Srijnatmak Aur Shantimay Jeevan Ke Liye Shiksha
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आज की प्रतियोगितावादी और मशीनी दुनिया में हमारे सामने अनेक नई समस्याएँ और प्रश्न उठ खड़े हुए हैं। इन्हीं में एक प्रमुख प्रश्न हमारी शिक्षा से भी सम्बन्ध रखता है, क्योंकि यही वह औज़ार है जो हमें लगातार असहिष्णु होती दुनिया में बेहतर मनुष्य बनाने में काम आ सकता है। आख़िर शिक्षा है क्या? उसका उद्देश्य क्या है? शिक्षा के प्रमुख अंग क्या होने चाहिए? आज के बच्चे, आज की शिक्षा पाने के बाद, किस प्रकार के नागरिक बनेंगे?</p> <p>आज ज़रूरत यह है कि बच्चे और वयस्क ऐसी शिक्षा पाएँ कि वे आपस में एक-दूसरे के नज़दीक होने के साथ-साथ सारे समाज से जुड़ें और सारी मानव जाति एक होकर समता और आत्मीयता से पूर्ण जीवन बिताए।</p> <p>पुस्तक के लेखक का मानना है कि हम कला और उद्योग को शिक्षा-पद्धति का केन्द्र बनाएँ, क्योंकि वह हमारे समाज को सन्तुलित करने का काम कर सकती है। देवी प्रसाद का यह विचार उनकी उस आन्तरिक समझ से सम्बन्ध रखता है जो तथाकथित आधुनिकता के विकास से जुड़ी हुई है। वे कहते हैं कि व्यक्ति की सृजनात्मकता का ख़ात्मा आज की शिक्षा-व्यवस्था के द्वारा हुआ है जिसने हमें अत्यन्त भयानक और अवसरवादी अवस्था में डाल दिया है।</p> <p>हमारे समाज में निचले तबक़े के लोगों के लिए कुछ भी ऐसा बाक़ी नहीं रहता जिसकी कोई अहमियत हो। यह इसलिए क्योंकि निर्णय वे लेते हैं जो समाज के ‘पिरामिड’ की चोटी पर विराजमान हैं। इसलिए यह पुस्तक उस पिरामिड को सीधा करने की कोशिश करती है। यह आधुनिकता की व्याख्या को भी बदलने का प्रयास करती है।</p> <p>यह कहना यथेष्ट होगा कि यह पुस्तक उन लोगों के लिए है जो हमारे पूरे संसार की चिन्ता करते हैं, केवल शिक्षा-व्यवस्था की नहीं। यह एक ऐसे व्यक्ति के लम्बे अनुभव और विचारों को दर्शाती है जो शान्तिवाद की मुहिम में प्रत्यक्ष रूप से लगा हुआ था।
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आज की प्रतियोगितावादी और मशीनी दुनिया में हमारे सामने अनेक नई समस्याएँ और प्रश्न उठ खड़े हुए हैं। इन्हीं में एक प्रमुख प्रश्न हमारी शिक्षा से भी सम्बन्ध रखता है, क्योंकि यही वह औज़ार है जो हमें लगातार असहिष्णु होती दुनिया में बेहतर मनुष्य बनाने में काम आ सकता है। आख़िर शिक्षा है क्या? उसका उद्देश्य क्या है? शिक्षा के प्रमुख अंग क्या होने चाहिए? आज के बच्चे, आज की शिक्षा पाने के बाद, किस प्रकार के नागरिक बनेंगे?</p>
<p>आज ज़रूरत यह है कि बच्चे और वयस्क ऐसी शिक्षा पाएँ कि वे आपस में एक-दूसरे के नज़दीक होने के साथ-साथ सारे समाज से जुड़ें और सारी मानव जाति एक होकर समता और आत्मीयता से पूर्ण जीवन बिताए।</p>
<p>पुस्तक के लेखक का मानना है कि हम कला और उद्योग को शिक्षा-पद्धति का केन्द्र बनाएँ, क्योंकि वह हमारे समाज को सन्तुलित करने का काम कर सकती है। देवी प्रसाद का यह विचार उनकी उस आन्तरिक समझ से सम्बन्ध रखता है जो तथाकथित आधुनिकता के विकास से जुड़ी हुई है। वे कहते हैं कि व्यक्ति की सृजनात्मकता का ख़ात्मा आज की शिक्षा-व्यवस्था के द्वारा हुआ है जिसने हमें अत्यन्त भयानक और अवसरवादी अवस्था में डाल दिया है।</p>
<p>हमारे समाज में निचले तबक़े के लोगों के लिए कुछ भी ऐसा बाक़ी नहीं रहता जिसकी कोई अहमियत हो। यह इसलिए क्योंकि निर्णय वे लेते हैं जो समाज के ‘पिरामिड’ की चोटी पर विराजमान हैं। इसलिए यह पुस्तक उस पिरामिड को सीधा करने की कोशिश करती है। यह आधुनिकता की व्याख्या को भी बदलने का प्रयास करती है।</p>
<p>यह कहना यथेष्ट होगा कि यह पुस्तक उन लोगों के लिए है जो हमारे पूरे संसार की चिन्ता करते हैं, केवल शिक्षा-व्यवस्था की नहीं। यह एक ऐसे व्यक्ति के लम्बे अनुभव और विचारों को दर्शाती है जो शान्तिवाद की मुहिम में प्रत्यक्ष रूप से लगा हुआ था।
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