Hindi Aalochana Ke Adhar-Stambh
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प्रस्तुत पुस्तक ‘हिन्दी आलोचना के आधार-स्तम्भ’ में समीक्षात्मक लेखों का संकलन विश्वविद्यालयों की उच्चतम कक्षाओं के विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर किया गया है। इसकी मूल प्रेरणा यह रही है कि हिन्दी आलोचना के चिन्तनगत उत्कर्ष बिन्दु और विषय प्रतिपादन की वैज्ञानिकता का समवेत रूप हिन्दी आलोचना के जिज्ञासु तथा प्रबुद्ध छात्र-अध्येताओं के समक्ष प्रस्तुत किया जाए, जिससे कि वे उसकी अद्यतन उपलब्धि का कुछ अनुमान कर सकें। निश्चय ही समग्र चित्र प्रस्तुत करने में इस प्रकार के आयोजन को और भी विशद बनाने के लिए हिन्दी के अनेक लब्धप्रतिष्ठ आचार्यों और चिन्तकों की विचार-सरणियों की अपेक्षा व गुंजाइश हो सकती थी, पर योजना की साधन-सीमाओं के कारण अपने विचार को प्रस्तुत रूप देकर ही हमें सन्तुष्ट होना पड़ा। विद्वज्जन इस ग्रन्थ को हमारे मूल आशय का एक प्रतीक रूप समझकर ही ग्रहण करने की कृपा करें। यदि भविष्य में अवसर मिला तो इस शृंखला में कड़ियाँ जोड़कर हम इस कार्य को आगे बढ़ाने में प्रसन्नता का अनुभव करेंगे।</p> <p>इस ग्रन्थ में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी तथा आचार्य नगेन्द्र के आलोचनात्मक कृतित्व के उत्तमांश का कुछ श्रेष्ठ निबन्धों के रूप में संकलन किया गया है। प्रत्येक विद्वान् के कृतित्व को सम्यक् रूप से हृदयंगम करने की दृष्टि से उन पर अधिकारी विद्वानों के भी कुछ लेख परिपार्श्विक अध्ययन के लिए दिए गए हैं। आशा है, यह पद्धति नियत उद्देश्य की सिद्धि में विशेष रूप से सहायक होगी।</p> <p>इन निबन्धों के रूप में अत्यन्त मननीय सामग्री प्रस्तुत करने का यथासम्भव प्रयत्न किया है। विश्वविद्यालय के छात्रों की चेतना में इनका रस घुल-मिल जाए और परिणामस्वरूप मेधावी छात्र अपनी-अपनी प्रतिभा और कुशाग्र बुद्धि से हिन्दी आलोचना की उत्कर्ष-रेखा को लाँघकर, आगे बढ़ने की स्फूर्ति से उज्जीवित हों, नए समीक्षा-प्रतिमानों की स्थापना का स्वप्न देखें और उसके लिए क्रियाशील हों—इसी में इस प्रयास की चरम सिद्धि होगी।</p> <p>विद्वानों की रचनाएँ मुख्य सामग्री के रूप में इसमें संकलित की गई हैं और सहायक सामग्री के रूप में विद्वत्तापूर्ण लेखों को समाविष्ट किया गया है।
Read moreAbout the Book
प्रस्तुत पुस्तक ‘हिन्दी आलोचना के आधार-स्तम्भ’ में समीक्षात्मक लेखों का संकलन विश्वविद्यालयों की उच्चतम कक्षाओं के विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर किया गया है। इसकी मूल प्रेरणा यह रही है कि हिन्दी आलोचना के चिन्तनगत उत्कर्ष बिन्दु और विषय प्रतिपादन की वैज्ञानिकता का समवेत रूप हिन्दी आलोचना के जिज्ञासु तथा प्रबुद्ध छात्र-अध्येताओं के समक्ष प्रस्तुत किया जाए, जिससे कि वे उसकी अद्यतन उपलब्धि का कुछ अनुमान कर सकें। निश्चय ही समग्र चित्र प्रस्तुत करने में इस प्रकार के आयोजन को और भी विशद बनाने के लिए हिन्दी के अनेक लब्धप्रतिष्ठ आचार्यों और चिन्तकों की विचार-सरणियों की अपेक्षा व गुंजाइश हो सकती थी, पर योजना की साधन-सीमाओं के कारण अपने विचार को प्रस्तुत रूप देकर ही हमें सन्तुष्ट होना पड़ा। विद्वज्जन इस ग्रन्थ को हमारे मूल आशय का एक प्रतीक रूप समझकर ही ग्रहण करने की कृपा करें। यदि भविष्य में अवसर मिला तो इस शृंखला में कड़ियाँ जोड़कर हम इस कार्य को आगे बढ़ाने में प्रसन्नता का अनुभव करेंगे।</p>
<p>इस ग्रन्थ में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी तथा आचार्य नगेन्द्र के आलोचनात्मक कृतित्व के उत्तमांश का कुछ श्रेष्ठ निबन्धों के रूप में संकलन किया गया है। प्रत्येक विद्वान् के कृतित्व को सम्यक् रूप से हृदयंगम करने की दृष्टि से उन पर अधिकारी विद्वानों के भी कुछ लेख परिपार्श्विक अध्ययन के लिए दिए गए हैं। आशा है, यह पद्धति नियत उद्देश्य की सिद्धि में विशेष रूप से सहायक होगी।</p>
<p>इन निबन्धों के रूप में अत्यन्त मननीय सामग्री प्रस्तुत करने का यथासम्भव प्रयत्न किया है। विश्वविद्यालय के छात्रों की चेतना में इनका रस घुल-मिल जाए और परिणामस्वरूप मेधावी छात्र अपनी-अपनी प्रतिभा और कुशाग्र बुद्धि से हिन्दी आलोचना की उत्कर्ष-रेखा को लाँघकर, आगे बढ़ने की स्फूर्ति से उज्जीवित हों, नए समीक्षा-प्रतिमानों की स्थापना का स्वप्न देखें और उसके लिए क्रियाशील हों—इसी में इस प्रयास की चरम सिद्धि होगी।</p>
<p>विद्वानों की रचनाएँ मुख्य सामग्री के रूप में इसमें संकलित की गई हैं और सहायक सामग्री के रूप में विद्वत्तापूर्ण लेखों को समाविष्ट किया गया है।
Book Details
-
ISBN9788180314896
-
Pages250
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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लोक-साहित्य एवं लोक-संस्कृति के संरक्षण, संवर्द्धन एवं उन्नयन के प्रयास के अनुक्रम में ‘लोक साहित्य एवं संस्कृति’ पुस्तक के सृजन की योजना बनी है। इस आशा के साथ कि उच्च शिक्षा में अध्ययनरत छात्रों, शोधार्थियों एवं अकादमिक जगत् से जुड़े हुए विद्वत समाज के मनोविज्ञान में लोक साहित्य और संस्कृति के प्रति एक बौद्धिक व आत्मिक रिश्ते का अंकुरण प्रस्फुटित होगा। भारत की सामासिक संस्कृति, अक्षय सामाजिक-सांस्कृतिक लोक परम्परा, लोकाचार, लोक व्यवहार, लोक विश्वास और लोक मान्यताओं से बनी हुई इस सभ्यता के भीतर दाखिल हो कर हम लोकजीवन व लोक-संस्कृति के सापेक्ष जीवन मूल्यों व ‘जीवन जीने की कला’ के रहस्य सूत्र की तलाश कर सकेंगे। लोक साहित्य व संस्कृति में हमारी सांस्कृतिक विरासतों की गहरी जड़ें व गौरव के भाव सन्निहित हैं।
वैश्वीकरण और बाजारवाद के इस दौर में जब हमारे मूल्य, संस्कृति, परम्परा और सरोकार तेजी से धराशायी हो रहे हैं, जब छद्म विकास, अपरिमित मुनाफा और दिखावे का मुखौटा लगाकर हमारी अस्मिता को विनष्ट करने का षड्यंत्र रचा जा रहा हो, जब हमारा जीवन बाजार के हाथों नियंत्रित और संचालित होने लगे, जब हमारी संवेदनाएँ छीजने लगे, जब एकल परिवार हमारी प्राथमिकता में अपनी जगह बनाने लगे, तब ऐसे समय में हमें लोक साहित्य और संस्कृति से वैचारिक ऊष्मा व प्रेरणा की असंख्य रोशनी मिलती है। यह रोशनी समय के तमाम धुंध और अन्धेरे को छांटने में सक्षम और कारगर है।
लोक साहित्य में लोक अन्तर्मन की अनुगूँज ध्वनित हैं। इस गूँज में सामूहिकता है। भावनात्मक एकता है। जीवन का राग और सौन्दर्य है। अधिकार, अस्तित्व, अस्मिता, अध्यात्म और जीजिविषा का प्रश्न है। वंचितों और पीड़ितों के जरूरी सवाल हैं। स्त्री स्वायत्तता और अधिकार के प्रश्न केन्द्र में हैं। इसमें निश्छल हँसी भी है और करुण चीत्कार भी है। इसमें सृजन और संहार दोनों का रंग समाहित है। लोक साहित्य की सभी विधाओं में जीवन के सारे अनिवार्य तत्वों का समावेश है। सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से लोक साहित्य का अध्ययन अपेक्षित है। अतएव राष्ट्र निर्माण, सामाजिक भागीदारी व मानवीय विकास में लोक साहित्य की भूमिका अद्वितीय है। इसमें रंच मात्र भी संशय नहीं है।
Kabeer Mimansa
- Author Name:
Ramchandra Tiwari
- Book Type:

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Description:
इस संस्करण में कबीर से सम्बन्धित निबन्ध—कबीर-वाणी की लिखित एवं मौखिक परम्परा तथा कबीर का व्यक्तित्व, ‘कबीर-वाणी के अध्ययन की परम्परा’, ‘प्रगतिवादी कबीर', ‘कबीर का आदर्श मानव और मानवतावाद’, ‘कबीर को कबीर ही रहने दें’, ‘कबीर : अन्तर्विरोधों के बावजूद’ शामिल किया गया है। यह कबीर से सम्बन्धित सभी पक्षों का समग्र मूल्यांकन करनेवाली कृति है।
प्रस्तुत कृति में कबीर के जीवन-वृत्त और कृतियों के प्रामाणिक परिचय के साथ ही उनके युग-विधायक बहुआयामी व्यक्तित्व को व्यंजित करने वाली सभी संघटक तत्त्वों का गम्भीर, सन्तुलित, सारग्राही, स्पष्ट एवं आग्रहयुक्त अध्ययन किया गया है। यह प्रयास उस महिमामय व्यक्तित्व के प्रति एक विनम्र प्रणति है।
आशा है, विद्वज्जनों के बीच यह कृति इसी रूप में स्वीकार्य होगी तथा पाठकों का मार्गदर्शन करने में सहायक सिद्ध होगी।
Urdu Sahitya Ka Alochnatmak Ithas
- Author Name:
Ahtesham Hussain
- Book Type:

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Description:
इस ग्रन्थ के विद्वान लेखक प्रोफ़ेसर एहतेशाम हुसैन उर्दू के मान्य आलोचक हैं। यह पुस्तक मूल रूप से हिन्दी में ही लिखी गई थी और अब यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि इससे अच्छा उर्दू साहित्य का कोई दूसरा इतिहास न तो हिन्दी में उपलब्ध है और न ही उर्दू में। उर्दू साहित्य के अब तक जो इतिहास लिखे गए हैं, उनमें यह कमी रही है कि लेखकों ने सामाजिक चेतना और ऐतिहासिक समग्रता को अपनी दृष्टि में नहीं रखा है; कुछ भाषा सम्बन्धी विभिन्नताओं और शैलियों के भेदोपभेदों को सामने रखकर काल-विभाजन कर दिया है। इससे उर्दू साहित्य से सम्पूर्ण इतिहास के विकास और उसकी विभिन्न विधाओं की प्रगति का ठीक-ठीक ज्ञान नहीं हो पाता है। प्रस्तुत पुस्तक में चेष्टा की गई है कि उर्दू-साहित्य की जो रूपरेखा दी जाए, वह इस बात का सही-साफ़ परिचय दे सके कि कौन-सी ऐसी ऐतिहासिक परिस्थितियाँ थीं, जिनमें साहित्यिक विकास तथा परिवर्तन का क्रम निरन्तर गतिशील रहा और उसने भारतीय भाषाओं के साहित्य में उर्दू-साहित्य की महान् परम्परा को विकसित और समृद्ध किया।
चूँकि उर्दू-साहित्य के इतिहास का हिन्दी साहित्य के इतिहास से अविच्छिन्न सम्बन्ध है, इसलिए यह निश्चित ही है कि यह पुस्तक हिन्दी के उच्च कक्षा के विद्यार्थियों, जिज्ञासु पाठकों, सुधी आलोचकों तथा शोधकर्ताओं के लिए अत्यन्त उपयोगी है।
Kannada Varnamale
- Author Name:
Anupama K Benachinamardi
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- Book Type:

- Description: This book is tailored for individuals with an interest in mastering the Kannada alphabet. It elucidates the pronunciation of each Kannada letter using English phonetics. Moreover, the book incorporates sensory words that captivate children's interest. Another distinctive aspect of this book is its presentation of vowels and consonants within the context of natural phenomena. Our aim is for children to forge a deeper connection with nature through this book.
Alochak Ka Dayitva
- Author Name:
Ramchandra Tiwari
- Book Type:

- Description: प्रस्तुत कृति में आधुनिक हिन्दी-आलोचना की परिधि में आने वाले विविध सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक प्रश्नों के विश्लेषण-क्रम में आलोचक के गहन दायित्व के आकलन की चेष्टा की गई है। लेखक ने आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ. नगेन्द्र, डॉ. रामविलास शर्मा और डॉ. नामवर सिंह जैसे प्रख्यात् आलोचकों की सैद्धान्तिक मान्यताओं एवं व्यावहारिक समीक्षा-पद्धतियों के विश्लेषण द्वारा यह स्पष्ट करने की चेष्टा की है कि इन आलोचकों ने किस सीमा तक और किस रूप में एक आदर्श आलोचक के दायित्व का निर्वाह किया है। यह कृति हिन्दी के विवेकशील एवं आग्रहमुक्त सुधी पाठकों के बीच प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकेगी, ऐसा हमारा विश्वास है।
Duniya Ko Badal Denewale 50 Yuddha
- Author Name:
Pallav Kishore
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- Description: प्रकति में जब भूकंप या सूनामी इत्यादि आपदाओं के कारण उथल-पुथल मचती है तो दुनिया के नक्शे में बदलाव होता है और जब कतिपय कारणों से सामाजिक वर्णों में युद्ध छिड़ता है तो समाज के स्तर पर दुनिया में बड़ा बदलाव आता है। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद अनेक यूरोपीय और अफ्रीकी देशों की भू- सीमाओं और मानविकी में उल्लेखनीय परिवर्तन हुआ, जिससे स्थानीय सभ्यता और संस्कृति पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ा। दूसरे विश्वयुद्ध ने आग में घी का काम किया और पूरी दुनिया को प्रभावित किया। भारत के आजादी के संग्राम और उसके बाद भारत का विभाजन कर पाकिस्तान बनाया गया--उस दौरान हुए भीषण संघर्ष में न केवल दुनिया के नक्शे पर एक नए देश का आविर्भाव हुआ, वरन् भयंकर रक्तक्रांति भी हुईं। इसने आगामी अनेक वर्षों तक मानव सभ्यता को प्रभावित किया। दरअसल जब से दुनिया बनी है, युद्ध कहीं-न-कहीं होते रहे हैं। आज भी अनेक देश युद्ध की आग में झुलस रहे हैं--सीरिया संकट, उत्तर कोरिया संकट, अफगानिस्तान में तालिबान संकट, भारत- पाक तना-तनी, इजराइल-फिलिस्तीन संकट। दुनिया में अमन-शांति के लिए आवश्यक है कि मानवहित में इन युद्धों पर पूर्णविराम लगे।
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