Bahadur Shah Zafar Aur Phool Walon Ki Sair
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Author:
Mirza Farhatullah BegPublisher:
Rekhta PublicationsLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
199
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फूल वालों की सैर दिल्ली वालों के बीच हमेशा से लोकप्रिय रही है। अकबर शाह सानी के ज़माने में शुरू हुई ये सैर सांस्कृतिक एकता का परिचायक है। इस किताब में बहादुरशाह ज़फ़र के ज़माने की फूल वालों की सैर का नक़्शा खींचा गया है। इस के लेखक मिर्ज़ा फ़रहतउल्लाह बेग हैं, मूल रूप से उर्दू की इस किताब का हिंदी लिप्यंतरण ज़ुबैर सैफ़ी ने किया है। मिर्ज़ा फ़रहतउल्लाह बेग उर्दू के जाने-माने व्यंग्यकार थे। उनक जन्म सन् 1883 में दिल्ली में हुआ था। उनके पिता का नाम हशमत बेग था। उन्होंने शुरुआती शिक्षा-दीक्षा गर्वनमेंट हाई स्कूल दिल्ली में हासिल की। बी. ए. की डिग्री हासिल करने के बाद वे हैदराबाद में नौकरी करने लगे। वहाँ पर वे न्यायपालिका में अलग-अलग पदों पर रहे। अंत में होम सेक्रेटरी होकर सेवानिवृत्त हुए और पेंशन पाई। हैदराबाद के साहित्यिक माहौल ने मिर्ज़ा की साहित्यिक दृष्टि को ख़ूब निखारा और वो उच्च स्तर के व्यंग्यकार बने। फ़रहतउल्लाह बेग का सबसे पहला व्यंग्य आलेख 'इस्मत बेग' के छद्म नाम से रिसाले 'इफ़ादा' में छपा। उस आलेख का शीर्षक 'हम और हमारा इम्तिहान' था। 27 अप्रैल सन् 1947 को उनकी मृत्यु हो गई। 1993 में गुलावठी (बुलंदशहर) में जन्मे ज़ुबैर सैफ़ी नई पीढ़ी के कवि और गंभीर अध्येता हैं। उनकी कविताएँ सदानीरा, हिंदवी और अन्य पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। वर्तमान में वे रेख़्ता फ़ाउंडेशन के उपक्रम सूफ़ीनामा से सम्बद्ध हैं।
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फूल वालों की सैर दिल्ली वालों के बीच हमेशा से लोकप्रिय रही है। अकबर शाह सानी के ज़माने में शुरू हुई ये सैर सांस्कृतिक एकता का परिचायक है। इस किताब में बहादुरशाह ज़फ़र के ज़माने की फूल वालों की सैर का नक़्शा खींचा गया है। इस के लेखक मिर्ज़ा फ़रहतउल्लाह बेग हैं, मूल रूप से उर्दू की इस किताब का हिंदी लिप्यंतरण ज़ुबैर सैफ़ी ने किया है। मिर्ज़ा फ़रहतउल्लाह बेग उर्दू के जाने-माने व्यंग्यकार थे। उनक जन्म सन् 1883 में दिल्ली में हुआ था। उनके पिता का नाम हशमत बेग था। उन्होंने शुरुआती शिक्षा-दीक्षा गर्वनमेंट हाई स्कूल दिल्ली में हासिल की। बी. ए. की डिग्री हासिल करने के बाद वे हैदराबाद में नौकरी करने लगे। वहाँ पर वे न्यायपालिका में अलग-अलग पदों पर रहे। अंत में होम सेक्रेटरी होकर सेवानिवृत्त हुए और पेंशन पाई। हैदराबाद के साहित्यिक माहौल ने मिर्ज़ा की साहित्यिक दृष्टि को ख़ूब निखारा और वो उच्च स्तर के व्यंग्यकार बने। फ़रहतउल्लाह बेग का सबसे पहला व्यंग्य आलेख 'इस्मत बेग' के छद्म नाम से रिसाले 'इफ़ादा' में छपा। उस आलेख का शीर्षक 'हम और हमारा इम्तिहान' था। 27 अप्रैल सन् 1947 को उनकी मृत्यु हो गई। 1993 में गुलावठी (बुलंदशहर) में जन्मे ज़ुबैर सैफ़ी नई पीढ़ी के कवि और गंभीर अध्येता हैं। उनकी कविताएँ सदानीरा, हिंदवी और अन्य पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। वर्तमान में वे रेख़्ता फ़ाउंडेशन के उपक्रम सूफ़ीनामा से सम्बद्ध हैं।
Book Details
-
ISBN9789394494961
-
Pages71
-
Avg Reading Time2 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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