Gadya Ka Paani

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Hindi

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नीलेश रघुवंशी की कविता अपने साथ अपने पूरे समाज, पूरे परिवेश को लेकर आती है। इसी तरह उनके उपन्यासों में जो लोग आते हैं वे अपना पर्यावरण, जीने और नहीं जीने की अपनी तमाम परिस्थितियों के साथ आते हैं। ‘गद्य का पानी’ पुस्तक में वे ख़ुद को हौसला देती, ग़रीबी और अकेलेपन में साथिन बनकर उनकी बातें सुनती, सोचती अपनी डायरी; अपने प्रिय कवियों-कलाकारों-रंगकर्मियों को समझती काव्यात्मक टिप्पणियों; यात्राओं और कविता-कला-फ़िल्मों और किताबों पर विचारते गद्य के साथ उपस्थित हैं। उनका मन ‘मैं’ का उतना नहीं है जितना ‘हम’ का। उनके गद्य के इस बहुरंगी संचयन में उनका यह मन अपने प्रश्नों, अपने अचम्भों, अपनी करुणा, अपने दुखों—जो दरअसल सबके हैं; और अपनी बेचैनियों को एक साधारण नागरिक की भाषा में हमारे सामने रखता है। मज़दूर स्त्रियाँ-पुरुष, बच्चे, पेड़, कविताएँ, फ़िल्में, आवारगी, उच्च व मध्यवर्गीय समाज के विद्रूप, लोकतंत्र और यात्राएँ वे जगहें हैं जहाँ नीलेश का रचना-मन बार-बार रुकता है, आन्दोलित और सक्रिय होता है। इस संचयन में हमारे समय की एक महत्वपूर्ण कवि-उपन्यासकार के देखने और सोचने के तरीक़े का भी पता चलता है और रचना-प्रक्रिया का भी।

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ISBN
9789360865672
Pages
278
Avg Reading Time
9 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

Format:

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About the Book

नीलेश रघुवंशी की कविता अपने साथ अपने पूरे समाज, पूरे परिवेश को लेकर आती है। इसी तरह उनके उपन्यासों में जो लोग आते हैं वे अपना पर्यावरण, जीने और नहीं जीने की अपनी तमाम परिस्थितियों के साथ आते हैं।

‘गद्य का पानी’ पुस्तक में वे ख़ुद को हौसला देती, ग़रीबी और अकेलेपन में साथिन बनकर उनकी बातें सुनती, सोचती अपनी डायरी; अपने प्रिय कवियों-कलाकारों-रंगकर्मियों को समझती काव्यात्मक टिप्पणियों; यात्राओं और कविता-कला-फ़िल्मों और किताबों पर विचारते गद्य के साथ उपस्थित हैं।

उनका मन ‘मैं’ का उतना नहीं है जितना ‘हम’ का। उनके गद्य के इस बहुरंगी संचयन में उनका यह मन अपने प्रश्नों, अपने अचम्भों, अपनी करुणा, अपने दुखों—जो दरअसल सबके हैं; और अपनी बेचैनियों को एक साधारण नागरिक की भाषा में हमारे सामने रखता है। मज़दूर स्त्रियाँ-पुरुष, बच्चे, पेड़, कविताएँ, फ़िल्में, आवारगी, उच्च व मध्यवर्गीय समाज के विद्रूप, लोकतंत्र और यात्राएँ वे जगहें हैं जहाँ नीलेश का रचना-मन बार-बार रुकता है, आन्दोलित और सक्रिय होता है।

इस संचयन में हमारे समय की एक महत्वपूर्ण कवि-उपन्यासकार के देखने और सोचने के तरीक़े का भी पता चलता है और रचना-प्रक्रिया का भी।

Book Details

  • ISBN
    9789360865672
  • Pages
    278
  • Avg Reading Time
    9 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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