In Era of Modi
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This book is a collection of well researched 66 articles of R.K. Sinha. The writer has taken special care to see to it that there is no deviation from the theme of the subject written about. This is not the only introduction of the book. I would like to narrate a short story to unfold R.K. Sinha’s background as a journalist. I was in Patna some time back. I rang up my old friend and colleague Surendra Kishore and visited his new house. Rather calling him to meet me at some central place in Patna, I preferred to visit him at his new house. The reason was, Surendra Kishore is one of few journalists who has his ‘reference library’ built over decades with great care and interest. I wanted to see it. When we were in conversation, it was difficult to miss reference of ‘Yathavat’, a fortnightly magazine in Hindi published from Delhi which I edit and R.K. Sinha is its Chairman. When Sinha’s name cropped up in discussion, Surendra Kishore recalled an incident, some 50 years ago which proved a turning point in the life of Suendraji. In 1960s, R.K. Sinha, who wrote with his full name in credit line as ‘Ravindra Kishore Sinha’ was an icon for journalists then. There was flow and consistency in R.K. Sinha’s writings. Impressed by Sinha’s style of journalism, Surendraji added Kishore in his surname and from ‘Surendra Akela’ he became Surendra Kishore. —Rambahadur Rai
Read moreAbout the Book
This book is a collection of well researched 66 articles of R.K. Sinha. The writer has taken special care to see to it that there is no deviation from the theme of the subject written about.
This is not the only introduction of the book. I would like to narrate a short story to unfold R.K. Sinha’s background as a journalist. I was in Patna some time back. I rang up my old friend and colleague Surendra Kishore and visited his new house. Rather calling him to meet me at some central place in Patna, I preferred to visit him at his new house. The reason was, Surendra Kishore is one of few journalists who has his ‘reference library’ built over decades with great care and interest. I wanted to see it.
When we were in conversation, it was difficult to miss reference of ‘Yathavat’, a fortnightly magazine in Hindi published from Delhi which I edit and R.K. Sinha is its Chairman. When Sinha’s name cropped up in discussion, Surendra Kishore recalled an incident, some 50 years ago which proved a turning point in the life of Suendraji.
In 1960s, R.K. Sinha, who wrote with his full name in credit line as ‘Ravindra Kishore Sinha’ was an icon for journalists then. There was flow and consistency in R.K. Sinha’s writings. Impressed by Sinha’s style of journalism, Surendraji added Kishore in his surname and from ‘Surendra Akela’ he became Surendra Kishore.
—Rambahadur Rai
Book Details
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ISBN9789353220631
-
Pages280
-
Avg Reading Time9 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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'हिन्द स्वराज’ पाठक और सम्पादक के बीच बातचीत की शैली में लिखा गया है। लन्दन प्रवास के दौरान गांधी जिन क्रान्तिमार्गी अराजकतावादियों से मिले थे उनमें दामोदर विनायक सावरकर, टी.एस.एस. राजन, वीरेन्द्र नाथ चट्टोपाध्याय, वी.वी.एस. अय्यर और डॉ. प्राणजीवन मेहता प्रमुख थे। वस्तुत: 'हिन्द स्वराज’ स्वयं गांधी के शब्दों में डॉ. प्राणजीवन मेहता से हुई बातचीत की लगभग जस की तस प्रस्तुति है। इस रहस्य का उद्घाटन उन्होंने 21 फरवरी, सन् 1940 को बंगाल की मलिकंदा की बैठक में किया था। डॉ. प्राणजीवन दास जगजीवन दास मेहता (1864-1932) बम्बई के ग्रांट मेडिकल कॉलेज के स्नातक थे। बू्रसेल्स से एम.डी. और लन्दन से बैरिस्टरी की उपाधियाँ अर्जित करने के बाद सन् 1889 में हिन्दुस्तान लौट आए थे। यहाँ गुजरात के ईडर रियासत के मुख्य चिकित्सा अधिकारी और बाद में दीवान के पद पर रहने के बाद वह रंगून (बर्मा) चले गए थे।
जब सन् 1909 में गांधी लन्दन पहुँचे थे तो डॉ. मेहता संयोग से वहीं थे। एक महीने दोनों साथ एक होटल में रहे थे। गांधी से डॉ. मेहता लगभग पाँच साल बड़े थे और उनके प्रति गहरा स्नेह भाव रखते थे। स्वयं गांधी के शब्दों में वह उन्हें (गांधी को) मूर्ख और भावुक मानते थे। अपने समय की चिकित्सा और क़ानून की उच्चतम उपाधियों से लैस डॉ. मेहता एक प्रबल बुद्धिवादी तार्किक थे। गांधी उन्हें क्रान्तिकामी अराजकतावादियों में प्रमुख मानते थे। जो विचार बिन्दु 'हिन्द स्वराज’ के विषय बने, उन पर दोनों के बीच लगभग एक माह तक विचार-विमर्श चलता रहा। अन्तत: डॉ. मेहता गांधी के विचारों से सहमत हो गए। गांधी को पहले मूर्ख और भावुक समझनेवाले उन्हीं डॉ. प्राणजीवन मेहता ने 28 अगस्त, सन् 1912 को रंगून के लिए पोर्ट सईद पर जहाज़ की प्रतीक्षा करते हुए हिन्दुस्तान में गोपाल कृष्ण गोखले को लिखा कि मनुष्यता और मातृभूमि के उत्थान के लिए गांधी जैसे विरल व्यक्तित्व इस पृथ्वी पर यदा-कदा ही अवतरित होते हैं।
—वीरेन्द्र कुमार बरनवाल
Vande Matram
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Milind Prabhakar Sabnees
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वंदे मातरम् ऋषि बंकिमचंद्र की अलौकिक काव्य प्रतिभा की अभिव्यक्ति है। वैदिक काल से अर्वाचीन काल तक मातृभूमि के प्रति हमारे मन में बसनेवाले अनन्य प्र्रेम का अव्यक्त रूप यानी वंदे मातरम्! मातृभूमि के प्रति यह प्रेम शाश्वत है, चिरंतन है। जिस भूमि ने मुझे जन्म दिया, जिसने मेरा पालन-पोषण किया, मुझे समृद्धता दी और अंत में जिस भूमि में मैं मिल जाने वाला हूँ, वह भूमि यानी यह हमारी भूमाता, मातृभूमि! उसे हमारा शत-शत प्रणाम! भारतीय संस्कृति में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त मातृपूजन, भूमिपूजन, इस जगन्माता का पूजन इन सबके प्रतीक बने शब्द हैं ‘वंदे मातरम्’! मातृभूमि के प्रति यह प्रेम प्रत्येक व्यक्ति के मन में सहज-स्वाभाविक होता है। जैसा अपनी जननी-माता के प्रति होता है ठीक वैसा ही! वह प्रेम हम प्रत्येक के हृदय में है। उस पर केवल निराशा के पुट चढ़े हैं, जिन्हें दूर हटाना होगा। अंतरतम की तह से ‘वंदे मातरम्’ के उच्चारण से उन्हें निश्चय ही दूर किया जा सकता है। वंदे मातरम्!!
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