 'ओंकार' भी इन्हीं में से किसी एक टीम का सदस्य था, जिसने अपने छोटे से कार्यकाल में अलग-अलग तरह से व अलग-अलग जगहों पर जाकर कई ऑपरेशंस को अंजाम दिया था। वह समय ऐसा था, जब सीमित संसाधनों के सहारे ही गुप्त रूप से काम करने होते थे। संचार, यातायात व आश्रय के साधन बहुत सीमित होते थे। ओंकार का कार्यक्षेत्र उत्तर भारत के लगभग सभी राज्यों, जैसे पंजाब, कश्मीर, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, हिमाचल व हरियाणा में रहा। हर तरह के मौसम, हालातों से जूझते हुए व अलग-अलग परिवेशों में उसने अपने कार्यों को पूरा किया। किसी भी इनसान का एक दोहरी जिंदगी को जीते हुए कार्य, परिवार व सामान्य जीवन में सामंजस्य बिठाना बहुत कठिन होता है। ओंकार ने अपने संस्मरणों में इस मनःस्थिति का भी जिक्र किया है। इस पुस्तक में ऐसे अनाम देशप्रेमी के संस्मरणों को संकलित कर हर भारतीय को प्रेरित करने का मंतव्य निहित है।
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