Jeevanaleele
(0)
Author:
Kakasaheb Kalelkar, Sali Ramachandra RayaPublisher:
Sahitya AkademiLanguage:
KannadaCategory:
Travelogues₹
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ಶ್ರೀ ಕಾಕಾಸಾಹೇಬ ಕಾಲೇಲಕರರು ಗುಜರಾತಿ, ಮರಾಠಿ ಮತ್ತು ಹಿಂದೀ- ಹಿಂದುಸ್ತಾನಿಗಳಲ್ಲಿ ಖ್ಯಾತಿವೆತ್ತ ಲೇಖಕರು. ಅವರು ಮಹಾತ್ಮಾಗಾಂಧಿಯವರ ಸಹಚರರು ಮತ್ತು ಅತ್ಯಂತ ಪ್ರವಾಸ-ಪ್ರಿಯರು. ಅವರ ವ್ಯಕ್ತಿತ್ವವನ್ನು ಪ್ರತಿನಿಧಿಸುವ ಲಲಿತ ಪ್ರಬಂಧಗಳ ಈ ಸಂಗ್ರಹದಲ್ಲಿ ಅವರು ಭಾರತದ ಪ್ರಮುಖ ನದಿಗಳ, ಜಲಪ್ರಪಾತಗಳ ಮತ್ತು ಸಮುದ್ರತೀರಗಳ ಸುಂದರ ಶಬ್ದ-ಚಿತ್ರಗಳನ್ನು ಮೂಡಿಸಿದ್ದಾರೆ. ತಾವು ಪ್ರಕೃತಿಯಲ್ಲಿ ಕಾಣುವ ಸಂಗತಿಗಳ, ವಿಶೇಷತಃ ಜಲಾಶಯಗಳ ಸೌಂದರ್ಯವನ್ನು ಕಾಲೇಲಕರರು ಬಹು ಸೂಕ್ಷ್ಮವಾಗಿ ಚಿತ್ರಿಸಿದ್ದಾರೆ. ಭೂತಕಾಲೀನ ಸಂಸ್ಮರಣಗಳಿಂದ ಬಣ್ಣಗೊಳಿಸಿ ಪೌರಾಣಿಕ ಕಥೆಗಳಿಂದ ಮೆರುಗು ಕೊಟ್ಟು ಅವನ್ನು ಸಾಹಿತ್ತಿಕ ಉದಾಹರಣೆಗಳಿಂದ ಬೆಳಗಿಸಿದ್ದಾರೆ. ಮಹಾಭಾರತದಲ್ಲಿ ನದಿಗಳು ವಿಶ್ವದ ಮಾತೆಯರೆಂದು ಕರೆಯಲ್ಪಟ್ಟಿವೆ. ಕಾವ್ಯಾತ್ಮಕವಾದ ಗದ್ಯದಲ್ಲಿ ಅವುಗಳಿಗೆ ಲೇಖಕರು ಅರ್ಪಿಸಿದ ಶದ್ಧಾಂಜಲಿಯನ್ನು ಇಲ್ಲಿ ಕಾಣಬಹುದು. ಮೂಲತಃ ಗುಜರಾತಿಯಲ್ಲಿದ್ದ ಈ ಪುಸ್ತಕವನ್ನು ಸಾಹಿತ್ಯ ಅಕಾದೆಮಿಯು ಇತರ ಭಾರತೀಯ ಭಾಷೆಗಳಲ್ಲಿ ಅನುವಾದಕ್ಕೆ ಉತ್ಕೃಷ್ಟ ಕೃತಿಯೆಂದು ಆರಿಸಿತು. ಹಿಂದೀ, ಬಂಗಾಲಿ, ತೆಲುಗು ಮತ್ತು ಮಲಯಾಳಂ ಭಾಷೆಗಳಲ್ಲಿ ಇದು ಈಗಾಗಲೇ ಅನುವಾದಿತವಾಗಿದೆ. ನಗೀನದಾಸ ಪರೇಖ ಅವರು ಈ ಗ್ರಂಥಕ್ಕೆ ಮಹತ್ತ್ವಪೂರ್ಣವಾದ ವಿವರಣಾತ್ಮಕ ಅನುಬಂಧಗಳನ್ನು ಸಿದ್ಧಪಡಿಸಿದ್ದಾರೆ. ಶ್ರೀ ಸಾಲಿ ರಾಮಚಂದ್ರರಾಯರು ಇದನ್ನು ಕನ್ನಡಕ್ಕೆ ಪರಿವರ್ತಿಸಿದ್ದಾರೆ.
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ಶ್ರೀ ಕಾಕಾಸಾಹೇಬ ಕಾಲೇಲಕರರು ಗುಜರಾತಿ, ಮರಾಠಿ ಮತ್ತು ಹಿಂದೀ- ಹಿಂದುಸ್ತಾನಿಗಳಲ್ಲಿ ಖ್ಯಾತಿವೆತ್ತ ಲೇಖಕರು. ಅವರು ಮಹಾತ್ಮಾಗಾಂಧಿಯವರ ಸಹಚರರು ಮತ್ತು ಅತ್ಯಂತ ಪ್ರವಾಸ-ಪ್ರಿಯರು. ಅವರ ವ್ಯಕ್ತಿತ್ವವನ್ನು ಪ್ರತಿನಿಧಿಸುವ ಲಲಿತ ಪ್ರಬಂಧಗಳ ಈ ಸಂಗ್ರಹದಲ್ಲಿ ಅವರು ಭಾರತದ ಪ್ರಮುಖ ನದಿಗಳ, ಜಲಪ್ರಪಾತಗಳ ಮತ್ತು ಸಮುದ್ರತೀರಗಳ ಸುಂದರ ಶಬ್ದ-ಚಿತ್ರಗಳನ್ನು ಮೂಡಿಸಿದ್ದಾರೆ. ತಾವು ಪ್ರಕೃತಿಯಲ್ಲಿ ಕಾಣುವ ಸಂಗತಿಗಳ, ವಿಶೇಷತಃ ಜಲಾಶಯಗಳ ಸೌಂದರ್ಯವನ್ನು ಕಾಲೇಲಕರರು ಬಹು ಸೂಕ್ಷ್ಮವಾಗಿ ಚಿತ್ರಿಸಿದ್ದಾರೆ. ಭೂತಕಾಲೀನ ಸಂಸ್ಮರಣಗಳಿಂದ ಬಣ್ಣಗೊಳಿಸಿ ಪೌರಾಣಿಕ ಕಥೆಗಳಿಂದ ಮೆರುಗು ಕೊಟ್ಟು ಅವನ್ನು ಸಾಹಿತ್ತಿಕ ಉದಾಹರಣೆಗಳಿಂದ ಬೆಳಗಿಸಿದ್ದಾರೆ. ಮಹಾಭಾರತದಲ್ಲಿ ನದಿಗಳು ವಿಶ್ವದ ಮಾತೆಯರೆಂದು ಕರೆಯಲ್ಪಟ್ಟಿವೆ. ಕಾವ್ಯಾತ್ಮಕವಾದ ಗದ್ಯದಲ್ಲಿ ಅವುಗಳಿಗೆ ಲೇಖಕರು ಅರ್ಪಿಸಿದ ಶದ್ಧಾಂಜಲಿಯನ್ನು ಇಲ್ಲಿ ಕಾಣಬಹುದು.
ಮೂಲತಃ ಗುಜರಾತಿಯಲ್ಲಿದ್ದ ಈ ಪುಸ್ತಕವನ್ನು ಸಾಹಿತ್ಯ ಅಕಾದೆಮಿಯು ಇತರ ಭಾರತೀಯ ಭಾಷೆಗಳಲ್ಲಿ ಅನುವಾದಕ್ಕೆ ಉತ್ಕೃಷ್ಟ ಕೃತಿಯೆಂದು ಆರಿಸಿತು. ಹಿಂದೀ, ಬಂಗಾಲಿ, ತೆಲುಗು ಮತ್ತು ಮಲಯಾಳಂ ಭಾಷೆಗಳಲ್ಲಿ ಇದು ಈಗಾಗಲೇ ಅನುವಾದಿತವಾಗಿದೆ. ನಗೀನದಾಸ ಪರೇಖ ಅವರು ಈ ಗ್ರಂಥಕ್ಕೆ ಮಹತ್ತ್ವಪೂರ್ಣವಾದ ವಿವರಣಾತ್ಮಕ ಅನುಬಂಧಗಳನ್ನು ಸಿದ್ಧಪಡಿಸಿದ್ದಾರೆ. ಶ್ರೀ ಸಾಲಿ ರಾಮಚಂದ್ರರಾಯರು ಇದನ್ನು ಕನ್ನಡಕ್ಕೆ ಪರಿವರ್ತಿಸಿದ್ದಾರೆ.
Book Details
-
ISBN9789391494384
-
Pages488
-
Avg Reading Time16 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIN
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जीवन-पथ पर चलते हुए कितने लोग, कितनी स्थितियाँ, विविध प्रसंग, विविध रसों का रसास्वादन, भिन्न-भिन्न शहरों और निर्जन स्थलों पर अनेकानेक भावों के संवाद और स्वरों के गान सुनने को मिलते हैं। वहीं विरोधाभाषी स्पर्शों की अनुभूति भी होती है। कुछ स्पर्श ऐसे, जो कोमल और कठोर, कुछ भी हों, भुलाए नहीं भूलते। कुछ प्रसंगों को हम दूसरों को बार-बार सुनाते हैं। उसमें हर बार कुछ-न-कुछ नवीनता जुड़ती जाती है। पर मूल प्रसंग तो वही रहता है। प्रसिद्ध साहित्यकार स्व. मृदुला सिन्हाजी के दायित्व का तकाजा घुमक्कड़ी था; वे पिछले चालीस वर्षों में देश-विदेश घूमती ही रहीं। अतीव संवेदनशील होने के कारण अपनी अनुभूतियों को सँजो लेती थीं। उनकी लेखनी और कोरे कागज उनके जीवन-संगी थे ही। ट्रेन में हों या प्लेन में, प्रसंग उनके मानस से उतरकर कोरे कागज को भरते रहे। इन लेखों में व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, प्रादेशिक और समाज में स्थित राष्ट्रीय एकता की पहचान संबंधित आलेख भी आ गए। सुदूर अंडमान निकोबार में कोई घटना घटी, उसकी रिपोर्ट ‘दुनिया मेरे आगे’ में छपने के बाद कश्मीर के लोगों को भी अपने आसपास की घटना लगी। तभी तो सब ओर के पाठक उल्लसित होते रहे और इन लेखों की लोकप्रियता लेखिका के लिए समाज के गुण-दोषों, रिश्ते-नातों के विभिन्न तासीर के आकलन का एक माध्यम बन गई। इन लेखों में मनुष्य जीवन ही नहीं, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे सभी की कहानियाँ हैं। अपने आकार-प्रकार में भले ही ये आलेख बहुत बड़े नहीं हैं, फिर भी इनकी गहराई और गंभीरता से इनकार नहीं किया जा सकता। हास्य-व्यंग्य है तो सोचने के लिए विवश करनेवाले प्रसंग भी। विश्वास है कि अब एक सूत्र में गूँथकर हर मौसम में खिलनेवाले विभिन्न सुगंधों और रंगों के फूलों से बना अनुभूतियों का गुच्छा पाठकों को अवश्य आनंद देगा।
Buddh ka Kamandal Laddakh
- Author Name:
Krishna Sobti
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हिमालय हमारे देश के भूगोल और इतिहास का महानायक है। हिमालय देश की चारों दिशाओं में फैले भारतीय जनमानस का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्रोत है। शिखरों पर स्थित हमारे तीर्थों का पवित्र प्रतीक है। भारतीय मन को उद्वेलित करती कलात्मक अभिव्यक्तियाँ इसी महान उद्गम से निकली नदियों के साथ-साथ प्रवाहित होती रही हैं। भारत-भूमि से उदित हो विश्व-भर के नागरिकों को शान्ति का परम सन्देश देती रही हैं। हिमालय की ऊँचाइयों में स्थित लद्दाख़ दूसरे पर्वतीय स्थानों से एकदम अलग है। ऊपर निर्मल नीला आकाश, श्वेत फेनिल बादलों से सजा और नीचे पीले, रेतीले, मटमैले में स्लेटी ऊँचे बर्फ़ीले शिखरों को लुभाती ग्रे, काली, ताम्बई और दालचीनी रंग की चट्टानें। कुदरत के कठोर वैभव का अनूठा लैंडस्केप।
लद्दाख़ की जीती-जागती छवियों से सजी इस किताब में कृष्णा सोबती ने वहाँ बिताए अपने कुछ दिनों की यादें ताज़ा की हैं और उन अनुभूतियों को फिर से अंकित किया है जिन्हें विश्व के इसी भू-भाग से अनुभव और अर्जित किया जा सकता है। लद्दाख़ को कई नामों से जाना जाता है जिनमें एक नाम ‘बुद्ध का कमण्डल’ भी है। बुद्ध के कमण्डल, लद्दाख़ में उदय होती उषाओं, घिरती साँझों और इनके बीच फैले स्तब्धकारी सौन्दर्य के पथरीले विस्तार में टहलती, प्रसिद्ध चित्रकार सिद्दार्थ के कैमरे से लिए गए चित्रों से सजी यह किताब हमें उस जगह ले जाती है, जिसका इस धरती पर स्थित होना ही हमें चकित करता है।
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