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इस समय भारत में और विशेषत: हिन्दी अंचल में परम्परा के अज्ञान और उसकी दुर्व्याख्या भयावह रूप से फैल रही है। इसके बावजूद हमारे पास ऐसे सजग, ज्ञानसम्पन्न चिन्तक हैं जिनकी परम्परा में पैठ हमें अपनी आधुनिकता को नए आलोक में देखने-समझने की उत्तेजना देती रही है। इनमें से एक है नवज्योति सिंह जिनसे एक लम्बी बातचीत यहाँ पुस्तकाकार प्रकाशित की जा रही है। वे नया प्रश्न उठाते हैं, नई जिज्ञासा उकसाते हैं और विचार की नई राहें खोजने की ओर बढ़ते हैं। हिन्दी वैचारिकी की जो शिथिल स्थिति है, उसके सन्दर्भ में यह पुस्तक एक विनम्र इज़ाफ़े की तरह है। उम्मीद है कि यह विचार-विचरण पाठक पसन्द करेंगे।</p> <p>—अशोक वाजपेयी।
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इस समय भारत में और विशेषत: हिन्दी अंचल में परम्परा के अज्ञान और उसकी दुर्व्याख्या भयावह रूप से फैल रही है। इसके बावजूद हमारे पास ऐसे सजग, ज्ञानसम्पन्न चिन्तक हैं जिनकी परम्परा में पैठ हमें अपनी आधुनिकता को नए आलोक में देखने-समझने की उत्तेजना देती रही है। इनमें से एक है नवज्योति सिंह जिनसे एक लम्बी बातचीत यहाँ पुस्तकाकार प्रकाशित की जा रही है। वे नया प्रश्न उठाते हैं, नई जिज्ञासा उकसाते हैं और विचार की नई राहें खोजने की ओर बढ़ते हैं। हिन्दी वैचारिकी की जो शिथिल स्थिति है, उसके सन्दर्भ में यह पुस्तक एक विनम्र इज़ाफ़े की तरह है। उम्मीद है कि यह विचार-विचरण पाठक पसन्द करेंगे।</p>
<p>—अशोक वाजपेयी।
Book Details
-
ISBN9789387462106
-
Pages84
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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