Sanjay-Dhritrashtra Samvad
About the book
"भगवद्गीता मानव जाति की धरोहर है, जीवन के सद्निर्माण की पथ-प्रदर्शिका है। श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया गीता का उपाख्यान संजय ने धृतराष्ट्र को सुनाया। उसे सुनकर धृतराष्ट्र ने जगह-जगह पर संशय व्यक्त किए, जिनका समाधान संजय ने अपनी बुद्धि के अनुसार किया, पर धृतराष्ट्र मोह, लोभ एवं अहं से संतृप्त होने के कारण संजय के कथन को पूर्णरूप से ग्रहण नहीं कर सके। धृतराष्ट्र के समय के परिवेश तथा वर्तमान परिवेश में कई समानताएँ हैं। आजकल के मनुष्य के मन एवं बुद्धि में गीता पढ़ते समय उसी प्रकार के प्रश्न उठते हैं। इस कृति के माध्यम से मनुष्य के उन सभी संभावित प्रश्नों, संशयों को गीता के सूत्रों की पृष्ठभूमि में स्पष्ट किया गया है। आशा है, यह कृति इस सरलीकृत रूप में गीता के मूल सिद्धांतों को हृदयंगम करने में सहायक होगी।
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About the Book
"भगवद्गीता मानव जाति की धरोहर है, जीवन के सद्निर्माण की पथ-प्रदर्शिका है। श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया गीता का उपाख्यान संजय ने धृतराष्ट्र को सुनाया। उसे सुनकर धृतराष्ट्र ने जगह-जगह पर संशय व्यक्त किए, जिनका समाधान संजय ने अपनी बुद्धि के अनुसार किया, पर धृतराष्ट्र मोह, लोभ एवं अहं से संतृप्त होने के कारण संजय के कथन को पूर्णरूप से ग्रहण नहीं कर सके।
धृतराष्ट्र के समय के परिवेश तथा वर्तमान परिवेश में कई समानताएँ हैं। आजकल के मनुष्य के मन एवं बुद्धि में गीता पढ़ते समय उसी प्रकार के प्रश्न उठते हैं। इस कृति के माध्यम से मनुष्य के उन सभी संभावित प्रश्नों, संशयों को गीता के सूत्रों की पृष्ठभूमि में स्पष्ट किया गया है।
आशा है, यह कृति इस सरलीकृत रूप में गीता के मूल सिद्धांतों को हृदयंगम करने में सहायक होगी।
Book details
- Format
- Hardbound
- Publisher
- Prabhat Prakashan
- Weight
- 175 grams
- ISBN-13
- 9789384344658
- Pages
- 120
- Reading time
- ~5 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14 × 21.5 cm
- Language
- Hindi
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Sanjay-Dhritarashtra Samvad presents a layer of the Bhagavad Gita rarely explored in isolation: the dialogue between the charioteer-narrator Sanjay and the blind king Dhritarashtra, who listens to Krishna's counsel to Arjuna but remains trapped in attachment, doubt, and pride. This Hindi text reconstructs Dhritarashtra's objections and Sanjay's patient reasoning at various points in the Gita's eighteen chapters, revealing how intellectual resistance to spiritual truth persists even when divine wisdom is unfolding. The book draws a deliberate parallel between Dhritarashtra's era and contemporary India, arguing that modern readers encounter the same mental obstacles—ego, greed, attachment—that prevented the Kuru king from embracing Krishna's message. By foregrounding Sanjay's role as interpreter and guide, the text offers a meta-commentary on how the Gita is received, misunderstood, and gradually absorbed by minds conditioned by worldly concerns.
Sanjay-Dhritarashtra Samvad पुस्तक पढ़ने पर मुझे किस तरह का अनुभव मिलेगा?
यह पुस्तक आपको गीता को एक नए कोण से देखने का अनुभव देगी। आप केवल कृष्ण-अर्जुन संवाद नहीं सुनेंगे, बल्कि धृतराष्ट्र के संशयों और संजय के समाधानों के माध्यम से अपनी स्वयं की मानसिक बाधाओं को पहचानेंगे। यह एक धीमी, विचारशील यात्रा है जो आपको आत्म-निरीक्षण के लिए प्रेरित करती है।
Sanjay-Dhritarashtra Samvad पुस्तक किस प्रकार के पाठकों के लिए सबसे उपयुक्त है और इसे पढ़ने के लिए क्या पूर्वज्ञान चाहिए?
यह पुस्तक उन पाठकों के लिए आदर्श है जो भगवद्गीता से परिचित हैं और उसके गूढ़ अर्थों में गहराई से उतरना चाहते हैं। यदि आप आध्यात्मिक साहित्य में रुचि रखते हैं और अपने मन के द्वंद्व, अहंकार एवं मोह को समझना चाहते हैं, तो यह पुस्तक आपके लिए है। महाभारत की पृष्ठभूमि की जानकारी सहायक होगी।
Sanjay-Dhritarashtra Samvad पुस्तक के विषय का आज के भारतीय पाठकों के लिए सांस्कृतिक या ऐतिहासिक महत्त्व क्या है?
आज का भारतीय समाज भी धृतराष्ट्र की तरह मोह, लालच और अहंकार के प्रभाव में जीता है। यह पुस्तक उस समानता को उजागर करती है और बताती है कि गीता के संदेश को ग्रहण करने में वही मानसिक बाधाएँ आज भी विद्यमान हैं। यह एक दर्पण है जो समकालीन भारत के आध्यात्मिक संघर्ष को प्रतिबिंबित करता है।
Sanjay-Dhritarashtra Samvad विषय को लेखक ने किस विशिष्ट तरीके से प्रस्तुत किया है?
लेखक ने संजय की भूमिका को केंद्र में रखकर गीता की व्याख्या की एक मौलिक परत जोड़ी है। अधिकांश ग्रंथ कृष्ण-अर्जुन पर केंद्रित होते हैं, लेकिन यह पुस्तक धृतराष्ट्र के संशयों और संजय के समाधानों को पुनर्रचित करती है। यह दृष्टिकोण गीता को सुनने वाले के मन की प्रक्रिया को प्रकट करता है।
Sanjay-Dhritarashtra Samvad पुस्तक पढ़ने के बाद पाठक के मन में भावनात्मक, बौद्धिक या सांस्कृतिक रूप से क्या रह जाता है?
- आत्म-निरीक्षण की एक गहरी प्रवृत्ति और अपने मोह-अहंकार को पहचानने की क्षमता
- गीता को केवल श्लोक-संग्रह नहीं, बल्कि मानसिक परिवर्तन का साधन समझने की दृष्टि
- धृतराष्ट्र की विफलता से सीख लेकर अपने जीवन में आध्यात्मिक सत्य को ग्रहण करने की प्रेरणा
