Bharatiya Vaigyanik
(0)
Author:
Krishna Murari Lal SrivastavaPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Academics-and-references₹
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सृष्टि के आरंभ से लेकर आज तक की चमत्कृत कर देनेवाली वैज्ञानिक उपलब्धियाँ हममें विज्ञान के बारे में अद्भुत जिज्ञासा भरती रही हैं। वैज्ञानिक प्रगति ने विश्व भर में नित नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। एक से बढ़कर एक वैज्ञानिक नई-नई खोजों से हमें चौंकाते रहे हैं। इनमें भारतीय वैज्ञानिकों का महत्व प्राचीन काल से ही विशेष रूप से रहा है और इनपर हमें अपार गर्व है। बात प्राचीन काल की करें या अर्वाचीन की, भारत के वैज्ञानिक सभी क्षेत्रों में सदैव अग्रणी रहे हैं। आयुर्वेद, खगोल, रसायन, धातु विज्ञान शरीर शास्त्र सौर ऊर्जा, अंतरिक्ष विज्ञान तथा परमाणु ऊर्जा आदि विज्ञान की सभी शाखा-प्रशाखाओं और खोजो मे भारतीय वैज्ञानिकों का योगदान प्रशसनीय रहा है। प्रस्तुत पुस्तक हमारे वैज्ञानिकों के व्यक्तत्वि और कृतित्व से छात्रों, अध्यापकों और अनुसंधित्सुओं को परिचित कराने में पूर्णतः सक्षम है। इनके परिचय चित्रमय होने से इनकी प्रेरणा व आकर्षकता और भी बढ़ जाती है।
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सृष्टि के आरंभ से लेकर आज तक की चमत्कृत कर देनेवाली वैज्ञानिक उपलब्धियाँ हममें विज्ञान के बारे में अद्भुत जिज्ञासा भरती रही हैं। वैज्ञानिक प्रगति ने विश्व भर में नित नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। एक से बढ़कर एक वैज्ञानिक नई-नई खोजों से हमें चौंकाते रहे हैं। इनमें भारतीय वैज्ञानिकों का महत्व प्राचीन काल से ही विशेष रूप से रहा है और इनपर हमें अपार गर्व है।
बात प्राचीन काल की करें या अर्वाचीन की, भारत के वैज्ञानिक सभी क्षेत्रों में सदैव अग्रणी रहे हैं। आयुर्वेद, खगोल, रसायन, धातु विज्ञान शरीर शास्त्र सौर ऊर्जा, अंतरिक्ष विज्ञान तथा परमाणु ऊर्जा आदि विज्ञान की सभी शाखा-प्रशाखाओं और खोजो मे भारतीय वैज्ञानिकों का योगदान प्रशसनीय रहा है।
प्रस्तुत पुस्तक हमारे वैज्ञानिकों के व्यक्तत्वि और कृतित्व से छात्रों, अध्यापकों और अनुसंधित्सुओं को परिचित कराने में पूर्णतः सक्षम है। इनके परिचय चित्रमय होने से इनकी प्रेरणा व आकर्षकता और भी बढ़ जाती है।
Book Details
-
ISBN9789383111688
-
Pages340
-
Avg Reading Time11 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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पुरुषकेन्द्रित सामाजिक वर्चस्व को सरलीकृत करना मलयालम की नारीवादी कविता का उद्देश्य नहीं है। पुरुष-केन्द्रीकरण को वह नए सन्दर्भ में प्रस्तुत करती है।...मलयालम कविता ने नारी-दृष्टि को इसी व्यापक सन्दर्भ में अनुभव किया है। एक इतिहासबद्ध दृष्टि उसका सम्बल ही नहीं है, बल्कि वह उसकी अवस्थिति है। स्त्री-कामनाओं की कविता पुरुषविरोधी कविता नहीं है, वह पुरुषाधिष्ठित एकांगी मूल्यों की विरोधी कविता है। व्यापक सन्दर्भ में वह विपक्ष की कविता है। मुक्ति की पारदर्शी स्थिति उसमें अंकित है। वह अधिकार-केन्द्रित संस्कृति पर आघात करती है। ...मलयालम कविता में आधुनिक दौर से लेकर यह मुक्तिकामी स्वर मुखर रहा है। उसमें तमाम अवरोधों को तोड़ने का आग्रह भी है।
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