Ghumakkad Shastra

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Unbound Script

Language:

Hindi

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Travelogues

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सभ्यताओं का विकास बगैर घुमक्कड़ों के इस तरह नहीं हुआ होता। समुद्रों, पर्वतों और विशाल मरुस्थलों से घिरे हुए भू-भाग के लोग अपने आसपास को ही पूरा संसार समझते हुए अपनी ही जगह पर एकरस जीवन जीते हुए ख़त्म हो जाते। ना दक्षिणी ध्रुव के बर्फीले क्षेत्र में रहने वाले अफ्रीका के गर्म क्षेत्रों को जान पाते, न भारत के बारे में अमेरिका और यूरोप के लोगों को पता चलता। ये उन जुनूनी घुमक्कड़ों की वजह से हुआ कि संस्कृतियों, वस्तुओं और सामाजिक विविधताओं का सारी दुनिया में एक दूसरे से परिचय, आदान-प्रदान हुआ। महाघुमक्कड़ राहुल सांकृत्यायन ने सरस और मनोरंजक शैली में लिखे इस शास्त्र में घुमक्कड़ी के सभी हिस्सों की अपने अनुभव के आधार पर विशद और तार्किक व्याख्या की है। घुमक्कड़ी के लिए घर छोड़ने की सही उम्र क्या हो, किन चीजों का ज्ञान हो, घुमक्कड़ को अपनी यात्रा में क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए जैसे सवालों के ठोस जवाब इस शाख में मिलते हैं। इसके साथ-साथ धर्म, दर्शन, कला, घुमक्कड़ जातियों और विशेषकर स्त्री घुमक्कड़ों के लिए दिशानिर्देश इसे एक मूल्यवान ग्रन्थ बनाते हैं। यह शास्त्र हर नयी पीढ़ी को मनुष्य की शाश्वत यायावरी की याद दिलाता है और घुमक्कड़ी के लिए उकसाता है।

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ISBN
9788169235433
Pages
152
Avg Reading Time
5 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
IN

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Piracy Free

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About the Book

सभ्यताओं का विकास बगैर घुमक्कड़ों के इस तरह नहीं हुआ होता। समुद्रों, पर्वतों और विशाल मरुस्थलों से घिरे हुए भू-भाग के लोग अपने आसपास को ही पूरा संसार समझते हुए अपनी ही जगह पर एकरस जीवन जीते हुए ख़त्म हो जाते। ना दक्षिणी ध्रुव के बर्फीले क्षेत्र में रहने वाले अफ्रीका के गर्म क्षेत्रों को जान पाते, न भारत के बारे में अमेरिका और यूरोप के लोगों को पता चलता। ये उन जुनूनी घुमक्कड़ों की वजह से हुआ कि संस्कृतियों, वस्तुओं और सामाजिक विविधताओं का सारी दुनिया में एक दूसरे से परिचय, आदान-प्रदान हुआ। महाघुमक्कड़ राहुल सांकृत्यायन ने सरस और मनोरंजक शैली में लिखे इस शास्त्र में घुमक्कड़ी के सभी हिस्सों की अपने अनुभव के आधार पर विशद और तार्किक व्याख्या की है। घुमक्कड़ी के लिए घर छोड़ने की सही उम्र क्या हो, किन चीजों का ज्ञान हो, घुमक्कड़ को अपनी यात्रा में क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए जैसे सवालों के ठोस जवाब इस शाख में मिलते हैं। इसके साथ-साथ धर्म, दर्शन, कला, घुमक्कड़ जातियों और विशेषकर स्त्री घुमक्कड़ों के लिए दिशानिर्देश इसे एक मूल्यवान ग्रन्थ बनाते हैं। यह शास्त्र हर नयी पीढ़ी को मनुष्य की शाश्वत यायावरी की याद दिलाता है और घुमक्कड़ी के लिए उकसाता है।

Book Details

  • ISBN
    9788169235433
  • Pages
    152
  • Avg Reading Time
    5 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    IN

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Ghumakkad Shastra is not a travel guide but a philosophical treatise that elevates wandering to a way of life. Written by Rahul Sankrityayan in 1948, this Hindi classic argues that true freedom—intellectual, spiritual, and social—comes only to those who dare to leave their hearths and walk the earth. Sankrityayan, a polyglot scholar-monk who walked across Tibet, Central Asia, and the Indian subcontinent, roots his argument in India's ancient traditions of wandering ascetics and truth-seekers. He dismisses sedentary life as a form of spiritual stagnation and celebrates the ghumakkad—the wanderer—as the highest human type.

The book is part memoir, part manifesto, part history of nomadic cultures. Sankrityayan moves from Buddha and Mahavira to medieval saints and modern explorers, showing how movement has always been the engine of human progress. His prose is direct, persuasive, and unsentimental. Ghumakkad Shastra remains a foundational text in Hindi travel literature, challenging readers to reconsider the purpose of journeying itself.

यह किताब पढ़कर मुझे कैसा अनुभव होगा?

यह किताब आपको बेचैन और प्रेरित करेगी। यह शांत यात्रा-वर्णन नहीं है, बल्कि एक दार्शनिक आह्वान है जो आपके जीवन की स्थिर दिनचर्या पर सवाल उठाता है। राहुल सांकृत्यायन का लहजा सीधा और चुनौतीपूर्ण है। किताब आपको सोचने पर मजबूर करती है कि घूमना केवल छुट्टी नहीं, बल्कि आत्मा की मुक्ति का रास्ता है।

यह किताब किस तरह के पाठक के लिए सबसे उपयुक्त है?

यह उन पाठकों के लिए है जो यात्रा को केवल मनोरंजन नहीं मानते। यदि आप दर्शन, इतिहास और समाजशास्त्र में रुचि रखते हैं, और भारतीय बौद्धिक परंपरा को समझना चाहते हैं, तो यह किताब आपके लिए है। यह उन लोगों को भी आकर्षित करेगी जो अपने जीवन में बदलाव की तलाश में हैं और परंपरागत जीवनशैली से असंतुष्ट हैं।

इस किताब का विषय आज के भारतीय पाठकों के लिए सांस्कृतिक या ऐतिहासिक रूप से क्यों महत्वपूर्ण है?

यह किताब भारत की प्राचीन घुमंतू परंपरा को पुनर्जीवित करती है—बुद्ध, महावीर, और संतों की यात्रा-संस्कृति को। आज जब शहरीकरण और भौतिकवाद ने जीवन को सीमित कर दिया है, तब यह किताब याद दिलाती है कि भारतीय सभ्यता में स्थिरता नहीं, गति ही ज्ञान का स्रोत रही है। यह आधुनिक भारतीय युवा को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम करती है।

राहुल सांकृत्यायन का यात्रा-लेखन अन्य लेखकों से कैसे अलग है?

राहुल सांकृत्यायन यात्रा को केवल वर्णन नहीं, बल्कि विचारधारा के रूप में प्रस्तुत करते हैं। वे पर्यटन और घुमक्कड़ी के बीच स्पष्ट अंतर करते हैं। उनका लेखन बौद्धिक, राजनीतिक और आध्यात्मिक प्रश्नों से भरा है। वे खुद तिब्बत और मध्य एशिया में पैदल घूमे, इसलिए उनकी बातों में अनुभव की गहराई है, केवल कल्पना नहीं।

यह किताब पढ़ने के बाद पाठक के मन में क्या रह जाता है?

  • यात्रा को एक नैतिक और बौद्धिक कर्तव्य के रूप में देखने की दृष्टि
  • स्थिर जीवन के प्रति असंतोष और गति की इच्छा
  • भारतीय संस्कृति में घुमक्कड़ी की ऐतिहासिक भूमिका की समझ
  • जीवन को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की प्रेरणा
  • राहुल सांकृत्यायन के साहस और जिज्ञासा के प्रति सम्मान

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