Mai urdu Hoon
(1)
Author:
Dheerendra Singh FayyazPublisher:
Rekhta PublicationsLanguage:
HindiCategory:
Academics-and-references₹
249
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मैं उर्दू हूँ’ एक भाषा के सफ़र का संस्मरण है। ये किताब उर्दू के प्रारम्भिक युग से शुरू होती है और मीर-ओ-ग़लिब से लेकर आधुनिक युग के नामचीन साहित्यकारों की उँगली थामे उस जगह तक जा पहुँचती है, जहाँ प्राचीन भाषाओं और लिपियों का ज़िक्र स्वाभाविक हो जाता है। इस संस्मरण में धीरे-धीरे ये भेद भी खुलता है कि सभी भाषाओं में कुछ न कुछ साम्य है और प्रत्यक्ष रूप से असंबद्ध लगने वाली देवनागरी, फ़ारसी और अरबी लिपियाँ दर-अस्ल एक ही मूल से निकली हैं। ये किताब लेखक और उर्दू के बीच होने वाला एक रोचक वार्तालाप है जो भाषाओं की व्युत्पत्ति, विकास और प्रसार के विषयों पर रौशनी डालता है।
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मैं उर्दू हूँ’ एक भाषा के सफ़र का संस्मरण है। ये किताब उर्दू के प्रारम्भिक युग से शुरू होती है और मीर-ओ-ग़लिब से लेकर आधुनिक युग के नामचीन साहित्यकारों की उँगली थामे उस जगह तक जा पहुँचती है, जहाँ प्राचीन भाषाओं और लिपियों का ज़िक्र स्वाभाविक हो जाता है। इस संस्मरण में धीरे-धीरे ये भेद भी खुलता है कि सभी भाषाओं में कुछ न कुछ साम्य है और प्रत्यक्ष रूप से असंबद्ध लगने वाली देवनागरी, फ़ारसी और अरबी लिपियाँ दर-अस्ल एक ही मूल से निकली हैं। ये किताब लेखक और उर्दू के बीच होने वाला एक रोचक वार्तालाप है जो भाषाओं की व्युत्पत्ति, विकास और प्रसार के विषयों पर रौशनी डालता है।
Book Details
-
ISBN9789394494343
-
Pages187
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Book
मैं उर्दू हूँ is not a textbook but a memoir—Urdu itself speaks, recounting its journey from the classical era of Mir Taqi Mir and Mirza Ghalib to the contemporary literary landscape. What sets this work apart is its conversational intimacy: the language addresses the reader directly, revealing how Devanagari, Persian, and Arabic scripts share a common ancestral root despite appearing unrelated. The narrative bridges centuries, weaving through ancient scripts and modern authors, dismantling the myth that Indian languages evolved in isolation. For readers curious about linguistic genealogy and the cultural politics of script, this book offers rare clarity without academic jargon. It positions Urdu not as a relic but as a living thread connecting India's multilingual past to its present, making historical linguistics feel personal and immediate.
यह किताब पढ़कर मुझे कैसा अनुभव होगा?
यह किताब आपको एक भाषा के साथ बातचीत करने का अनुभव देगी। उर्दू स्वयं अपनी कहानी सुनाती है—मीर और ग़ालिब के युग से लेकर आधुनिक लिपियों की साझा जड़ों तक। यह शैक्षणिक नहीं, बल्कि संस्मरणात्मक और व्यक्तिगत है। पाठक को ऐसा लगता है जैसे वे किसी पुराने मित्र से उसकी यात्रा सुन रहे हों—रोचक, भावुक और ज्ञानवर्धक।
यह पुस्तक किन पाठकों के लिए सबसे उपयुक्त है और इसे पढ़ने के लिए क्या पूर्व-ज्ञान चाहिए?
- भाषाविज्ञान या भारतीय साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए।
- जो यह समझना चाहते हैं कि देवनागरी, फ़ारसी और अरबी लिपियाँ कैसे जुड़ी हैं।
- किसी विशेष पूर्व-ज्ञान की आवश्यकता नहीं—बस भाषा के इतिहास में जिज्ञासा चाहिए।
- उर्दू प्रेमियों और हिंदी पाठकों दोनों के लिए सुलभ।
इस किताब के विषय का भारतीय पाठकों के लिए आज क्या सांस्कृतिक या ऐतिहासिक महत्व है?
भारत में भाषा और लिपि अक्सर राजनीतिक विभाजन का कारण बनते हैं। यह पुस्तक दिखाती है कि हिंदी-उर्दू और विभिन्न लिपियाँ दरअसल एक ही मूल से निकली हैं। यह साझा विरासत की याद दिलाती है और भाषाई अलगाव की मिथकों को तोड़ती है। आज जब पहचान की राजनीति तीव्र है, यह किताब सांस्कृतिक एकता का ऐतिहासिक प्रमाण प्रस्तुत करती है।
इस विषय पर लेखक का दृष्टिकोण क्या विशिष्ट है?
लेखक ने उर्दू को स्वयं कथावाचक बनाया है—यह प्रथम-पुरुष संस्मरण है जहाँ भाषा अपनी आत्मकथा सुनाती है। यह वार्तालाप शैली शुष्क इतिहास को जीवंत बनाती है। लेखक ने मीर, ग़ालिब और प्राचीन लिपियों को एक सूत्र में पिरोया है, जो अकादमिक किताबों में दुर्लभ है। यह व्यक्तिगत और वैज्ञानिक का सुंदर संतुलन है।
यह किताब पाठक के मन में लंबे समय तक क्या छोड़ जाती है—भावनात्मक, बौद्धिक या सांस्कृतिक रूप से?
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- भारतीय लिपियों की साझा जड़ों का बौद्धिक विस्मय।
- यह अहसास कि भाषाई विविधता विभाजन नहीं, बल्कि साझा विरासत का प्रमाण है।
- भाषा इतिहास को व्यक्तिगत और भावनात्मक बनाने की कला।