Hindi Sahitya Ka Itihas
(0)
Author:
Acharya Ramchandra ShuklaPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Academics-and-references₹
800
₹ 640 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
"हिंदी साहित्य का भंडार पर्याप्त समृद्ध है। गद्य तथा पद्य की लगभग सभी विधाओं का प्रचुर मात्रा में साहित्य-सर्जन हुआ है। अनेक कालजयी कृतियाँ सामने आईं। लेखक-कवियों ने भी सर्जना के उच्च मानदंड स्थापित किए, जिन पर साहित्य-सृजन को कालबद्ध किया गया; वह युग उनके नामों से जाना गया। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने गहन शोध और चिंतन के बाद हिंदी साहित्य के पूरे इतिहास पर विहंगम दृष्टि डाली है। हिंदी भाषा के मूर्धन्य इतिहासकार- साहित्यकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य का जो इतिहास रचा है, वह सर्वाधिक प्रामाणिक तथा प्रयोगसिद्ध ठहरता है। इससे पहले भी हिंदी का इतिहास लिखा गया; पर आचार्यजी का ज्ञान विस्तृत फलक पर दिग्दर्शित है। इसमें आदिकाल यानी वीरगाथा काल का अपभ्रंश काव्य एवं देशभाषा काव्य के विवरण के बाद भक्तिकाल की ज्ञानमार्गी, प्रेममार्गी, रामभक्ति शाखा, कृष्णभक्ति शाखा तथा इस काल की अन्य रचनाओं को अपने अध्ययन का केंद्र बनाया है। इसके बाद के रीतिकाल के सभी लेखक-कवियों के साहित्य को इसमें समाहित किया है। अध्ययन को आगे बढ़ाते हुए आधुनिक काल के गद्य साहित्य, उसकी परंपरा तथा उत्थान के साथ काव्य को अपने विवेचन केंद्र में रखा है। हिंदी साहित्य का क्षेत्र चहुँदिशि विस्तृत है। हिंदी साहित्य के इतिहास को सम्यक् रूप में तथा गहराई से जानने-समझने के लिए आचार्य रामचंद्र शुक्ल का यह इतिहास-ग्रंथ सर्वाधिक उपयुक्त है।
Read moreDon’t Miss Out
Pick a membership and see exactly what it gets you
- 15 Free Deliveries
- 1 Free Book up to ₹500 MRP
- 0% off every book, every time
Subscribed already? Continue to your
benefits Login
You pay ₹1,499/Year
You will be auto-charged ₹1,499 every year. Cancel auto-charge anytime.
Benefits with Rachnaye Connoisseur
1 Free Physical Book up to ₹500 MRP
Personal Recommendations
15 Free Deliveries Per Year
Format:
Piracy Free
Express Delivery
Secure Payment
About the Book
"हिंदी साहित्य का भंडार पर्याप्त समृद्ध है। गद्य तथा पद्य की लगभग सभी विधाओं का प्रचुर मात्रा में साहित्य-सर्जन हुआ है। अनेक कालजयी कृतियाँ सामने आईं। लेखक-कवियों ने भी सर्जना के उच्च मानदंड स्थापित किए, जिन पर साहित्य-सृजन को कालबद्ध किया गया; वह युग उनके नामों से जाना गया। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने गहन शोध और चिंतन के बाद हिंदी साहित्य के पूरे इतिहास पर विहंगम दृष्टि डाली है।
हिंदी भाषा के मूर्धन्य इतिहासकार- साहित्यकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य का जो इतिहास रचा है, वह सर्वाधिक प्रामाणिक तथा प्रयोगसिद्ध ठहरता है। इससे पहले भी हिंदी का इतिहास लिखा गया; पर आचार्यजी का ज्ञान विस्तृत फलक पर दिग्दर्शित है। इसमें आदिकाल यानी वीरगाथा काल का अपभ्रंश काव्य एवं देशभाषा काव्य के विवरण के बाद भक्तिकाल की ज्ञानमार्गी, प्रेममार्गी, रामभक्ति शाखा, कृष्णभक्ति शाखा तथा इस काल की अन्य रचनाओं को अपने अध्ययन का केंद्र बनाया है। इसके बाद के रीतिकाल के सभी लेखक-कवियों के साहित्य को इसमें समाहित किया है।
अध्ययन को आगे बढ़ाते हुए आधुनिक काल के गद्य साहित्य, उसकी परंपरा तथा उत्थान के साथ काव्य को अपने विवेचन केंद्र में रखा है। हिंदी साहित्य का क्षेत्र चहुँदिशि विस्तृत है। हिंदी साहित्य के इतिहास को सम्यक् रूप में तथा गहराई से जानने-समझने के लिए आचार्य रामचंद्र शुक्ल का यह इतिहास-ग्रंथ सर्वाधिक उपयुक्त है।
Book Details
-
ISBN9789351867623
-
Pages600
-
Avg Reading Time20 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Bhramargeet Saar
- Author Name:
Acharya Ramchandra Shukla +1
- Book Type:

- Description:
सूर के कृष्ण-प्रेम तथा भक्ति के सागर ‘सूरसागर’ का सबसे मूल्यवान मोती है ‘भ्रमरगीत’ जिसमें सूरदास के हृदय से निकली अपूर्व रसधारा बही है। ‘भ्रमरगीत सार’ के संकलन-सम्पादन का कार्य आचार्य शुक्ल ने 1920 में शुरू किया था, लेकिन ठीक से पूरा होने में इसे कुछ समय लगा। लगभग चार सौ पदों के इस संचयन में उस समय कुछ पुनरुक्ति दोष भी रह गया था जिसे पुस्तक की लोकप्रियता और लगातार बढ़ती माँग के चलते, ठीक करने का समय आचार्य नहीं जुटा पाए थे।
प्रस्तुत संस्करण वरिष्ठ आलोचक और आचार्य शुक्ल के समीप रहे विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित है। सो इसमें नए पाठकों की सुविधा के लिए कुछ और टिप्पणियाँ भी जोड़ दी गई हैं, जिन्हें हम ‘चूर्णिका’ शीर्षक से पुस्तक के अन्त में पाएँगे।
आचार्य शुक्ल के शब्दों में सूरदास का प्रेम-पथ ‘लोक से न्यारा’ है। गोपियों के प्रेम-भाव की गम्भीरता उद्धव के ज्ञान-गर्व को मिटाती हुई दिखाई पड़ती है। वह भक्ति की एकान्त साधना का आदर्श प्रतिष्ठित करती जान पड़ती है, लोकधर्म के किसी अंग का नहीं। सूरदास सच्चे प्रेम-मार्ग के त्याग और पवित्रता को ज्ञान-मार्ग के त्याग और पवित्रता के समकक्ष खड़ा करने में सफल रहे हैं। साथ ही, उन्होंने उस त्याग को रागात्मिका वृत्ति द्वारा प्रेरित दिखाकर भक्ति या प्रेम-मार्ग की सुगमता भी प्रतिपादित की है।
पदों के प्रामाणिक पाठ के साथ आचार्य शुक्ल की सुदीर्घ व्याख्या इस पुस्तक को सूर के प्रेम-पक्ष की मूल्यवान विवेचना का रूप देती है, जो मध्यकालीन काव्य, विशेषकर भक्तिधारा के अध्येताओं के साथ ही भाव-प्रेमी पाठकों के लिए भी आनन्द का स्रोत सिद्ध होती है।
Hindi Sahitya Ka Itihas
- Author Name:
Acharya Ramchandra Shukla
- Book Type:

- Description:
1930 का दशक आधुनिक हिन्दी साहित्य के रचनात्मक विकास में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। एक ओर कथानक और परम्परागत स्थूल वृत्त प्रेमचन्द के हाथों में दृष्टि-सम्पन्न कथा-कृतियाँ बनते हैं तो दूसरी ओर प्रसाद-निराला-पन्त-महादेवी के यहाँ पिछले इतिवृत्तात्मक काव्य-वर्णन सूक्ष्म अनुभूति-विधान का रूप लेते हैं। इसी के समानान्तर रामचन्द्र शुक्ल कवि-वृत्त संग्रह को इतिहास बनाते हैं।
इतिहास-लेखन में रामचन्द्र शुक्ल एक ऐसी क्रमिक पद्धति का अनुसरण करते हैं जो अपना मार्ग स्वयं प्रशस्त करती चलती है। विवेचन में तर्क का क्रमबद्ध विकास ऐसे है कि तर्क का एक-एक चरण एक-दूसरे से जुड़ा हुआ, एक-दूसरे में से निकलता दिखेगा। इसीलिए पाठक को उस पर चलने में सुगमता होती है, जटिल से जटिल प्रसंग आसानी से हृदयंगम हो जाता है। लेखक को अपने तर्क पर इतना गहरा विश्वास है कि आवेश की उसे अपेक्षा नहीं रह जाती। आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक आचार्य शुक्ल का इतिहास इसी प्रकार तथ्याश्रित और तर्कसम्मत रूप में चलता है। वे एक प्रवृत्ति के अन्तर्गत सक्रिय या कि समकालीन लेखकों के मूल्यांकन में दोनों पक्षों के वैशिष्ट्य और उनकी सीमाओं का भी अकुंठ विवेचन करते चलते हैं।
अपनी आरम्भिक उपपत्ति में आचार्य शुक्ल ने बताया है कि साहित्य ‘जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिम्बित होता है,’ और इन्हीं चित्तवृत्तियों की परम्परा को परखते हुए साहित्य-परम्परा के साथ उनका सामंजस्य दिखाने में आचार्य शुक्ल का इतिहास और आलोचना-कर्म निहित है।
इस इतिहास की एक बड़ी विशेषता है कि आधुनिक काल के सन्दर्भ में पहुँचकर लेखक यूरोपीय साहित्य का एक विस्तृत, यद्यपि कि सांकेतिक ही, परिदृश्य खड़ा करता है, जैसे कि आदि तथा मध्यकाल के सन्दर्भ में संस्कृत-प्राकृत-अपभ्रंश काव्यशास्त्र तथा साहित्य का। इससे उसके ऐतिहासिक विवेचन में स्रोत, सम्पर्क और प्रभावों की समझ स्पष्टतर होती है। यही नहीं, लेखकों के साथ-साथ यूरोपीय संगीतकार और कलावन्तों पर भी नई प्रवृत्तियों के सन्दर्भ में वह यथावश्यक टिप्पणी करता है।
—रामस्वरूप चतुर्वेदी
Chintamani : Vol. 1
- Author Name:
Acharya Ramchandra Shukla
- Book Type:

- Description:
“यदि वाणी की शक्ति ईश्वर का सबसे उत्तम प्रसाद है; यदि भाषा की उत्पत्ति बहुत-से विद्वानों द्वारा ईश्वर से मानी गई है? यदि शब्दों द्वारा अन्तःकरण के गुप्त रहस्य प्रकट किए जाते हैं; चित्त की वेदना को शान्ति दी जाती है; हृदय में बैठा हुआ शोक बाहर निकाल दिया जाता है; दया उत्पन्न की जाती है और बुद्धि चिरस्थायी बनाई जाती है; यदि बड़े ग्रन्थकारों द्वारा बहुत-से मनुष्य मिलकर एक बनाए जाते हैं; जातीय लक्षण स्थापित होता है; भूत और भविष्य तथा पूर्व और पश्चिम एक-दूसरे के सम्मुख उपस्थित किए जाते हैं; और यदि ऐसे लोग मनुष्य जाति में अवतार-स्वरूप माने जाते हैं—तो साहित्य की अवहेलना करना और उसके अध्ययन से मुख मोड़ना कितनी बड़ी भारी कृतघ्नता है।”
—‘साहित्य’ शीर्षक निबन्ध से
Padmavat
- Author Name:
Acharya Ramchandra Shukla
- Book Type:

- Description:
हिन्दी के प्रसिद्ध सूफ़ी कवि मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित प्रस्तुत पुस्तक ‘पद्मावत’ एक प्रेमाख्यान है जिसमें प्रेम-साधना का सम्यक् प्रतिपादन किया गया है। इसमें प्रेमात्मक इतिवृत्ति की रोचकता है, गम्भीर भावों की सुन्दर अभिव्यक्ति व उदास चरित्रों का विशद चित्रण है।
सिंहल द्वीप के राजा गन्धर्वसेन की पुत्री पद्मावती परम सुन्दरी थी और उसके योग्य वर कहीं नहीं मिल रहा था। पद्मावती के पास हीरामन नाम का एक तोता था, जो बहुत वाचाल एवं पंडित था और उसे बहुत प्रिय था।
पद्मावती के रूप एवं गुणों की प्रशंसा सुनते ही राजा रतनसेन उसके लिए अधीर हो उठे और उसे प्राप्त करने की आशा में जोगी का वेश धारण कर घर से निकल पड़े।
सिंहल द्वीप में पहुँचकर राजा रतनसेन जोगियों के साथ शिव के मन्दिर में पद्मावती का ध्यान एवं नाम जाप करने लगे। हीरामन ने उधर यह समाचार पद्मावती से कह सुनाया, जो राजा के प्रेम से प्रभावित होकर विकल हो उठी। पंचमी के दिन वह शिवपूजन के लिए उस मन्दिर में गई, जहाँ उसका रूप देखते ही राजा मूर्च्छित हो गया और वह भली-भाँति उसे देख भी नहीं सका। जागने पर जब वह अधीर हो रहे थे, पद्मावती ने उन्हें कहला भेजा कि दुर्ग सिंहलगढ़ पर चढ़े बिना अब उससे भेंट होना सम्भव नहीं है। तदनुसार शिव से सिद्धि पाकर रतनसेन उक्त गढ़ में प्रवेश करने की चेष्टा में ही सबेरे पकड़ लिए गए और उन्हें सूली की आज्ञा दे दी गई। अन्त में जोगियों द्वारा गढ़ के घिर जाने पर शिव की सहायता से उस पर विजय हो गई और गन्धर्वसेन ने पद्मावती के साथ रतनसेन का विवाह कर दिया।
विवाहोपरान्त राजा रतनसेन चित्तौड़ लौट आए और सुखपूर्वक रानी पद्मावती के साथ रहने लगे।
दूसरी तरफ़ बादशाह अलाउद्दीन रानी पद्मावती के रूप-लावण्य की प्रशंसा सुनकर मुग्ध हो जाता है और विवाह करने को आतुर हो उठा।
इसके बाद राजा रतनसेन से मित्रता कर छलपूर्वक उन्हें मरवा दिया। पति का शव देखकर रानी पद्मावती सती हो गईं।
अन्त में जब अलाउद्दीन अपनी सेना के साथ चित्तौड़गढ़ पहुँचता है तो रानी पद्मावती की चिता की राख देखकर दु:ख एवं ग्लानि का अनुभव करता है।
इस महाकाव्य में प्रेमतत्त्व-विरह का निरूपण तथा प्रेम-साधना का सम्यक् प्रतिपादन तथा सूक्तियों, लोकोक्तियों, मुहावरे तथा कहावतों का प्रयोग बड़े ही सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
Acharya Ramchandra Shukla Ke Shreshtha Nibandh
- Author Name:
Acharya Ramchandra Shukla +2
- Book Type:

- Description:
Awating description for this book
Acharya Ramchandra Shukla Ke Shreshtha Nibandh
Acharya Ramchandra Shukla
20% off₹ 225
₹ 180
Available
Acharya Shukla : Pratinidhi Nibandha
- Author Name:
Acharya Ramchandra Shukla +1
- Book Type:

- Description:
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हिन्दी के अनन्य निबन्धकार हैं। साहित्यिक, शास्त्रीय और शैक्षिक दृष्टि से उनके निबन्धों का अध्ययन अनिवार्य है, पर उनके प्रतिनिधि निबन्धों का एक भी संकलन ऐसा नहीं है जो उनकी विधायिनी प्रतिभा का सम्यक् परिचय दे सके। इस परिप्रेक्ष्य में ‘आचार्य शुक्ल : प्रतिनिधि निबन्ध’ बेहद महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि शुक्ल जी की प्राय: सभी उपलब्ध और अनुपलब्ध कृतियों का प्रतिनिधित्व करती है यह पुस्तक।
पुस्तक में शुक्ल जी के प्रतिनिधि निबन्धों को तीन भागों में बाँटा गया है—वैचारिक निबन्ध, सैद्धान्तिक निबन्ध और व्यावहारिक निबन्ध। संकलन के आधार हैं—‘बुद्ध चरित’, ‘विश्व प्रपंच’, ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’, ‘रस-मीमांसा’, ‘गोस्वामी तुलसीदास’, ‘हिन्दी निबन्ध माला’, ‘भारतेन्दु साहित्य’, ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’, ‘चिन्तामणि’ (भाग—दो), ‘सूरदास’ आदि। संकलन का प्रारम्भिक निबन्ध उनके ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ से संगृहित है। यह लेख उनकी दृष्टि से निबन्ध का मानदंड प्रस्तुत करता है। इसे संग्रह की प्रस्तावना के रूप में ग्रहण किया जा सकता है। काव्य-क्रम की दृष्टि से भी प्रारम्भ से लेकर उनके जीवन के अन्तिम समय तक लिखे गए निबन्धों का पुस्तक में समावेश किया गया है। भाषा, साहित्य शास्त्र तथा हिन्दी के भक्ति साहित्य से लेकर ‘कामायनी’ तक इन निबन्धों के विषय हैं। इसलिए उनकी व्यापक मान्यताओं और भेद में अभेद देखनेवाली तत्वग्राही दृष्टि का सम्यक् ये निबन्ध देते हैं। इस दृष्टि से इनकी परिधि बड़ी व्यापक है।
शुक्ल जी का सर्वोत्तम लेखन ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ का प्रकाशन है और आजन्म वे उससे सम्बद्ध भी रहे। इसलिए ‘सभा’ के वर्तनी सिद्धान्त का ही व्यवहार किया गया है, यथा—पंचम वर्ण के स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग और दो से अधिक सामासिक शब्दों में ही समास चिन्ह का प्रयोग। शुक्ल जी रखा न लिखकर ‘रक्खा’ लिखते थे ताकि देवनागरी के उच्चारण की वैज्ञानिकता—जो लिखा जाए, वही पढ़ा जाए—सुरक्षित रह सके, उसका भी पालन किया गया है।
परिशिष्टों में आचार्य शुक्ल का जीवन-वृत्त और कृतियों के संकेत-सूत्र दे दिए गए हैं और उनके निबन्धों का संक्षिप्त मूल्यांकन हिन्दी निबन्ध-परम्परा के परिवेश में कर दिया गया है। शोधार्थियों, अध्येताओं आदि के लिए संग्रहणीय और महत्त्वपूर्ण कृति।
Vichar Ka Aina : Kala Sahitya Sanskriti : Ramchandra Shukla
- Author Name:
Acharya Ramchandra Shukla +1
- Book Type:

- Description:
विचार का आईना शृंखला के अन्तर्गत ऐसे साहित्यकारों, चिन्तकों और राजनेताओं के ‘कला साहित्य संस्कृति’ केन्द्रित चिन्तन को प्रस्तुत किया जा रहा है जिन्होंने भारतीय जनमानस को गहराई से प्रभावित किया। इसके पहले चरण में हम मोहनदास करमचन्द गांधी, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, राममनोहर लोहिया, रामचन्द्र शुक्ल, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, महादेवी वर्मा, सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ और गजानन माधव मुक्तिबोध के विचारपरक लेखन से एक ऐसा मुकम्मल संचयन प्रस्तुत कर रहे हैं जो हर लिहाज से संग्रहणीय है।
रामचन्द्र शुक्ल हिन्दी साहित्य के ऐसे प्रस्थान बिन्दु हैं जिनसे टकराए बिना हिन्दी साहित्य का कोई इतिहास मुमकिन नहीं हैं। इसी तरह वे हिन्दी आलोचना के भी आदि पूर्वज हैं। हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखते हुए उन्होंने तार्किक ढंग से न सिर्फ उसका काल-विभाजन प्रस्तुत किया बल्कि मध्यकालीन कवियों के पाठ-भेद के बीच सही पाठ तक पहुँचने की राह भी दिखाई। आलोचना को अधुनातन विचारों से जोड़ते हुए एक मान्य कैनन दिया। उनके निबन्धों ने भारतीय चित्त की मीमांसा के नए द्वार खोले। वे हिन्दी साहित्य की अनेक बहसों के भी प्रस्थान बिन्दु हैं। हमें उम्मीद है कि उनके कला, साहित्य और संस्कृति सम्बन्धी लेखन को पढ़ते हुए हिन्दी समाज की निर्मिति को समझने के सही और सटीक सूत्र मिलेंगे।
Ramchandra shukla Rachanawali : Vol. 1-8
- Author Name:
Namvar Singh +3
- Book Type:

- Description:
आचार्य शुक्ल कोरे साहित्य समालोचक नहीं थे। वे गम्भीर अर्थों में साहित्य के समालोचक थे, जहाँ साहित्य के अन्तर्गत जीवन की चिन्ता, समाज की चिन्ता और पूरी संस्कृति की चिन्ता रहती थी। यह हिन्दी आलोचना का सौभाग्य है कि उसकी प्रतिष्ठा एक ऐसे समालोचक द्वारा हुई जो शुद्ध साहित्यिक आलोचक नहीं था, सिर्फ़ अलंकार और रस की मीमांसा करनेवाला काव्य-विवेचक नहीं था, बल्कि साहित्य को व्यापक सामाजिक सन्दर्भों में देखनेवाला और साहित्य की सामाजिक सार्थकता की प्रतिष्ठा करनेवाला आलोचक था। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल दुनिया के अनेक महान आलोचकों के समान ही भारत के पहले गम्भीर समालोचक दिखाई पड़ते हैं। आचार्य शुक्ल अपना चिन्तन साहित्य की सामाजिक सार्थकता और साहित्य में ‘लोक मंगल’ के व्यापक सन्दर्भ में करते हैं, तो स्वभावतः उनके व्यापक, विराट व्यक्तित्व की ओर हमारा ध्यान जाता है। उनके समग्र कृतित्व का संकलन हिन्दी साहित्य की परम्परा के सर्वश्रेष्ठ के पुनर्जीवन की तरह है।
आठ खंडों में प्रकाशित ‘रामचन्द्र शुक्ल रचनावली’ के पहले खंड में उनकी सर्वाधिक चर्चित और कालजयी कृति ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ संकलित है। रचनावली के सम्पादक नामवर सिंह ने इसकी भूमिका में आचार्य शुक्ल की इस कृति के महत्त्व और उसकी विशेषताओं पर विस्तार से चर्चा की है।
Manikarnika : Drishti Aur Vimarsh
- Author Name:
Anand Das
- Book Type:

- Description:
समकालीन हिन्दी दलित साहित्य और आत्मकथा विधा के वैचारिक आधार को गहराई से समझने के लिए “मणिकर्णिका : दृष्टि और विमर्श” एक महत्वपूर्ण कृति है। लेखक आनंद दास ने इस पुस्तक के माध्यम से समाज में व्याप्त असमानता, शोषण और संघर्ष की वास्तविकताओं का सटीक एवं गंभीर विश्लेषण प्रस्तुत किया है। यह पुस्तक न केवल साहित्यिक दृष्टि से समृद्ध है, बल्कि सामाजिक चेतना जगाने का भी कार्य करती है। शोधार्थियों और साहित्य-प्रेमियों के लिए एक अत्यंत उपयोगी एवं पठनीय पुस्तक!
Aalim Sir Ki English Class
- Author Name:
Aalim
- Book Type:

- Description:
Awating description for this book
District Saharanpur (Environmental Challenges and Population Scenario)
- Author Name:
Dr. Narendar Kumar +1
- Book Type:

- Description:
जनपद सहारनपुर अपनी प्राचीन ऐतिहासिक विरासत, भौगोलिक स्थिति, विविधतापूर्ण सांस्कृतिक परम्पराओं तथा प्राकृतिक संसाधनों के कारण प्रदेश में अपनी एक विशिष्ट पहचान रखता है। उत्तर प्रदेश राज्य के इस प्रसिद्ध जनपद की जनसंख्या, संस्कृति एवं पर्यावरण जैसे ज्वलन्त विषयों पर आधारित यह पुस्तक लेखकों द्वारा अत्यन्त सराहनीय एवं समयानुकूल प्रयास है। वर्तमान समय में तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या, नगरीयकरण तथा औद्योगिक गतिविधियों के कारण जनपद में अनेक पर्यावणीय चुनौतियाँ सामने आ रही है। अतः वर्तमान परिस्थितियों में इस प्रकार का सार्थक प्रयास न केवल शैक्षणिक समाज की दृष्टि से अर्पित नीति निर्धारकों और सामाजिक विकास के लिए भी मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है। लेखकों का यह प्रयास सहारनपुर जनपद की सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान और पर्यावरण सन्तुलन के प्रति जागरूकता लाने के दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करेगा। मैं लेखकों को इस अत्यन्त ही सार्थक प्रयास के लिए हार्दिक बधाई और उज्जवल भविष्य के लिए हृदय की गहराइयों से अपनी ढेरों शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ। - प्रो. बीरेन्द्र सिंह : पूर्व प्राचार्य, आर.एस.एम. (पी.जी.) कालेज धामपुर, बिजनौर (उ.प्र.)
Mai urdu Hoon
- Author Name:
Dheerendra Singh Fayyaz
- Book Type:

- Description:
मैं उर्दू हूँ’ एक भाषा के सफ़र का संस्मरण है। ये किताब उर्दू के प्रारम्भिक युग से शुरू होती है और मीर-ओ-ग़लिब से लेकर आधुनिक युग के नामचीन साहित्यकारों की उँगली थामे उस जगह तक जा पहुँचती है, जहाँ प्राचीन भाषाओं और लिपियों का ज़िक्र स्वाभाविक हो जाता है। इस संस्मरण में धीरे-धीरे ये भेद भी खुलता है कि सभी भाषाओं में कुछ न कुछ साम्य है और प्रत्यक्ष रूप से असंबद्ध लगने वाली देवनागरी, फ़ारसी और अरबी लिपियाँ दर-अस्ल एक ही मूल से निकली हैं। ये किताब लेखक और उर्दू के बीच होने वाला एक रोचक वार्तालाप है जो भाषाओं की व्युत्पत्ति, विकास और प्रसार के विषयों पर रौशनी डालता है।
Sarjnatmak Shiksha
- Author Name:
Raghav Prakash +2
- Book Type:

- Description:
आज हर समझदार माता-पिता अपने बच्चे को सही शिक्षा दिलवाने के लिए बेचैन हैं, हर चैतन्य शिक्षक अपने विद्यार्थी को ऊँचाइयाँ देने के लिए आतुर है और हर प्रबुद्ध शिक्षा-प्रशासक अपने स्कूल-कॉलेज की शिक्षण-पद्धति को परवान चढ़ाकर उसे उत्कृष्ट बनाने के लिए संकल्पित है। किन्तु, कुछ अपवादों को छोड़कर, दुनिया भर की शिक्षा सर के बल खड़ी है। असल में, व्यवस्था-केन्द्रित शिक्षा-पद्धति को विद्यार्थी-केन्द्रित होना चाहिए। शिक्षा की मूल्य-दृष्टि, उसका पाठ्यक्रम शिक्षण-पद्धति और मूल्यांकन-पद्धति सबकुछ विद्यार्थी की वृत्ति, रुचि, योग्यता और गति के अनुरूप होनी चाहिए; विद्यार्थी की चेतना में गहरे छिपी उसकी मूल्यवान सर्जनात्मक क्षमता का, अधिकतम विकास कैसे किया जा सकता है, उसकी तजबीज ‘सर्जनात्मक शिक्षा’ में प्रस्तुत की गई है। इसमें जीवन-दृष्टि और शिक्षा-दृष्टि के ठहराव को उजागर कर कल्याणकारी जीवन-दृष्टि और उसी के अनुरूप सर्जनात्मक पाठ्यक्रम, सर्जनात्मक शिक्षण-पद्धति, सर्जनात्मक मूल्यांकन पद्धति एवं रचनात्मक शिक्षा-प्रशासन-व्यवस्था को प्रस्तुत किया गया है। पूर्व और पश्चिम के लगभग सौ शिक्षाशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों, मनोवैज्ञानिकों, धर्मशास्त्रियों, शिक्षा-वैज्ञानिकों आदि द्वारा लिखित शोधपूर्ण पुस्तकों का गहन मंथन करने के उपरांत जो शिक्षा-दृष्टि और शिक्षा-व्यवहार विकसित हुआ है; ‘सर्जनात्मक शिक्षा’ उसी का ऐसा ‘अमृत तत्त्व’ है जो उत्कृष्ट की तलाश में जुटे हुए प्रत्येक शिक्षाविद्, अभिभावक, शिक्षक, शिक्षा-प्रबन्धक और चैतन्य विद्यार्थी के लिए अनिवार्य रूप से पठनीय है।
SUDHA OM DHINGRA KI KAHANIYON ME PRVASI JEEVAN
- Author Name:
Shahnaz
- Book Type:

- Description:
Book
SUDHA OM DHINGRA KI KAHANIYON ME NIHIT TATHA ABHIVYAKT SAMASYAEN
- Author Name:
Nidhiraj Bhadana +1
- Book Type:

- Description:
प्रवासी कहानीकार डाॅ सुधा ओम ढींगरा की कहानियों पर यह दो शोध कार्य हैं जो निधिराज भडाना तथा रेशू पाण्डेय ने किये हैं।
Keshav Mishr Ke Granthon Me Orchha Ka Itihas
- Author Name:
Dr. Ramswaroop Dengula
- Book Type:

- Description:
डॉ. रामस्वरूप ढेंगुला द्वारा लिखित इस विस्तृत हिंदी साहित्य पुस्तक के माध्यम से ओरछा के समृद्ध ऐतिहासिक ताने-बाने में गोता लगाएँ। यह विद्वत्तापूर्ण कार्य शानदार शहर ओरछा के बारे में महाकवि केशव मिश्र के लेखन में दर्शाई गई ऐतिहासिक चेतना की बारीकी से जाँच करता है। यह पुस्तक पाठकों को इस बात का गहन विश्लेषण प्रदान करती है कि कैसे इस मध्यकालीन कवि ने अपने विभिन्न साहित्यिक कार्यों में इस ऐतिहासिक शहर के सार, वास्तुकला, संस्कृति और सामाजिक ताने-बाने को उकेरा। सावधानीपूर्वक शोध और अकादमिक कठोरता के माध्यम से, लेखक केशव मिश्र के लेखन में प्रलेखित ओरछा के राजसी मंदिरों, महलों और सांस्कृतिक विरासत के ऐतिहासिक महत्व को उजागर करता है। यह अकादमिक पाठ शोधकर्ताओं, इतिहासकारों और साहित्य प्रेमियों के लिए एक अमूल्य संसाधन के रूप में कार्य करता है, जो शास्त्रीय हिंदी साहित्य के लेंस के माध्यम से ओरछा की ऐतिहासिक कथा को समझने में रुचि रखते हैं।
Adyatan Hindi Vyakaran
- Author Name:
B.N. Pandey
- Book Type:

- Description:
"यह पुस्तक चार अध्यायों में विभक्त है : प्रथम अध्याय में हिंदी भाषा में उपलब्ध सभी ध्वनियों एवं उनके लिखित रूप अक्षरों एवं संयुक्ताक्षरों की लेखन विधि, उच्चारण एवं उनसे शब्द-निर्माण की व्याख्या की गई है, ताकि हिंदीतरभाषी भारतीय एवं विदेशी परीक्षार्थी उनकी स्पष्ट समझ के साथ-साथ कम-से-कम समय में उनका अभ्यास कर उनपर अधिकार कर सकें। दूसरे अध्याय में सभी प्रकार के शब्दों की प्रकृति, निर्माण एवं पहचान की व्याख्या के साथ-साथ वाक्य गठन के दौरान लिंग, वचन विभक्ति, काल आदि के प्रभाव से उनमें होनेवाले रूप परिवर्तन को विवेचित-विश्लेषित किया गया है। तीसरे अध्याय में हिंदी भाषा में उपलब्ध सभी प्रकार के वाक्यों के गठन के अंतर्निहित नियमों को विश्लेषित किया गया है। वाक्य किसी भाषा के दैनिक प्रयोग की सबसे महत्त्वपूर्ण इकाई हैं और सभी प्रकार के अधिक-से-अधिक वाक्यों के निरंतर अभ्यास से ही भाषा का कार्यसाधक ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। चौथे अध्याय में उपसर्ग, प्रत्यय, संधि एवं समास समाहित हैं : व्याकरण पुस्तकों की महत्ता विषय के चयन में नहीं उनकी सुबोध एवं सुग्राह्य प्रस्तुति में होती है। व्याकरण की सार्थकता इसमें है कि वह साध्य नहीं, अपितु भाषा की सम्यक् समझ एवं प्रयोग का साधन बने।
Prabhat Sookti Kosh
- Author Name:
Mahesh Dutt Sharma
- Book Type:

- Description:
सूक्तियाँ गागर में सागर भरे वे शब्द समूह हैं, जो सीधे मर्म पर चोट करते हैं। इन शब्दों में ऐसी शक्ति होती है कि ये इनसान को सोचने के लिए मजबूर कर देते हैं और कई बार वह क्षण जीवन का महत्त्वपूर्ण मोड़ साबित होता है, जो जीवन की दशा और दिशा को बदलकर रख देता है, यह व्यक्ति का मानो नया जन्म होता है; उसका चीजों को देखने का दृष्टिकोण पूरी तरह बदल जाता है। महात्मा बुद्ध के कुछ सूक्ति वाक्य ज्यों अंगुलिमाल का हृदय परिवर्तित कर देते हैं और वह डाकू से संत बन जाता है; सूक्तियाँ कुछ यों ही मन पर गहरा प्रभाव छोड़ती हैं। प्रस्तुत पुस्तक में दुनिया भर के महान् विचारकों की सूक्तियों का संकलन किया गया है, जो प्रबुद्ध पाठकों के लिए निश्चित ही उपयोगी सिद्ध होगा।
Achchhi English Kaise Bolen
- Author Name:
A.K. Gandhi
- Book Type:

- Description:
"बाजार में अंग्रेजी बोलना सीखाने का दावा करनेवाली अनेक पुस्तकें हैं, लेकिन प्रस्तुत पुस्तक उन सभी से स्तर, ज्ञान तथा अभ्यास में कहीं बेहतर है, क्योंकि इसमें उन गुणों का समावेश किया गया है, जिनके आधार पर व्यवहार में छात्रों को अंग्रेजी बोलना सिखाया गया है। इस पुस्तक में दी गई तकनीक छात्रों पर आजमाई गई है, तथा इसके सकारात्मक परिणाम प्राप्त भी हुए हैं। इसका कारण है कि इसमें वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक तथा शैक्षिक-मनोवैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर पाठों की रचना की गई है। प्रस्तुत पुस्तक में अंग्रेजी के सभी आयामों को 30 दिन के पाठों में समेटा गया है तथा प्रत्येक दिन के अभ्यास को शीर्षकों में विभाजित किया गया है, जिससे पाठकगण अंग्रेजी के साथ बेहतर तारतम्य स्थापित कर पाएँ। आसानी से अच्छी अंग्रेजी सिखानेवाली एक व्यावहारिक पुस्तक। "
Saral Nibandh
- Author Name:
Shyam Chandra Kapoor
- Book Type:

- Description:
निबंध लिखते हुए संकोच, भय और लज्जा त्याग देनी चाहिए। झिझकने तथा डरने से निबंध अच्छा नहीं बन पड़ता। निबंध-लेखक से यह आशा कोई नहीं करता कि वह जिस विषय पर निबंध लिख रहा है, उसके विषय में वह संपूर्ण तथ्यों को जानता ही हो। उससे तो केवल इतनी ही अपेक्षा की जाती है कि वह प्रस्तुत विषय के बारे में जो कुछ भी जानता है, उसे बिना छिपाये, संक्षेप में और सरलता से प्रकट कर दे। निबंध तो वास्तव में शुद्ध हृदय की विचार-तरंग ही है।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book