Ghumakkad Shastra
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सभ्यताओं का विकास बगैर घुमक्कड़ों के इस तरह नहीं हुआ होता। समुद्रों, पर्वतों और विशाल मरुस्थलों से घिरे हुए भू-भाग के लोग अपने आसपास को ही पूरा संसार समझते हुए अपनी ही जगह पर एकरस जीवन जीते हुए ख़त्म हो जाते। ना दक्षिणी ध्रुव के बर्फीले क्षेत्र में रहने वाले अफ्रीका के गर्म क्षेत्रों को जान पाते, न भारत के बारे में अमेरिका और यूरोप के लोगों को पता चलता। ये उन जुनूनी घुमक्कड़ों की वजह से हुआ कि संस्कृतियों, वस्तुओं और सामाजिक विविधताओं का सारी दुनिया में एक दूसरे से परिचय, आदान-प्रदान हुआ। महाघुमक्कड़ राहुल सांकृत्यायन ने सरस और मनोरंजक शैली में लिखे इस शास्त्र में घुमक्कड़ी के सभी हिस्सों की अपने अनुभव के आधार पर विशद और तार्किक व्याख्या की है। घुमक्कड़ी के लिए घर छोड़ने की सही उम्र क्या हो, किन चीजों का ज्ञान हो, घुमक्कड़ को अपनी यात्रा में क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए जैसे सवालों के ठोस जवाब इस शाख में मिलते हैं। इसके साथ-साथ धर्म, दर्शन, कला, घुमक्कड़ जातियों और विशेषकर स्त्री घुमक्कड़ों के लिए दिशानिर्देश इसे एक मूल्यवान ग्रन्थ बनाते हैं। यह शास्त्र हर नयी पीढ़ी को मनुष्य की शाश्वत यायावरी की याद दिलाता है और घुमक्कड़ी के लिए उकसाता है।
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सभ्यताओं का विकास बगैर घुमक्कड़ों के इस तरह नहीं हुआ होता। समुद्रों, पर्वतों और विशाल मरुस्थलों से घिरे हुए भू-भाग के लोग अपने आसपास को ही पूरा संसार समझते हुए अपनी ही जगह पर एकरस जीवन जीते हुए ख़त्म हो जाते। ना दक्षिणी ध्रुव के बर्फीले क्षेत्र में रहने वाले अफ्रीका के गर्म क्षेत्रों को जान पाते, न भारत के बारे में अमेरिका और यूरोप के लोगों को पता चलता। ये उन जुनूनी घुमक्कड़ों की वजह से हुआ कि संस्कृतियों, वस्तुओं और सामाजिक विविधताओं का सारी दुनिया में एक दूसरे से परिचय, आदान-प्रदान हुआ। महाघुमक्कड़ राहुल सांकृत्यायन ने सरस और मनोरंजक शैली में लिखे इस शास्त्र में घुमक्कड़ी के सभी हिस्सों की अपने अनुभव के आधार पर विशद और तार्किक व्याख्या की है। घुमक्कड़ी के लिए घर छोड़ने की सही उम्र क्या हो, किन चीजों का ज्ञान हो, घुमक्कड़ को अपनी यात्रा में क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए जैसे सवालों के ठोस जवाब इस शाख में मिलते हैं। इसके साथ-साथ धर्म, दर्शन, कला, घुमक्कड़ जातियों और विशेषकर स्त्री घुमक्कड़ों के लिए दिशानिर्देश इसे एक मूल्यवान ग्रन्थ बनाते हैं। यह शास्त्र हर नयी पीढ़ी को मनुष्य की शाश्वत यायावरी की याद दिलाता है और घुमक्कड़ी के लिए उकसाता है।
Book Details
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ISBN9788169235433
-
Pages152
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Avg Reading Time5 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIN
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इस पुस्तक में राहुल जी के भाषा-सम्बन्धी कुछ महत्त्वपूर्ण लेखों और भाषणों को संकलित किया गया है, जिनमें उन्होंने सामान्यत: भारत की भाषा-समस्या और विशेषत: हिन्दी पर अपने विचार व्यक्त किए हैं।
कहने की ज़रूरत नहीं कि भाषा-सम्बन्धी जो सवाल पचास साल पहले हमारे सामने थे, वे कमोबेश आज भी जस के तस हैं, बल्कि कुछ ज़्यादा ही उग्र हुए हैं। मसलन अंग्रेज़ी का मसला, जिसने व्यवहार में राष्ट्रभाषा हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं को दूसरे-तीसरे दर्जे पर पहुँचा दिया है। इसके अलावा वैज्ञानिक और पारिभाषिक शब्दावली की समस्या है, जिस पर अभी भी काफ़ी काम किए जाने की ज़रूरत है। राहुल जी इन निबन्धों में इन सभी बिन्दुओं पर गहराई और अधिकार के साथ विचार करते हैं। हिन्दी को राष्ट्रभाषा के पद पर स्थापित करने की पैरवी करते हुए वे अन्य भारतीय भाषाओं को भी उनका उचित और सम्मानित स्थान दिए जाने की ज़रूरत महसूस करते हैं। उनका सुझाव है कि हरेक बालक-बालिका को अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार होना चाहिए, और सारे देश में जहाँ भी निर्धारित अल्पमत संख्या में विद्यार्थी मिलें, वहाँ उनके लिए अपनी भाषा के स्कूल खोलने चाहिए।
इसके अलावा हिन्दी की संरचना, विकास, साहित्य और इतिहास आदि अनेक पहलुओं पर राहुल जी के स्पष्ट विचार इन निबन्धों में संकलित हैं।
Rahul Vangmaya Meri Jeevan Yatra Part-1 (4 Vols)
- Author Name:
Rahul Sankrityayan
- Book Type:

- Description:
हिन्दी में आत्मकथा-साहित्य के क्षेत्र में राहुल जी की 'मेरी जीवन-यात्रा’ एक अविस्मरणीय कृति है।
राहुल जी ने अपनी जीवन-यात्रा में, जन्म से लेकर तिरसठवाँ वर्ष पूरा करने तक का वर्णन किया है। उन्होंने आत्मचरित के लिए 'जीवन-यात्रा’ शब्द का प्रयोग किया है। इस विषय में उनका कथन है, ''मैंने अपनी जीवनी न लिखकर 'जीवन-यात्रा’ लिखी है, यह क्यों? अपनी लेखनी द्वारा मैंने उस जगत की भिन्न-भिन्न गतियों और विचित्रताओं को अंकित करने की कोशिश की है, जिसका अनुमान हमारी तीसरी पीढ़ी मुश्किल से करेगी।’’
'मेरी जीवन-यात्रा’ के प्रथम भाग के कालखंड के विस्तृत वर्ण्य-विषय को लेखक ने चार उपखंडों में विभाजित किया है, और पुस्तक के अन्त में महत्त्वपूर्ण परिशिष्ट भी दिया है। जीवनी के विभाजित खंडों के अनुसार—प्रथम उपखंड : बाल्य (1893-1909), द्वितीय उपखंड: तारुण्य (1910-1914), तृतीय उपखंड : नव प्रकाश (1915-1921), चतुर्थ उपखंड : राजनीति-प्रवेश (1921-1927) है। परिशिष्ट में 1922 की डायरी से कुछ पद्य-गद्य की पंक्तियाँ तथा सांकृत्यायन-वंशवृक्ष का वर्णन है, जिसमें (क) वैदिक काल, (ख) बौद्ध काल, (ग) मध्य काल और (घ) आधुनिक काल के अनुसार ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत किया गया है।
'जीवन-यात्रा’ के इस प्रथम भाग के अनुसार राहुल जी मुख्यत: भारत में ही रहे। बस, विदेश के नाम पर उन्होंने नेपाल की यात्रा की और वहाँ के कई प्रभावशाली लोगों से मिले।
कलकत्ता की दूसरी उड़ान में उन्होंने प्रसाद जी के प्रसिद्ध ख़ानदान ‘सुँघनी साहु’ की दुकान में काम किया था। काम क्या था, किस तरह उसे करते थे, इसका विशद वर्णन उन्होंने किया है। इसके माध्यम से हमें जयशंकर प्रसाद के ख़ानदान का इतिहास भी प्राप्त हो जाता है। इसी भाग में राहुल जी पर वैराग्य का भूत सवार हो जाता है। आर्यसमाज ने राहुल जी के जीवन की दिशा ही बदल दी थी।
Manav Samaz
- Author Name:
Rahul Sankrityayan
- Book Type:

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मानव समाज से अलग नहीं रह सकता था, अलग रहने पर उसे भाषा से ही नहीं, चिन्तन से भी नाता तोड़ना पड़ता, क्योंकि चिन्तन ध्वनिरहित शब्द है। मनुष्य की हर एक गति पर समाज की छाप है। बचपन से ही समाज के विधि-निषेधों को हम माँ के दूध के साथ पीते हैं, इसलिए हम उनमें से अधिकांश को बंधन नहीं भूषण के तौर पर ग्रहण करते हैं, किन्तु वह हमारे कायिक, वाचिक कर्मों पर पग-पग पर अपनी व्यवस्था देते हैं, यह उस वक़्त मालूम हो जाता है, जब हम किसी को उनका उल्लंघन करते देख उसे असभ्य कह डालते हैं।
सीप में जैसे सीप प्राणी का विकास होता है, उसी प्रकार हर एक व्यक्ति का विकास उसके सामाजिक वातावरण में होता है। मनुष्य की शिक्षा-दीक्षा अपने परिवार, ठाठ-बाट, पाठशाला, क्रीड़ा तथा क्रिया के क्षेत्र में और समाज द्वारा विकसित भाषा को लेकर होती है।
‘मानव समाज’ हिन्दी में अपने ढंग की अकेली पुस्तक है। हिन्दी और बांग्ला पाठकों के लिए यह बहुत उपयोगी सिद्ध हुई है।
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Book
Ghumakkad Shastra is not a travel guide but a philosophical treatise that elevates wandering to a way of life. Written by Rahul Sankrityayan in 1948, this Hindi classic argues that true freedom—intellectual, spiritual, and social—comes only to those who dare to leave their hearths and walk the earth. Sankrityayan, a polyglot scholar-monk who walked across Tibet, Central Asia, and the Indian subcontinent, roots his argument in India's ancient traditions of wandering ascetics and truth-seekers. He dismisses sedentary life as a form of spiritual stagnation and celebrates the ghumakkad—the wanderer—as the highest human type.
The book is part memoir, part manifesto, part history of nomadic cultures. Sankrityayan moves from Buddha and Mahavira to medieval saints and modern explorers, showing how movement has always been the engine of human progress. His prose is direct, persuasive, and unsentimental. Ghumakkad Shastra remains a foundational text in Hindi travel literature, challenging readers to reconsider the purpose of journeying itself.
यह किताब पढ़कर मुझे कैसा अनुभव होगा?
यह किताब आपको बेचैन और प्रेरित करेगी। यह शांत यात्रा-वर्णन नहीं है, बल्कि एक दार्शनिक आह्वान है जो आपके जीवन की स्थिर दिनचर्या पर सवाल उठाता है। राहुल सांकृत्यायन का लहजा सीधा और चुनौतीपूर्ण है। किताब आपको सोचने पर मजबूर करती है कि घूमना केवल छुट्टी नहीं, बल्कि आत्मा की मुक्ति का रास्ता है।
यह किताब किस तरह के पाठक के लिए सबसे उपयुक्त है?
यह उन पाठकों के लिए है जो यात्रा को केवल मनोरंजन नहीं मानते। यदि आप दर्शन, इतिहास और समाजशास्त्र में रुचि रखते हैं, और भारतीय बौद्धिक परंपरा को समझना चाहते हैं, तो यह किताब आपके लिए है। यह उन लोगों को भी आकर्षित करेगी जो अपने जीवन में बदलाव की तलाश में हैं और परंपरागत जीवनशैली से असंतुष्ट हैं।
इस किताब का विषय आज के भारतीय पाठकों के लिए सांस्कृतिक या ऐतिहासिक रूप से क्यों महत्वपूर्ण है?
यह किताब भारत की प्राचीन घुमंतू परंपरा को पुनर्जीवित करती है—बुद्ध, महावीर, और संतों की यात्रा-संस्कृति को। आज जब शहरीकरण और भौतिकवाद ने जीवन को सीमित कर दिया है, तब यह किताब याद दिलाती है कि भारतीय सभ्यता में स्थिरता नहीं, गति ही ज्ञान का स्रोत रही है। यह आधुनिक भारतीय युवा को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम करती है।
राहुल सांकृत्यायन का यात्रा-लेखन अन्य लेखकों से कैसे अलग है?
राहुल सांकृत्यायन यात्रा को केवल वर्णन नहीं, बल्कि विचारधारा के रूप में प्रस्तुत करते हैं। वे पर्यटन और घुमक्कड़ी के बीच स्पष्ट अंतर करते हैं। उनका लेखन बौद्धिक, राजनीतिक और आध्यात्मिक प्रश्नों से भरा है। वे खुद तिब्बत और मध्य एशिया में पैदल घूमे, इसलिए उनकी बातों में अनुभव की गहराई है, केवल कल्पना नहीं।
यह किताब पढ़ने के बाद पाठक के मन में क्या रह जाता है?
- यात्रा को एक नैतिक और बौद्धिक कर्तव्य के रूप में देखने की दृष्टि
- स्थिर जीवन के प्रति असंतोष और गति की इच्छा
- भारतीय संस्कृति में घुमक्कड़ी की ऐतिहासिक भूमिका की समझ
- जीवन को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की प्रेरणा
- राहुल सांकृत्यायन के साहस और जिज्ञासा के प्रति सम्मान