Narak Safai
Author:
Arun Thakur, Mahammad KhadasPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Other0 Ratings
Price: ₹ 200
₹
250
Available
कितने आश्चर्य की बात है कि समाज का जो तबका समाज की सफाई रखने का काम करता है, मानव बस्तियों को रहने लायक बनाता है, गंदगी और बीमारियों से दूर रखता है, समाज ने उसी वर्ग को अपने से अलग कर दिया! इससे बड़ी विडंबना और कोई हो ही नहीं सकती कि समाज के लिए सबसे उपयोगी वर्ग को ही अछूत करार दिया गया और घृणा का पात्र बना दिया गया। इस वर्ग को अस्पृश्यता का अभिशाप तो झेलना ही पड़ा, कदम-कदम पर समाज के अत्याचारों का भी सामना करना पड़ा ।
दुर्भाग्य से आज भी सिर पर मैला ढोने की कुप्रथा बनी हुई है जबकि आजादी के दिनों से ही समाज के एक बड़े तबके को इससे मुक्त कराने की कोशिश होती रही है। गाँधी जी ने आजादी के आंदोलन में भंगी-मुक्ति का सपना देखा था। अनेक स्तरों पर काम होने के बावजूद भंगियों की स्थित में सुधार नहीं हो पाया है। महाराष्ट्र में इस प्रथा को नरक सफाई कहा जाता है, जिसमें भंगियों की कई पीढ़ियाँ लगी हुई हैं। भंगी अब किसी एक धर्म तक सीमित नहीं रहे। उनमें सिख, हिंदू, मुसलमान सभी हैं। वे अस्पृश्यों में भी अस्पृश्य हैं। लगभग हर धर्म में उनकी स्थिति एक जैसी ही है। घृणा, तिरस्कार और अपमान का दर्द ही उनके भाग्य में लिखा है।
अस्पृश्यों में भी जो अस्पृश्य हों, उनके जीवन में भला किसी की क्या दिलचस्पी हो सकती है? लेकिन लेखक-द्वय अरुण ठाकुर और महम्मद खडस ने बड़ी ही ईमानदारी से नरक सफाई के काम में लगे लोगों के जीवन का मार्मिक अध्ययन प्रस्तुत किया है। ‘नरक-सफाई’ महाराष्ट्र के वरिष्ठ बुद्धिजीवी और अनुसंधाता डॉ. य. दि. फड़के के कुशल मार्गदर्शन में ‘समता आंदोलन’ के कार्यकर्ता अरुण ठाकुर तथा महम्मद खडस द्वारा कड़ी मेहनत से जुटाए गए साक्ष्यों पर आधारित महत्त्वपूर्ण दस्तावेजी पुस्तक है।
आजादी के बाद भंगियों की जीवन-स्थितियों का बारीकी से अध्ययन करने वाली हिन्दी में पहली पुस्तक—‘नरक- सफाई’ !
ISBN: 9788119092840
Pages: 167
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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इस वृत्तान्त में गढ़ा कटंगा राज्य की उन सभी पीढ़ियों के राजाओं की जिजीविषा की कहानियाँ हैं, जिन्होंने मुग़लकाल के पश्चात् मराठा काल तक राज्य किया। ये गाथाएँ मानवीय विश्वास, संवेदना और कर्मठता के अतिरिक्त चार से अधिक शताब्दियों की कालावधि में हुए मानवीय विकास की कथाएँ हैं। ये जनजातीय राजे अपने विकासक्रम में निरक्षर, अपढ़ या गँवार नहीं रहे, न ही ये सर्वथा ऐकान्तिक रहे वरन् इनमें से अनेक साहित्यानुरागी, कलाप्रेमी और समकालीन राजनीति के खिलाड़ी भी रहे। ऐसे राजाओं में हृदयशाह का नाम उल्लेखनीय है। ग्रन्थ के पूर्वार्द्ध में राजगोंड कुलभूषण हृदयशाह की दो आगे की और दो पीछे की पीढ़ियों का वर्णन है। इन सभी पीढ़ियों में उनका व्यक्तित्व बेजोड़ है।यह पुस्तक निश्चित ही न तो इतिहास विषय का ग्रन्थ है और न ही सामाजिक शोध-प्रबन्ध, अतः इसकी अकादमिक उपयोगिता को बढ़ाने से सम्बन्धित किसी प्रयास की चर्चा बेमानी है। प्रयास यह रहा है कि कहानियों में ऐतिहासिकता अक्षुण्ण रहे, कल्पना प्रसूत पात्र एवं घटनाएँ यथासम्भव कम से कम हों। प्रत्येक ऐतिहासिक घटना को अलग-अलग इतिहासकार अपने नज़रिए से देखते हैं, परन्तु कहानी में घटना को किसी एक ही नज़रिए से देखा जा सकता है, यह उसकी सीमा है और आवश्यकता भी। सामान्य तौर पर कथाओं में वे घटनाएँ चुनी गई हैं जिनसे सर्गों की सूत्रबद्धता क़ायम रहे, परन्तु साथ ही वे सम्बन्धित राजाओं के जीवन की मुख्य घटनाएँ हों।
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