Anuvad Ki Samasyaen
(0)
Author:
G. GopinathanPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Academics-and-references₹
995
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हिन्दी तथा विश्व की अन्य महत्त्वपूर्ण भाषाओं के बीच अनुवाद की भाषागत समस्याओं के बारे में यह द्विभाषी (हिन्दी अंग्रेज़ी) पुस्तक एक अन्तरराष्ट्रीय परिचर्चा के रूप में पत्राचार द्वारा संकलित की गई है। पुस्तक की परिकल्पना तथा परिचर्चा का आयोजन मुख्य रूप से कालीकट विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के प्रो. जी. गोपीनाथन ने किया तथा इसके सह-सम्पादन में वहीं के अंग्रेज़ी विभाग के प्रो. एस. कंदास्वामी ने योग दिया। पुस्तक में छत्तीस शोधपत्र हैं जिनमें अनुवाद के सिद्धान्त और व्यवहार से उत्पन्न होनेवाली समस्याओं की विस्तृत चर्चा है और हिन्दी तथा विश्व की अन्य प्रमुख भाषाओं के बीच अनुवाद-कार्य पर विशेष बल दिया गया है। भारत में अनुवाद में विभिन्न प्रकार की जिन व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना होता है, उनकी भी विस्तृत चर्चा इसमें शामिल है। हिन्दी भारत की सम्पर्क भाषा और भारत की मिली-जुली संस्कृति के सम्प्रेषण के माध्यम के रूप में तेज़ी से विकास कर रही है। हिन्दी तथा अन्य भाषाओं के बीच अनुवाद-कार्य पिछले कुछ दशकों से गतिशील हुआ है। प्रस्तुत अध्ययन अनुवाद कार्य को बढ़ावा देने और अनुवाद के क्षेत्र में विकसित अध्ययन तथा शोध के सिलसिले में सैद्धान्तिक और व्यावहारिक रूप से सहायक सिद्ध होगा। एशियाई भाषाओं में अनुवाद सम्बन्धी अध्ययन एक नया विकसित होता क्षेत्र है और प्रस्तुत अध्ययन व्यावहारिक भाषाविज्ञान तथा साहित्यिक शोध के इस क्षेत्र में एक पहलक़दमी है।
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हिन्दी तथा विश्व की अन्य महत्त्वपूर्ण भाषाओं के बीच अनुवाद की भाषागत समस्याओं के बारे में यह द्विभाषी (हिन्दी अंग्रेज़ी) पुस्तक एक अन्तरराष्ट्रीय परिचर्चा के रूप में पत्राचार द्वारा संकलित की गई है। पुस्तक की परिकल्पना तथा परिचर्चा का आयोजन मुख्य रूप से कालीकट विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के प्रो. जी. गोपीनाथन ने किया तथा इसके सह-सम्पादन में वहीं के अंग्रेज़ी विभाग के प्रो. एस. कंदास्वामी ने योग दिया। पुस्तक में छत्तीस शोधपत्र हैं जिनमें अनुवाद के सिद्धान्त और व्यवहार से उत्पन्न होनेवाली समस्याओं की विस्तृत चर्चा है और हिन्दी तथा विश्व की अन्य प्रमुख भाषाओं के बीच अनुवाद-कार्य पर विशेष बल दिया गया है। भारत में अनुवाद में विभिन्न प्रकार की जिन व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना होता है, उनकी भी विस्तृत चर्चा इसमें शामिल है। हिन्दी भारत की सम्पर्क भाषा और भारत की मिली-जुली संस्कृति के सम्प्रेषण के माध्यम के रूप में तेज़ी से विकास कर रही है। हिन्दी तथा अन्य भाषाओं के बीच अनुवाद-कार्य पिछले कुछ दशकों से गतिशील हुआ है। प्रस्तुत अध्ययन अनुवाद कार्य को बढ़ावा देने और अनुवाद के क्षेत्र में विकसित अध्ययन तथा शोध के सिलसिले में सैद्धान्तिक और व्यावहारिक रूप से सहायक सिद्ध होगा। एशियाई भाषाओं में अनुवाद सम्बन्धी अध्ययन एक नया विकसित होता क्षेत्र है और प्रस्तुत अध्ययन व्यावहारिक भाषाविज्ञान तथा साहित्यिक शोध के इस क्षेत्र में एक पहलक़दमी है।
Book Details
-
ISBN9788180315992
-
Pages333
-
Avg Reading Time11 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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भाषाविद् तथा कोशकार के रूप में ख्याति प्राप्त कर चुके बदरीनाथ कपूर ने हिन्दी की स्वाभाविक प्रकृति के अनुरूप व्याकरण की रचना करके यह प्रमाणित किया है कि हिन्दी दुनिया की अन्य विकसित भाषाओं की तुलना में अधिक व्यवस्थित होने के साथ-साथ सरल और लचीली भी है। यह एक मात्र ऐसी भाषा है जिसके अधिकतर नियम अपवादविहीन हैं।
इस पुस्तक से गुज़रते हुए सहज ही यह एहसास होता है कि व्याकरण नियमों का पुलिन्दा-भर नहीं होता, वह भाषा-भाषियों की ज्ञान-गरिमा, बुद्धि-वैभव, रचना-कौशल, सन्दर्भबोध और सर्जनक्षमता का भी परिचायक होता है।
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