Desh Ke Is Daur Mein
(0)
Author:
Vishwanath TripathiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics₹
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परसाई जी पर आपकी किताब मिल गई और पढ़ ली गई। अपने देश व समाज से,मानवता से आप जिस गहराई तक जुड़े हैं, उस पर अचम्भा होता है। आपके लेखन से ताक़तमिलती है। बहुत-सी चीज़ें साफ़ होती हैं। परसाई जी का मैं प्रशंसक हूँ आज से नहीं, बहुत पहले से।हिन्दी में आज तक ऐसा हास्य-व्यंग्यकार नहीं हुआ। आपने बहुत बड़ा काम किया है। परसाई जी की जीवनी और कृतित्व दोनों को मिलाकर एक पुस्तक लिखी जानी चाहिए। —अमरकान्त परसाई पर विश्वनाथ त्रिपाठी ने पहली बार गम्भीरता से विचार किया है। यह अभी तक की एक अनुपम और अद्वितीय पुस्तक है, जिसमें परसाई के रचना-संसार को समझने और उद्घाटित करने का प्रयास किया गया है। —ज्ञानरंजन परसाई का लेखन डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी के चिन्तन के क़रीब पड़ता है। वे अपने चिन्तन को परसाई की रचना से पुष्ट और समृद्ध करते हैं। परसाई जी के निबन्धों की उन्होंने बहुत तरह से, बहुतकोणों से जाँच-पड़ताल की है— वर्तमानता की दृष्टि से, मनोविकारों की दृष्टि से, कला की दृष्टि सेऔर रूप की दृष्टि से। —बलीसिंह
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परसाई जी पर आपकी किताब मिल गई और पढ़ ली गई। अपने देश व समाज से,मानवता से आप जिस गहराई तक जुड़े हैं, उस पर अचम्भा होता है। आपके लेखन से ताक़तमिलती है। बहुत-सी चीज़ें साफ़ होती हैं। परसाई जी का मैं प्रशंसक हूँ आज से नहीं, बहुत पहले से।हिन्दी में आज तक ऐसा हास्य-व्यंग्यकार नहीं हुआ। आपने बहुत बड़ा काम किया है। परसाई जी की जीवनी और कृतित्व दोनों को मिलाकर एक पुस्तक लिखी जानी चाहिए।
—अमरकान्त
परसाई पर विश्वनाथ त्रिपाठी ने पहली बार गम्भीरता से विचार किया है। यह अभी तक की एक अनुपम और अद्वितीय पुस्तक है, जिसमें परसाई के रचना-संसार को समझने और उद्घाटित करने का प्रयास किया गया है।
—ज्ञानरंजन
परसाई का लेखन डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी के चिन्तन के क़रीब पड़ता है। वे अपने चिन्तन को परसाई की रचना से पुष्ट और समृद्ध करते हैं। परसाई जी के निबन्धों की उन्होंने बहुत तरह से, बहुतकोणों से जाँच-पड़ताल की है— वर्तमानता की दृष्टि से, मनोविकारों की दृष्टि से, कला की दृष्टि सेऔर रूप की दृष्टि से।
—बलीसिंह
Book Details
-
ISBN9788171788552
-
Pages111
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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प्रस्तुत पुस्तक में डॉ. ब्रह्मदत्त शर्मा ने हिन्दी समीक्षा के मूल तक जाने का प्रयत्न किया है और अग्निपुराणकार, भरत, दंडी, आनन्दवर्द्धन, वामन, कुन्तक एवं क्षेमेन्द्र की मान्यताओं और मतों को बोधगम्य बनाने का प्रयास किया है। भारतीय चित्त एवं मानस में ये मान्यताएँ इतनी रची-बसी हैं कि सामान्य पाठक भी कविता पढ़ते समय स्वभावतः यह प्रश्न करता है कि कविता किस रस की है, इसमें कौन से अलंकार हैं, कौन-सी वक्रता है तथा उससे क्या व्यंजित हो रहा है। प्रस्तुत पुस्तक में सभी भारतीय सम्प्रदायों की मान्यताओं का विवेचन उपरोक्त प्रश्नों के सन्दर्भ में किया गया है। किस प्रकार का लेखन साहित्य है और उसकी क्या विशेषताएँ हैं? साहित्यकार किस प्रकार चमत्कारपूर्ण भाषा का प्रयोग कर अपनी अनुभूति को सार्वजनीन व सार्वकालिक बनाता है? किस प्रकार वह अपने भावावेगों का सम्प्रेषण कर उनका साधारणीकरण कर देता है? किस प्रकार अपने विषयों को चुनता है व उनमें अपनी अनुभूति का संचार करता है? उसे साहित्य रचना की प्रेरणा कहाँ से मिलती है तथा उसमें उसकी प्रतिभा का क्या योगदान है? काव्य-सृजन का हेतु एवं प्रयोजन क्या है? इन गम्भीर प्रश्नों का विवेचन भी सभी भारतीय साहित्य सम्प्रदायों के परिप्रेक्ष्य में इस पुस्तक में पाठकों को मिलेगा।
Bhasha Ka Samajshastra
- Author Name:
Rajendra Prasad Singh
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वेदों में ‘मनुष्य’ और ‘मानुष’ एक साथ कैसे चलते हैं? कौन किसका अपभ्रंश है? अगर मनुष्य में षष्ठी विभक्ति है तो मानुष में कौन-सी विभक्ति है जिसके बलबूते पहले की व्युत्पत्ति मनु की सन्तति की जाती है? वैदिक ‘मान’ का अर्थ है घर, जो घर में रहता है, वह ‘मानुष’ है और जो वन में रहता है, वह ‘वनमानुष’ है; इसीलिए ‘वनमनुष्य’ पद नहीं चलता है। हिन्दी भाषी क्षेत्र की लोकबोलियों में मानुस शब्द चलता है, मनुष्य नहीं। इसलिए यह दावा करना कि लोकबोलियों के सभी शब्द संस्कृत के अपभ्रंश हैं, ग़लत होगा। भोजपुरी में जानवरों की माँद को आज भी मान/मनान कहा जाता है। लोकबोलियों में मनुष्य को ‘मनई’ भी कहा जाता है यानी मान (घर) में रहनेवाला जैसे कि मान (घर) में रहनेवाले को खड़ी बोली में ‘मानव’ कहा जाता है। ‘मान’ का क्रियामूल ‘मा’ है जिसका अर्थ होता है—निर्माण करना। यह क्रियामूल मठ, मण्डप, मन्दिर, माँद, मान, मनान, माड़ो—सभी में मौजूद है। ‘मानुष’ तत्सम है, ‘मनुष्य’ तद्भव है। संस्कृत में बहुत सारे शब्द मिलेंगे जो लोकबोलियों के आधार पर गढ़े गए हैं परन्तु ग़लती से उसे तत्सम मान लिया जाता है। कारण कि हमारी भाषावैज्ञानिक स्थापना रही है कि संस्कृत पुरानी भाषा है, इसलिए लोकबोलियों के शब्द तद्भव हैं जबकि संस्कृत का पहला लम्बा अभिलेख 150 ई. में पश्चिमी भारत के जूनागढ़ से मिलता है। प्राकृत के अभिलेख भारत में सबसे पुराने हैं। वैदिक भाषा पुरानी है, वैदिक संस्कृति भी पुरानी है तब इस तथ्य की भी पड़ताल की जानी चाहिए कि वैदिक युग के तथाकथित सोने के सिक्के ‘निष्क’ कहाँ गए जबकि धातु के सिक्के सबसे पहले गौतम बुद्ध के युग में मिलते हैं। भाषा का समाजशास्त्र इस बात का जवाब देगा कि मागधी प्राकृत के साथ संस्कृत के आचार्यों ने दोयम दर्जे का व्यवहार क्यों किया है।
Aacharya Shukla Ka Itihas Padhte Huye
- Author Name:
Bachchan Singh +1
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‘आचार्य शुक्ल का इतिहास पढ़ते हुए’ साहित्यालोचना की श्रेणी में एक अलग ढंग की पुस्तक है। हिन्दी साहित्य के मानक इतिहास के रूप में प्रतिष्ठित आचार्य शुक्ल की पुस्तक को ‘साहित्येतिहास-लेखन की अत्यन्त प्रौढ़ और प्रगतिशील विरासत’ मानते हुए डॉ. बच्चन सिंह यह भी कहते हैं कि अभी भी अनेक प्रश्न हैं जो उत्तर की माँग करते हैं, बहुत-से बिन्दु है जिन पर विचार किया जाना चाहिए। वे कहते हैं कि शुक्ल जी पहले व्यक्ति हैं जिनके हाथों हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन के लिए एक सुसंगत आधार और उसका पैटर्न तैयार हुआ। इसके लिए उन्होंने जो केन्द्रीय बिन्दु रखा, वह है ‘लोक प्रवृत्ति’, जिसे उन्होंने जनता की चित्तवृत्ति कहा। लेकिन वे इस तथ्य के प्रति भी सजग थे कि जिस चित्तवृत्ति का प्रतिफलन साहित्य में हुआ, उसका सरोकार शिक्षित जन से है। डॉ. बच्चन सिंह आचार्य शुक्ल के बाद आचार्य द्विवेदी के काम को ही उल्लेखनीय मानते हैं, इसलिए इस पुस्तक में दोनों ही विद्वानों के इतिहास-सम्बन्धी कामों पर अकसर साथ में बात करते हैं, जिससे पाठक के रूप में हम और भी लाभान्वित होते हैं। यह पुस्तक आचार्य शुक्ल लिखित इतिहास को पढ़ने के लिए वृहत्तर भूमि तैयार करती है, और अन्य उपलब्ध साहित्येतिहास-ग्रंथों का भी परिचय देती चलती है।
Krantikari Kavi Nirala
- Author Name:
Bachchan Singh +1
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‘क्रान्तिकारी कवि निराला’ हिन्दी के महाप्राण कवि निराला के काव्यगत विकास-क्रम को उनके वैयक्तिक संघर्ष के सन्दर्भ में देखते हुए उनके जीवन, तत्कालीन परिस्थितियों और उनकी कविता की विशिष्टताओं का विवेचन करती है। गौरतलब है कि यह पुस्तक उस समय लिखी गई थी, जब हिन्दी आलोचना में निराला के कृतित्व को लेकर कोई सुसंयोजित काम नहीं हुआ था। गिराला और उनके समय के साथ-साथ यह पुस्तक छायावाद तथा उससे पहले की काव्य-प्रवृत्तियों पर भी टिप्पणी करती चलती है, विशेषतया छायावाद पर। डॉ. बच्चन सिंह कहते हैं कि छायावादी काव्य-सर्जना का सम्बन्ध कवि की निजी प्रेरणा से रहा और यह पारम्परिक कवि-प्रतिभा से भिन्न चीज थी। छायावादी या रोमैंटिक कवि के लिए उसके रचनात्मक क्षणों का महत्त्व सर्वोपरि होता है। इसीलिए निराला की कविता को समझने के लिए भी उनके व्यक्ति को जानना जरूरी है। इसी से हम यह जान पाते हैं कि प्रगतिवादी नहीं होते हुए भी उनकी कविता इतनी प्रगतिपरक कैसे है, और प्रयोगवादी न होते हुए भी कविताओं में इतने रूपात्मक प्रयोग वे कैसे कर सके। निराला के परिचय से लेकर यह पुस्तक उनकी कविता के निर्णायक पड़ावों से होती हुई उनकी रचना-प्रक्रिया के विश्लेषण तक जाती है। संलग्न परिशिष्ट में संकलित ‘राम की शक्तिपूजा’ और निराला की अंतिम कविता की समीक्षा इसे और संग्रहणीय बना देती है। निराला और उनकी कविता को जानने-समझने के लिए इस पुस्तक का विशेष महत्व है।
Kabeer aur Bhakti Andolan
- Author Name:
Gyantosh Kumar Jha
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Criticism
Manak Hindi Ka Vyavharparak Vyakaran
- Author Name:
Ramesh Chandra Mahrotra
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हिन्दी भाषा हिन्दी की समस्त बोलियों के समुच्चय की बोधक है। जिस तरह नदी की सहायिकाएँ अपनी अलग सत्ता रखते हुए भी नदी की मुख्यधारा से अपना नित्य सम्बन्ध निभाती हैं, उसी तरह भाषा की बोलियाँ भी अपना पृथक् अस्तित्व बनाए रखकर भाषा की अन्तर्धारा से अपना सम्बन्ध सजीव किए रहती हैं। भाषा का मानक रूप एक बहुग्राही सम्मिश्रण रूप होता है। उसकी सैर दूर-दूर तक और गलियारों तक में होती है, इसलिए वह हर जगह से कुछ न कुछ ग्रहण करती चलती है। अनेक क्षेत्रों के शब्दादि और विशिष्ट अर्थ प्राय: उसमें प्रविष्ट होते रहते हैं। जिन रूपों और प्रयोगों को सभी लोग शुद्ध मानते हुए उनका केवल एक रूप स्वीकार करते हैं, उनके बारे में कोई भी कह देगा कि वे मानक हैं। लेकिन नए-पुराने तर्कों और रूपों के आधार पर कभी-कभी एकाधिक रूप या प्रयोग भी चलन में होते हैं। विख्यात भाषा वैज्ञानिक रमेश चंद्र महरोत्रा की यह पुस्तक भाषा प्रयोग की ऐसी ही व्यावहारिक समस्याओं पर प्रकाश डालते हुए आम पाठक से लेकर भाषा को माध्यम के रूप में प्रयोग करनेवाले बुद्धिजीवियों तक के लिए एक निर्देशिका के रूप में काम करेगी, ऐसा हमारा विश्वास है।
Kavya-Pustak Samiksha Ka Swaroop
- Author Name:
Ramkishor Sharma +1
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Awating description for this book
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