Vah Jo Yatharth Tha
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‘वह जो यथार्थ था’ सृजनात्मकता का ऐसा प्राकृतिक प्रस्फुटन है जो लेखकीय अनुभव के विधागत विभाजनों से परे पहुँच जाने पर घटित होता है, और न सिर्फ़ पाठक के साहित्यिक अभ्यास को बल्कि लेखक की अपनी इयत्ता को भी बदल देता है। ऐसी रचना-यात्रा का परिणाम सिर्फ़ एक नई पुस्तक नहीं, एक नई विधा, एक नए लेखक और एक नए हम के रूप में प्रकट होता है। ‘वह जो यथार्थ था’ के प्रकाशन के समय लगभग ऐसी ही प्रतिक्रिया पाठकों की ओर से आई थी, फिर अन्य कई लेखकों ने भी अपने अब तक विधा-च्युत पड़े अनुभवों को अंकित करने के लिए लेखनी उठाई, और कई अच्छी रचनाओं का इज़ाफ़ा हिन्दी में हुआ।</p> <p>कहानीकार, उपन्यासकार और सम्पादक के रूप में अपने सरोकारों, दृष्टिकोण, भाषा और पठनीयता के लिए सर्व-स्वीकृत अखिलेश ने इस पुस्तक में अपने बचपन के क़स्बे के ज़रिए वास्तविकता, रहस्य, स्मृति, विचार और कल्पना का ऐसा जादू उपस्थित किया है कि सब कुछ एक नए अर्थ में आलोकित हो उठता है।</p> <p>अपनी इस कथित ग़ैर-कथात्मक रचना के आधारभूत रसायन में उन्होंने विभिन्न तत्त्वों का प्रयोग इस बारीकी से किया है कि यह कृति उपन्यास, कहानी, संस्मरण, आत्मकथा और यहाँ तक कि सामाजिक अध्ययन और आलोचना भी एक साथ हो जाती है। लगभग तीन दशक पहले का वह क़स्बा जो लेखक के जीवन का हिस्सा था, उसकी स्मृति का हिस्सा होकर एक दूसरा क़स्बा हो जाता है और रचना में उतरते वक़्त वृहत्तर भारतीय समाज में हो रहे आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक बदलावों का आईना बन जाता है।</p> <p>यह कहना ग़लत नहीं होगा कि ऐसी रचनाएँ किसी भाषा में कभी-कभार ही सम्भव हो पाती हैं।
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‘वह जो यथार्थ था’ सृजनात्मकता का ऐसा प्राकृतिक प्रस्फुटन है जो लेखकीय अनुभव के विधागत विभाजनों से परे पहुँच जाने पर घटित होता है, और न सिर्फ़ पाठक के साहित्यिक अभ्यास को बल्कि लेखक की अपनी इयत्ता को भी बदल देता है। ऐसी रचना-यात्रा का परिणाम सिर्फ़ एक नई पुस्तक नहीं, एक नई विधा, एक नए लेखक और एक नए हम के रूप में प्रकट होता है। ‘वह जो यथार्थ था’ के प्रकाशन के समय लगभग ऐसी ही प्रतिक्रिया पाठकों की ओर से आई थी, फिर अन्य कई लेखकों ने भी अपने अब तक विधा-च्युत पड़े अनुभवों को अंकित करने के लिए लेखनी उठाई, और कई अच्छी रचनाओं का इज़ाफ़ा हिन्दी में हुआ।</p>
<p>कहानीकार, उपन्यासकार और सम्पादक के रूप में अपने सरोकारों, दृष्टिकोण, भाषा और पठनीयता के लिए सर्व-स्वीकृत अखिलेश ने इस पुस्तक में अपने बचपन के क़स्बे के ज़रिए वास्तविकता, रहस्य, स्मृति, विचार और कल्पना का ऐसा जादू उपस्थित किया है कि सब कुछ एक नए अर्थ में आलोकित हो उठता है।</p>
<p>अपनी इस कथित ग़ैर-कथात्मक रचना के आधारभूत रसायन में उन्होंने विभिन्न तत्त्वों का प्रयोग इस बारीकी से किया है कि यह कृति उपन्यास, कहानी, संस्मरण, आत्मकथा और यहाँ तक कि सामाजिक अध्ययन और आलोचना भी एक साथ हो जाती है। लगभग तीन दशक पहले का वह क़स्बा जो लेखक के जीवन का हिस्सा था, उसकी स्मृति का हिस्सा होकर एक दूसरा क़स्बा हो जाता है और रचना में उतरते वक़्त वृहत्तर भारतीय समाज में हो रहे आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक बदलावों का आईना बन जाता है।</p>
<p>यह कहना ग़लत नहीं होगा कि ऐसी रचनाएँ किसी भाषा में कभी-कभार ही सम्भव हो पाती हैं।
Book Details
-
ISBN9788183611237
-
Pages127
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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अनेक दूसरे लोगों की तरह मैं भी विदेशी साम्राज्यवाद के जुए से मातृभूमि को आजाद कराने के लिए क्रांतिकारी आंदोलन से करीब से जुड़ा था। गांधीजी जब सन् 1915 के शुरू में दक्षिण अफ्रीका से आए तो उनके निकट संपर्क में आने वाला मैं पहला राजनीतिक कार्यकर्ता था। मैं उनके पहले सत्याग्रह आंदोलन के साथ भी करीब से जुड़ा था, जो चंपारण (बिहार) में गोरे निलहों के अत्याचार के खलाफ हुआ। हमारी आजादी की लड़ाई के सबसे महत्वपूर्ण और बेचैनी वाले दौर में मैं कांग्रेस का बारह वर्ष तक महामंत्री रहा। जिस साल देश को आजादी मिली, उस वक़्त मैं कांग्रेस अध्यक्ष था। मेरे दोस्तों को लगता है कि हमारे राष्ट्रीय आंदोलन की महत्वपूर्ण घटनाओं और व्यक्तियों के बारे में मेरी जानकारी काफी अंतरंग और नई चीजें सामने लाने वाली होगी। इस कारण मेरे संस्मरणों का कुछ ऐतिहासिक महत्व होगा। इसलिए मैंने जो कुछ लिखा है, उसमें अपने बारे में कम लिखकर हमारी आजादी की लड़ाई पर ज्यादा लिखा है। इस पुस्तक को मैंने ‘माई टाइम्स : मेरा दौर’ नाम दिया है, पर इसमें ‘मैं’ का जिक्र उतना ही भर है, जितना जरूरी है। मेरे जीवन की कथा में भी कांग्रेस और स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का बड़ा हिस्सा समाया हुआ है। इसलिए यह कोई आत्मकथा न होकर, इन बड़ी और महत्वपूर्ण घटनाओं का रिकॉर्ड भी है और इनका वर्णन करते हुए मैंने यह जिक्र कम किया है कि मैंने क्या-क्या किया, बल्कि यह बताने की कोशिश की है कि मैंने तब क्या देखा और समझा।
Mera Daur "मेरा दौर: एक आत्मकथा" Book in Hindi- J.B. Kriplani
J.B. Kriplani
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हिदी के कालजयी रचनाकार मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ जनसाधारण की समस्याओं, आकांक्षाओं, उलझनों, पारिवारिक विघटन, दहेज-प्रथा, बाल विवाह, राष्ट्रद्रोह, घूसखोरी, अंधविश्वास, ग्रामीण शोषण, आर्थिक वैषम्य इत्यादि विषयों को समेटे हुए अपने पाठकों से एक आत्मीय एवं भावनात्मक नाता जोड़ती हैं। उनकी कहानियों में समस्याओं की जितनी चर्चा है, समाधान की उससे ज्यादा। उनके पात्र अर्थगत दबावों से बेशक पीडि़त हैं, पर वे बाहरी संघर्षों द्वारा समस्याओं पर विजय प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। उन्होंने अपनी कथाओं में नग्न यथार्थ नहीं, वरन् यथार्थ का भरसक चित्रण किया है, क्योंकि नग्न यथार्थ वितृष्णा उपजाता है। पात्र कभी सुख की अनुभूति करते हैं तो कभी दुःख की। इसी को रचनाओं के साथ साहित्यिक न्याय कहा जाता है, जिस पर मुंशी प्रेमचंद खरे उतरे हैं। ‘21 अनमोल कहानियाँ’ उनके ऐसे ही नगीने हैं, जो आज भी प्रासंगिक हैं और समाज की विद्रूपताओं पर गहरी चोट करते हैं।
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