Jaati Janaganana
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Author:
Dr. Laxman YadavPublisher:
Unbound ScriptLanguage:
HindiCategory:
Society-social-sciences₹
249
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जाति जनगणना का सवाल सिर्फ़ आँकड़ों का सवाल नहीं है। यह सत्ता, संसाधन, प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय का सवाल है। यह किताब इसी सवाल को इतिहास की गहराई, राजनीति की जटिलता और समाज की संरचना के साथ जोड़कर देखती है। डॉ. लक्ष्मण यादव की यह पुस्तक जाति जनगणना को किसी ख़ास दौर तक सीमित नहीं करती, बल्कि उसे मानव सभ्यता की शुरुआती गिनतियों से लेकर आज़ाद भारत की राजनीतिक बहसों तक फैले लंबे सामाजिक-सांस्कृतिक प्रवाह में रखती है। किताब का बड़ा हिस्सा आधुनिक भारत में जाति जनगणना के इर्द-गिर्द खड़े आंदोलनों और विचारधाराओं पर केंद्रित है। फुले-शाहू-आंबेडकर, अय्यंकाली, नारायण गुरु, त्रिवेणी संघ, अर्जक संघ, समाजवादी आंदोलन, पिछड़ा वर्ग आयोगों, मंडल आयोग और मंडल आंदोलन से होते हुए कांशीराम के बहुजन विचार तक। यह किताब दिखाती है कि जाति जनगणना कैसे ‘जात से जमात बनाने’ का बुनियादी ज़रिया है। जाति जनगणना ने बहुजन गोलबंदी, राजनीतिक चेतना और सामाजिक परिवर्तन का औज़ार बनी। शैली के स्तर पर यह किताब आम पाठकों के लिए लिखी गई है, मगर इसके भीतर मौजूद सवाल पूरी तरह अकादमिक हैं। ये किताब उन तमाम सवालों का जवाब देती है, जिनको लेकर या तो भ्रम की स्थितियाँ हैं या अज्ञानता की। इस किताब सबसे बड़ी खासियत है— जटिल सामाजिक और ऐतिहासिक विमर्श को सरल, प्रवाहपूर्ण और संवादात्मक भाषा में प्रस्तुत करना। जाति जनगणना दरअसल जाति की राजनीति, सामाजिक न्याय के वैचारिक संघर्ष और भारतीय लोकतंत्र की अधूरी परियोजना पर एक गंभीर, मगर पठनीय हस्तक्षेप है।
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जाति जनगणना का सवाल सिर्फ़ आँकड़ों का सवाल नहीं है। यह सत्ता, संसाधन, प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय का सवाल है। यह किताब इसी सवाल को इतिहास की गहराई, राजनीति की जटिलता और समाज की संरचना के साथ जोड़कर देखती है। डॉ. लक्ष्मण यादव की यह पुस्तक जाति जनगणना को किसी ख़ास दौर तक सीमित नहीं करती, बल्कि उसे मानव सभ्यता की शुरुआती गिनतियों से लेकर आज़ाद भारत की राजनीतिक बहसों तक फैले लंबे सामाजिक-सांस्कृतिक प्रवाह में रखती है। किताब का बड़ा हिस्सा आधुनिक भारत में जाति जनगणना के इर्द-गिर्द खड़े आंदोलनों और विचारधाराओं पर केंद्रित है। फुले-शाहू-आंबेडकर, अय्यंकाली, नारायण गुरु, त्रिवेणी संघ, अर्जक संघ, समाजवादी आंदोलन, पिछड़ा वर्ग आयोगों, मंडल आयोग और मंडल आंदोलन से होते हुए कांशीराम के बहुजन विचार तक। यह किताब दिखाती है कि जाति जनगणना कैसे ‘जात से जमात बनाने’ का बुनियादी ज़रिया है। जाति जनगणना ने बहुजन गोलबंदी, राजनीतिक चेतना और सामाजिक परिवर्तन का औज़ार बनी। शैली के स्तर पर यह किताब आम पाठकों के लिए लिखी गई है, मगर इसके भीतर मौजूद सवाल पूरी तरह अकादमिक हैं। ये किताब उन तमाम सवालों का जवाब देती है, जिनको लेकर या तो भ्रम की स्थितियाँ हैं या अज्ञानता की। इस किताब सबसे बड़ी खासियत है— जटिल सामाजिक और ऐतिहासिक विमर्श को सरल, प्रवाहपूर्ण और संवादात्मक भाषा में प्रस्तुत करना। जाति जनगणना दरअसल जाति की राजनीति, सामाजिक न्याय के वैचारिक संघर्ष और भारतीय लोकतंत्र की अधूरी परियोजना पर एक गंभीर, मगर पठनीय हस्तक्षेप है।
Book Details
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ISBN9789347125287
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Pages170
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Avg Reading Time6 hrs
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Age11-18 yrs
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Country of OriginIndia
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'अंधविश्वास उन्मूलन : आचार' पुस्तक में धर्म के नाम पर कर्मकांड और पाखंडों के ख़िलाफ़ आन्दोलन, जन-जागृति कार्यक्रम और भंडाफोड़ जैसे प्रयासों का ब्योरा है।
पुस्तक में भूत से साक्षात्कार कराने का पर्दाफाश, ओझाओं की पोल खोलती घटनाएँ, मंदिर में जाग्रत देवता और गणेश देवता के दूध पीने के चमत्कार के विवरण पठनीय तो हैं ही, उनसे देखने, सोचने और समझने की पुख्ता ज़मीन भी उजागर होती है। निस्सन्देह अपने विषयों के नवीन विश्लेषण से यह पुस्तक पाठकों में अहम भूमिका निभाने जैसी है।
अंधविश्वास के तिमिर से विवेक और विज्ञान के तेज की ओर ले जानेवाली यह पुस्तक परम्परा का तिमिर-भेद भी है और विज्ञान का लक्ष्य भी।
Parampara, Itihas Bodh Aur Sanskriti
- Author Name:
Shyamacharan Dube
- Book Type:

- Description: समसामयिक संवाद में परम्परा एक केन्द्रीय बिन्दु बन गई है। संस्कृति की पुनर्रचना, राजनीतिकरण और सैनिकीकरण व्यवस्था के लिए गम्भीर प्रश्न और भविष्य के लिए चुनौती बनते जा रहे हैं। इतिहास-बोध का मिथकीकरण अनेक वैचारिक विकृतियाँ उत्पन्न कर रहा है। साहित्य और संचार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से परम्परा, संस्कृति और इतिहास-बोध से जुड़े हैं। इस पुस्तक में संकलित भाषण और लेख इन समस्याओं पर समाजशास्त्रीय दृष्टि से विचार करते हैं।
Pani Ka Shap : Bihar Mein Badh-Sukhad
- Author Name:
Dinesh Kumar Mishra
- Book Type:

- Description: जो प्रायः हर साल बाढ़ या सूखे के कारण और कभी-कभी दोनों कारणों से चर्चा में बना रहता है। उत्तर बिहार में जहाँ सहायक धाराओं समेत नदियों की संख्या बहुत अधिक है, बाढ़ का क्षेत्र बना रहता है। ऐसा भी होता है कि नेपाल के क्षेत्र में अच्छी-खासी वर्षा हो जाने पर बिहार में बाढ़ आ जाती है और ऐसे समय में अगर स्थानीय वर्षा यहाँ न हो तो जहाँ-जहाँ नदी का पानी पहुँच जाता है वहाँ तो बाढ़ रहती है पर उसके ठीक बगल में आधे-पौने किलोमीटर के फासले पर सूखे का ही साम्राज्य बना रहता है। राज्य में गंगा के दक्षिण वाला इलाका, अगर आसमान से पानी न बरसे तो वर्षाभाव से त्रस्त रहता है। सिंचाई के क्षेत्र में आजादी के बाद बहुत प्रगति हुई है पर मौसम की अनिश्चितता अभी भी इन प्रयासों पर भारी पड़ती है। समय से अगर खेतों में बीज पड़ जाएँ, धान की रोपनी हो जाए, कुछ-कुछ भी पानी बरसता रहे और हथिया नक्षत्र की वर्षा समय से हो जाए तो किसान गंगा नहाएँ। 5 जनवरी, 1950 को पटना में पूना की सेंट्रल वाटरवेज, इरिगेशन एंड नेविगेशन कमीशन के एक्सीक्यूटिव इंजीनियर का बयान प्रमुखता से बिहार के अखबारों में छपा था जिसमें कहा गया था कि नेपाल में बराहक्षेत्र में कुतुबमीनार से तीन गुना ऊँचा बाँध बनेगा। उसके निर्माण से बिहार की बाढ़ और सिंचाई की समस्या का समाधान हो जाएगा। न यह बाँध बना और न समस्या का समाधान हुआ। यह अगर बन भी जाए तो इससे हमारी कितनी जरूरतें पूरी होंगी, यह विचारणीय विषय है। इतना जरूर हुआ कि विपत्ति के समय राहत-सामग्री मिलने लगी पर वह तो समाधान नहीं है। राहत सामग्री कितने दिन तक चल पाती है, यह तो हम सब जानते हैं। एक बदलाव जरूर स्पष्ट दिखाई पड़ता है कि हमारे श्रमिक जो पहले बंगाल या असम की तरफ जाते थे वे अब देश के पश्चिम और दक्षिण के राज्यों की तरफ जाने लगे हैं। रेलगाड़ियों के नाम श्रमजीवी एक्सप्रेस, गरीब रथ, श्रमशक्ति एक्सप्रेस आदि रखकर हमने अपनी स्थिति देश के सामने स्पष्ट कर दी है। विकल्प के रूप में हमने राज्य की नदियों के किनारे तटबन्ध बनाए जिनकी लम्बाई 1950 के दशक में 160 कि.मी. थी और अब लगभग 3800 कि.मी. है। परिणाम हुआ कि तब राज्य का बाढ़ प्रवण क्षेत्र 25 लाख हेक्टेयर था, अब लगभग 74 लाख हेक्टेयर है। परिणाम की दृष्टि से यह एक चिन्ता का विषय होना चाहिए था पर इस पर कोई बहस नहीं होती। इस प्रयास का मूल्यांकन आवश्यक है और इसके विकल्पों की तलाश होनी चाहिए।
Aadhunik Bharat Mein Samajik Parivartan
- Author Name:
M.N. Shrinivas
- Book Type:

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Description:
भारत के प्रमुख समाज एवं नृ-विज्ञानवेत्ता एम.एन. श्रीनिवास की यह महत्त्वपूर्ण कृति विश्व-कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर-स्मृति-भाषणमाला के सारभूत तत्त्वों पर आधारित है। आधुनिक भारतीयता के सन्दर्भ में रवीन्द्रनाथ ठाकुर की विचारक के रूप में एक अलग महत्ता है। अपनी अमरीकी और यूरोपीय यात्राओं के दौरान विश्वकवि ने जो विचार प्रकट किए हैं, वे इस बात का प्रमाण हैं कि भारतीय सामाजिक परिवर्तनों में पाश्चात्य प्रभावों के प्रति उनकी गहरी रुचि थी।
स्वाधीनता-प्राप्ति के बाद भारतीय समाज में पश्चिमीकरण की प्रक्रिया और भी तेज़ हुई है, जिसके व्यापक प्रभावों को सांस्कृतिक जीवन पर स्पष्ट देखा जा सकता है। लेखक ने इन प्रभावों को संस्कृतीकरण और पश्चिमीकरण के सन्दर्भ में व्याख्यायित किया है तथा एक अखिल भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता बताई है। उसके अनुसार पश्चिमीकरण भारतीय समाज के किसी विशेष अंश तक सीमित नहीं है और उसका महत्त्व—उससे प्रभावित होनेवालों की संख्या और प्रभावित होने के प्रकार, दोनों ही दृष्टियों से—लगातार बढ़ रहा है। वस्तुत: आधुनिक भारतीय समाज के अन्तर्विकास और उसके अन्तर्विरोधों को समझने के लिए यह एक मूल्यवान पुस्तक है।
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