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Operation Z Live: Russia-Ukraine Yuddha

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यह युग युद्ध का नहीं है, फिर भी रूस यूक्रेन युद्ध को पूरा एक साल हो गया, लेकिन अभी तक हार-जीत का फैसला नहीं हो पाया है। हार-जीत तो दूर, यह भी तय कर पाना मुश्किल है कि जंग में पलड़ा किसका भारी है—सुपरपावर रूस का या अमेरिका और इंग्लैंड जैसे देशों की मदद ले रहे यूक्रेन का? दोनों देश लड़ाई को लेकर रोजाना अपने-अपने दावे जरूर पेश करते रहते हैं। प्रतिदिन दोनों देशों की सेनाएँ, राष्ट्राध्यक्ष और विदेशी खुफिया एजेंसियाँ आँकड़े एवं विश्लेषण जारी करती हैं, फिर भी लगता है कि सब सच्चाई से कोसों दूर हैं। ऐसे में पूरी दुनिया हैरान है कि आखिर युद्ध के मैदान में चल क्या रहा है! दरअसल, यह युद्ध जितना मैदान में लड़ा जा रहा है, उससे कहीं ज्यादा भीषण तरीके से इन्फॉर्मेशन स्पेस में लड़ा जा रहा है, यानी इंफो वॉरफेयर, जिसके चलते यह पता करना बेहद मुश्किल हो रहा है कि युद्ध में आखिर चल क्या रहा है। युद्ध को कवर करनेवाले पत्रकार भी इस खेल को नहीं समझ पा रहे हैं। किसी भी युद्ध को कवर करने के लिए किसी पत्रकार को सेनाओं के साथ एंबेडेड होने की क्या मजबूरी होती है, उस पर भी कुछ सामग्री इस पुस्तक में है। क्योंकि बिना एंबेडेड जर्नलिज्म के युद्ध की कवरेज करना मुश्किल होता है। लेकिन उस तरह की पत्रकारिता की क्या कमियाँ हो सकती हैं और उसे कैसे सुधारा जा सकता है, उसके बारे में थोड़ा बताने और समझाने का प्रयास इस पुस्तक के माध्यम से किया गया है।

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यह युग युद्ध का नहीं है, फिर भी रूस यूक्रेन युद्ध को पूरा एक साल हो गया, लेकिन अभी तक हार-जीत का फैसला नहीं हो पाया है। हार-जीत तो दूर, यह भी तय कर पाना मुश्किल है कि जंग में पलड़ा किसका भारी है—सुपरपावर रूस का या अमेरिका और इंग्लैंड जैसे देशों की मदद ले रहे यूक्रेन का? दोनों देश लड़ाई को लेकर रोजाना अपने-अपने दावे जरूर पेश करते रहते हैं। प्रतिदिन दोनों देशों की सेनाएँ, राष्ट्राध्यक्ष और विदेशी खुफिया एजेंसियाँ आँकड़े एवं विश्लेषण जारी करती हैं, फिर भी लगता है कि सब सच्चाई से कोसों दूर हैं।

ऐसे में पूरी दुनिया हैरान है कि आखिर युद्ध के मैदान में चल क्या रहा है! दरअसल, यह युद्ध जितना मैदान में लड़ा जा रहा है, उससे कहीं ज्यादा भीषण तरीके से इन्फॉर्मेशन स्पेस में लड़ा जा रहा है, यानी इंफो वॉरफेयर, जिसके चलते यह पता करना बेहद मुश्किल हो रहा है कि युद्ध में आखिर चल क्या रहा है। युद्ध को कवर करनेवाले पत्रकार भी इस खेल को नहीं समझ पा रहे हैं।

किसी भी युद्ध को कवर करने के लिए किसी पत्रकार को सेनाओं के साथ एंबेडेड होने की क्या मजबूरी होती है, उस पर भी कुछ सामग्री इस पुस्तक में है। क्योंकि बिना एंबेडेड जर्नलिज्म के युद्ध की कवरेज करना मुश्किल होता है। लेकिन उस तरह की पत्रकारिता की क्या कमियाँ हो सकती हैं और उसे कैसे सुधारा जा सकता है, उसके बारे में थोड़ा बताने और समझाने का प्रयास इस पुस्तक के माध्यम से किया गया है।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Prabhat Prakashan
Format
Paperback
Publisher
Prabhat Prakashan
Weight
250 grams
ISBN-13
9789355217622
Pages
200
Reading time
~7 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 22 cm
Language
Hindi

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