Pracheen Bharat Mein Rajneetik Vichar Evam Sansthayen
Author:
Ramsharan SharmaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics0 Reviews
Price: ₹ 1036
₹
1295
Available
प्राचीन भारतीय इतिहास को वैज्ञानिक खोजों के आलोक में व्याख्यायित-विश्लेषित करनेवाले इतिहासकारों में प्रो. रामशरण शर्मा का महत्त्वपूर्ण स्थान है। अपनी इस पुस्तक में उन्होंने प्राचीन भारत की राजनीतिक विचारधाराओं और संस्थाओं के साम्राज्यवादी और राष्ट्रवादी स्वरूप का सर्वेक्षण किया है। इस क्रम में उन्होंने गण, सभा, समिति, परिषद जैसी वैदिक संस्थाओं के जनजातीय स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए ‘विदथ’ नामक लोक-संस्था पर विस्तार से विचार किया है और उत्तर-वैदिक संस्थाओं के अध्ययन में वर्ण और धर्म का महत्त्व दिखाया है। उन्होंने यह भी बताया है कि सातवाहन राज्यव्यवस्था मौर्य और गुप्त व्यवस्थाओं तथा उत्तर और दक्षिण भारत को मिलानेवाली कड़ी का काम करती है।<br>साथ ही, कुषाण तथा सातवाहन राज्यतंत्रों के विश्लेषण में बाह्य, स्थानीय और सामंतवादी तत्त्वों पर भी प्रो. शर्मा की दृष्टि गई है। कुल मिलाकर, प्रो. शर्मा ने वैदिक काल से लेकर गुप्त काल तक राज्यव्यवस्था के प्रमुख चरणों का बदलते हुए आर्थिक और सामाजिक संदर्भों में अध्ययन किया है।<br>उपरोक्त अध्ययन के क्रम में प्रो. शर्मा ने कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं और उनका यथासंभव समाधान भी इस पुस्तक में दिया है। उनका मानना है कि इस काल में जिन राजनीतिक विचारों का जन्म हुआ, उनके पीछे जाति, वर्ण, धर्म और अर्थव्यवस्था की भूमिका को समझे बिना इन विचारों की तह तक पहुँचना संभव नहीं है। इस पुस्तक के प्रकाशन के पूर्व इन मुद्दों पर व्यापक रूप से विचार नहीं किया गया था।<br>प्राचीन भारतीय इतिहास के छात्रों, शोधार्थियों और अध्यापकों के लिए यह एक आवश्यक ग्रंथ है।
ISBN: 9788126707584
Pages: 421
Avg Reading Time: 14 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: औपनिवेशक पराधीनता झेल चुके समाजों का इतिहास जाने-अनजाने औपनिवेशक दृष्टिकोण के बोझ से दबा नजर आता है। भारत के आदिवासियों के सन्दर्भ में यह समस्या दोहरी रही है क्योंकि उनके सामने ब्रिटिश पराधीनता के साथ-साथ वर्चस्वशाली गैर-आदिवासी तबके का शोषण भी रहा है। दरअसल आदिवासियों का इतिहास भी अब तक ज्यादातर गैर-आदिवासी ही लिखते रहे हैं जिसमें उन्हें देखने के दो प्रमुख दृष्टिकोण रहे हैं। पहला, सब-आल्टर्न परिप्रेक्ष्य जिसमें इतिहास को नीचे से देखने अर्थात उपेक्षित-वंचित तबकों का इतिहास में समुचित उल्लेख करने और उन्हें वाजिब श्रेय देने पर जोर रहा है। और दूसरा, राष्ट्रवादी परिप्रेक्ष्य जिसमें मुख्य रूप से राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन में आदिवासियों की भूमिका को रेखांकित किया जाता रहा है। ये दोनों दृष्टिकोण भी आदिवासी समुदायों को अन्य और विशिष्ट सांस्कृतिक समूह मानने की औपनिवेशिक भ्रान्ति से मुक्त नहीं रह पाए। इसलिए इन दोनों तरह के इतिहासकारों के लेखन में प्राचीन और मध्यकालीन आदिवासी राजवंशों और गणराज्यों की प्रभावी उपस्थिति का जिक्र या आकलन न के बराबर मिलता है। ललिता सुंडी की यह पुस्तक उपरोक्त सीमाओं को लाँघकर आदिवासी इतिहास को बहुआयामी स्वरूप प्रदान करती है। इसमें सिंहभूम की भौगोलिक स्थिति, प्राचीन इतिहास, राजवंशों का उदय, राजनीतिक परिदृश्य, सामाजिक-सांस्कृतिक परम्पराएँ, पारम्परिक शासनप्रणाली, क्षेत्र के प्रमुख आदिवासी समुदायों का महत्व और उनका परस्पर सम्बन्ध आदि तमाम विषयों को समाहित किया गया है। इस ऐतिहासिक विवेचना में सिंहभूम के अर्थशास्त्रीय पक्ष को भी शामिल किया गया है। वस्तुतः यह पुस्तक सिंहभूम के हवाले से आदिवासियों के प्रति रूढ़ दृष्टिकोण को नकारने की एक शोधपरक पहल है जिसमें उन्हें सिर्फ जंगल और पिछड़ेपन से जोड़कर देखे जाने के विपरीत उनके समृद्ध इतिहास को प्रस्तुत किया गया है। इसका दस्तावेजी महत्त्व असंदिग्ध है।
Netaji Subhash Chitramaya Jeevani
- Author Name:
Rajendra Patoriya
- Book Type:

- Description: नेताजी सुभाषचंद्र बोस क्रांतिकारी थे, उनका ध्येय था भारत की स्वतंत्रता। वे एक राजनेता, कूटनीतिज्ञ के साथ-साथ दूरदर्शी एवं स्पष्टवक्ता थे। उन्होंने किसी भी कीमत पर आजादी के लिए समझौता नहीं किया। उनका एक ही लक्ष्य था—अंग्रेजों से भारत की मुक्ति। नेताजी अपने चुंबकीय व्यक्तित्व के कारण भारत और बाहर आकर्षण का केंद्र रहे। वे अपने समय के विश्वमान्य नेता थे। स्वतंत्रता के पूर्व विदेशी शासक घबराते रहे नेताजी सुभाष बाबू से तो स्वतंत्रता के उपरांत देशी सत्ताधीन घबराते रहे जनमानस पर उनके व्यक्तित्व और कर्तृत्व के अमिट प्रभाव से। यह बड़े ही आश्चर्य की बात है कि आजादी के बाद नेताजी के बारे में, उनके कार्यों के विषय में सरकारें कभी भी सही-सही मूल्यांकन नहीं कर पाईं। विद्वानों का मत है कि सुभाषचंद्र बोस और आजाद हिंद सेना के संपूर्ण विषय को विस्मृति के गर्त में ढकेलने के लिए सुनियोजित षड्यंत्र और कुचक्र रचे गए। नेताजी के जीवित होने के बारे में भी जनता असमंजस में रही। लेकिन इन तमाम कुत्सित प्रयासों के बाद भी जन-जन के मन-मस्तिष्क में बसे हैं, आजादी के इतने वर्षों बाद भी जनता उनको भूल नहीं पाई है। जन-जन के कंठहार और साहस व शौर्य की प्रतिमूर्ति नेताजी सुभाषचंद्र बोस की प्रेरक जीवन-कथा व दुर्लभ चित्रावली।
Gupt Rajvansh Tatha Uska Yug
- Author Name:
Uday Narayan Rai
- Book Type:

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Description:
अपने शिखर काल में गुप्त साम्राज्य गुजरात से लेकर पूरब में बंगाल तक फैला था। सामाजिक, राजनीतिक अव्यवस्था को समाप्त कर, गुप्त राजाओं ने शासन का अनुकरणीय रूप प्रस्तुत किया। यही वजह है कि विदेशी लेखकों ने भी समृद्ध सामाजिक संरचना, बृहत्तर भारत की अवधारणा को क्रियान्वित करने के उनके सफल प्रयासों, धार्मिक सहिष्णुता और अर्थव्यवस्था के सुसंचालन की प्रशंसा की है।
राष्ट्र को विदेशी आक्रान्ताओं से मुक्त करने के लिए भी गुप्त शासकों की उपलब्धियों को उल्लेखनीय माना जाता है। कुषाणों और शकों के उन्मूलन तथा हूणों को पराजित करके उन्होंने अपनी सीमाओं को सुरक्षित किया।
यह पुस्तक विभिन्न ऐतिहासिक और साहित्यिक स्रोतों के साथ-साथ इस समय की पुस्तकों, यात्रा-वृत्तान्तों, शिलालेखों और मुद्राओं से प्राप्त साक्ष्यों की रोशनी में गुप्त सम्राटों और उनके समय का सहायक-सुग्राह्य वर्णन करती है।
विशेष तौर पर छात्रों के लिए तैयार की गई इस पुस्तक में इस समूचे काल को क्रमश: तथा उपलब्ध सूचनाओं को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया गया है। स्कन्दगुप्त की मृत्यु के पश्चात् गुप्त साम्राज्य के पतन के कारणों और उसके बाद की परिस्थितियों पर भी प्रकाश डाला गया है। संस्कृत, पालि, प्राकृत आदि भाषाओं में उपलब्ध सामग्री के आधार पर लिखी गई यह पुस्तक इतिहास के क्षेत्रों के लिए अत्यन्त उपयोगी सिद्ध हुई है।
Yashpal Ka Viplav-Vol. 4
- Author Name:
Yashpal
- Book Type:

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Description:
‘यशपाल का विप्लव’-4 में संकलित लेख स्वातंत्र्योत्तर भारत के लगभग सभी पहलुओं पर मंत्रणा करते दिखते है। फिर चाहे मुद्दा साहित्य, संस्कृति और भाषा का हो, कांग्रेसवाद बनाम मार्क्सवाद का हो, या एक नयी वैश्विक व्यवस्था में भारत की छवि और कर्तव्यों का हो। यहाँ एक ऐसी विस्तृत और समावेशी तस्वीर उभरती है जिसे किसी एक उपन्यास या कई कहानियों में भी समेटना नामुमकिन है। इस लिहाज़ से 'विप्लव' का चौथा भाग भारत के बौद्धिक इतिहास की प्रस्तावना उकेरता है—एक ऐसी पृष्ठभूमि जो आजादी से लेकर अबतक हमारे सामाजिक जीवन को प्रभावित-पोषित करता आई है।
इन लेखों में यशपाल एक दुस्साहसी संपादक के रूप में निखरते हैं जो अपनी लेखनी में तटस्थ पत्रकारिता, तथ्यपरक विवेचना और साहित्यिक स्वायत्तता की एक अनूठी मिसाल प्रस्तुत करता है। शैली और भाषा का एक ऐसा नमूना जो आज के दौर में बेहद प्रासंगिक है। यह कहना उचित होगा कि यशपाल का साहित्य और उनकी पत्रकारिता, दोनों क्रांतिकारी संघर्ष की बौद्धिक उपज हैं। और एक दूसरे के पूरक भी हैं। इसलिए यह किताब हिंदी साहित्य और भारतीय इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए अनिवार्य है।
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