Apani Sharton Per
About the book
शरद पवार भारत की सर्वाधिक प्रभावशाली राजनैतिक हस्तियों में गण्य-मान्य हैं। पाँच दशक लम्बे अपने राजनैतिक जीवन में उन्होंने कभी कोई चुनाव नहीं हारा। चार बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे। देश के रक्षामंत्री और फिर कृषि मंत्री के रूप में भी अपनी अमिट छाप छोड़ी। दो मौक़े ऐसे भी आए जब वे भारत के प्रधानमंत्री हो सकते थे। लोकप्रियता के ऊपर नीति और व्यावहारिकता को तरजीह देते हुए उन्होंने अक्सर सोच की नई धारा बनाई और अपने प्रशासनिक कौशल तथा सामंजस्यपूर्ण राजनीति के लिए प्रशंसा के पात्र बने। वे भारत और महाराष्ट्र के इतिहास को साठ के दशक से देख रहे हैं। इस पुस्तक में उन्होंने गठबन्धन की राजनीति, कांग्रेस के भीतर लोकतंत्र के क्षरण, कृषि और उद्योग की स्थिति और भावी भारत के लिए सामाजिक समरसता तथा उदार दृष्टिकोण की अहमियत पर अपने विचार प्रकट किए हैं। पुस्तक में वे देश पर आए संकट के कुछ क्षणों पर भी हमें दुर्लभ जानकारी देते चलते हैं, जिनमें आपातकाल और देश की क्षेत्रीय तथा राष्ट्रीय राजनीति पर उसके प्रभाव; 1991 में चन्द्रशेखर सरकार का पतन; राजीव गांधी और एच.एस. लोंगोवाल के बीच हुआ पंजाब समझौता; बाबरी मस्जिद ध्वंस; 1993 के मुम्बई दंगे; लातूर का भूकम्प; एनरॉन विद्युत परियोजना विवाद और श्रीमती सोनिया गांधी द्वारा प्रधानमंत्री पद न लेने का फ़ैसला आदि निर्णायक महत्त्व के मुद्दे शामिल हैं। भारतीय राजनीति के कुछ बड़े नामों का रोमांचकारी आकलन भी उन्होंने किया है, जिससे इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी, वाई.बी. चव्हाण, मोरारजी देसाई, बीजू पटनायक, अटल बिहारी वाजपेयी, चन्द्रशेखर, पी.वी. नरसिम्हा राव, जॉर्ज फर्नांडीज और बाल ठाकरे के व्यक्तित्वों पर नई रोशनी पड़ती है। 'अपनी शर्तों पर’ में न सिर्फ़ देश के सबसे अनुभवी और प्रभावशाली नेताओं में से एक, शरद पवार, के अन्तर्दृष्टिपूर्ण संस्मरण हैं, बल्कि इस पुस्तक से हमें भारत के आधुनिक इतिहास को भी समझने का अवसर मिलता है।
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About the Book
शरद पवार भारत की सर्वाधिक प्रभावशाली राजनैतिक हस्तियों में गण्य-मान्य हैं। पाँच दशक लम्बे अपने राजनैतिक जीवन में उन्होंने कभी कोई चुनाव नहीं हारा। चार बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे। देश के रक्षामंत्री और फिर कृषि मंत्री के रूप में भी अपनी अमिट छाप छोड़ी। दो मौक़े ऐसे भी आए जब वे भारत के प्रधानमंत्री हो सकते थे। लोकप्रियता के ऊपर नीति और व्यावहारिकता को तरजीह देते हुए उन्होंने अक्सर सोच की नई धारा बनाई और अपने प्रशासनिक कौशल तथा सामंजस्यपूर्ण राजनीति के लिए प्रशंसा के पात्र बने।
वे भारत और महाराष्ट्र के इतिहास को साठ के दशक से देख रहे हैं। इस पुस्तक में उन्होंने गठबन्धन की राजनीति, कांग्रेस के भीतर लोकतंत्र के क्षरण, कृषि और उद्योग की स्थिति और भावी भारत के लिए सामाजिक समरसता तथा उदार दृष्टिकोण की अहमियत पर अपने विचार प्रकट किए हैं।
पुस्तक में वे देश पर आए संकट के कुछ क्षणों पर भी हमें दुर्लभ जानकारी देते चलते हैं, जिनमें आपातकाल और देश की क्षेत्रीय तथा राष्ट्रीय राजनीति पर उसके प्रभाव; 1991 में चन्द्रशेखर सरकार का पतन; राजीव गांधी और एच.एस. लोंगोवाल के बीच हुआ पंजाब समझौता; बाबरी मस्जिद ध्वंस; 1993 के मुम्बई दंगे; लातूर का भूकम्प; एनरॉन विद्युत परियोजना विवाद और श्रीमती सोनिया गांधी द्वारा प्रधानमंत्री पद न लेने का फ़ैसला आदि निर्णायक महत्त्व के मुद्दे शामिल हैं। भारतीय राजनीति के कुछ बड़े नामों का रोमांचकारी आकलन भी उन्होंने किया है, जिससे इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी, वाई.बी. चव्हाण, मोरारजी देसाई, बीजू पटनायक, अटल बिहारी वाजपेयी, चन्द्रशेखर, पी.वी. नरसिम्हा राव, जॉर्ज फर्नांडीज और बाल ठाकरे के व्यक्तित्वों पर नई रोशनी पड़ती है।
'अपनी शर्तों पर’ में न सिर्फ़ देश के सबसे अनुभवी और प्रभावशाली नेताओं में से एक, शरद पवार, के अन्तर्दृष्टिपूर्ण संस्मरण हैं, बल्कि इस पुस्तक से हमें भारत के आधुनिक इतिहास को भी समझने का अवसर मिलता है।
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 1st
- Publication year
- 2017
- Weight
- 378 grams
- ISBN-13
- 9788126729890
- Pages
- 312
- Reading time
- ~10 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 13.5 × 21.5 cm
- Language
- Hindi
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