Khwabon Ki Dahliz Par
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Malika Naseem’s poetry carries both sorrow and hope. Perhaps this is why she does not seem to cry out in anguish over her griefs; instead, she expresses those sorrows and sufferings in a very simple yet profound way. In addition, her poems encompass issues ranging from cities to villages and also reflect on the psychology of human life. The book “Khvaabon Ki Dehleez Par: Malika Naseem” is such a collection, which includes not only ghazals but also a large number of her Nazms. These Poetries touch the heart directly and compel the reader to think deeply. Malika Naseem was born on January 1, 1954, in Allahabad, Uttar Pradesh. Among the women poets who emerged in the 1980s, Malika Naseem’s name stands out prominently. Several of her poetry collections have been published, including “Dopehar ka Safar”, “Aaj ka Mausam”, “Seep mein Samundar”, and “Sheher Kaaghaz ka”
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Malika Naseem’s poetry carries both sorrow and hope. Perhaps this is why she does not seem to cry out in anguish over her griefs; instead, she expresses those sorrows and sufferings in a very simple yet profound way. In addition, her poems encompass issues ranging from cities to villages and also reflect on the psychology of human life. The book “Khvaabon Ki Dehleez Par: Malika Naseem” is such a collection, which includes not only ghazals but also a large number of her Nazms. These Poetries touch the heart directly and compel the reader to think deeply. Malika Naseem was born on January 1, 1954, in Allahabad, Uttar Pradesh. Among the women poets who emerged in the 1980s, Malika Naseem’s name stands out prominently. Several of her poetry collections have been published, including “Dopehar ka Safar”, “Aaj ka Mausam”, “Seep mein Samundar”, and “Sheher Kaaghaz ka”
Book Details
-
ISBN9788198986658
-
Pages161
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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भगवान शिव के क्रोध का लक्ष्य होकर काम भस्म हो जाता है। सम्पूर्ण देव-जगत और ब्रह्मा ने उसे भेजा था ताकि वह तपस्या-रत शिव को पार्वती के सौंदर्य की ओर प्रवृत्त कर सके और दोनों के मिलन से उत्पन्न संतान देवगण का नेतृत्व कर उपद्रवी तारकासुर को समाप्त कर सके। वसंत काम के साथ इसी कार्य की सिद्धि के लिए कैलास गया था।यह एक लम्बी कथा है जिसका केवल एक अंश— कैलास पर वसंत के अकस्मात आविर्भाव से लेकर काम के भस्म होने और तद्नंतर रति के विलाप की प्रतिक्रिया में मनुष्य मात्र को आश्वस्त करने वाली आकाशवाणी तक—यही ‘भस्मांकुर’ की विषयवस्तु है। इतनी-सी कथा को इस काव्य के केंद्र में रखकर नागार्जुन ने अपनी लोकदृष्टि,गहन सामाजिक सम्पृक्ति और उदात्त आशाबोध के साथ बड़े और व्यापक अर्थों में पाठक तक पहुँचाया है। काम के पुनरुद्भव,उसके भस्म से अंकुरित होने को उन्होंने मानव-जीवन के सातत्य से जोड़ा है। यह काम ही है जो सृष्टि का,जिजीविषा का और कामना का मूल है। बरवै छंद में एक हजार पंक्तियों में अनुस्यूत यह रचना नागार्जुन की उत्कृष्ट कृतियों में गिनी जाती है।
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