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About the book
इस संकलन की कहानियाँ नारी के उस मनोजगत को अभिव्यक्त करती हैं जिसमें बदलाव की एक प्रक्रिया निरन्तर चल रही है और अपने निर्णय ख़ुद लेने की दिशा में बढ़ती हुई वह यह भी साबित कर रही है कि स्त्रियाँ केवल भावनाओं और संवेदनाओं की प्रतिमूर्ति ही नहीं होतीं, वे समाज में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाने में समर्थ हैं। लेखिका ने बिना बड़बोले नारी-विमर्श और नारी सशक्तीकरण के शोर-शराबे के इन कहानियों को मानवीय संवेदनाओं के धरातल पर उस सामाजिकता के साथ सम्भव किया है जो हमारे समकालीन समाज की पहचान है। इसी वजह से ये कहानियाँ सहज, स्वाभाविक बनकर सर्वग्राही हो सकी हैं। पुरुषप्रधान समाज द्वारा स्थापित पूजनीयता और दैवीयता जैसी धारणाओं की लक्ष्मण रेखाओं को उलाँघकर आज की नारी एक व्यावहारिक इकाई के रूप में उभरकर आ रही है। थोपी गई पवित्रता के नाम पर आज वह पुनर्विवाह के लिए भी किसी का मुँह नहीं देखती। इन कहानियों के आईने से अपने समाज को देखें तो पता चलता है कि मैथिलीशरण गुप्त की पंक्ति ‘आँचल में है दूध और आँखों में पानी’ की नारी-मूर्ति अब ज़्यादा अर्थ नहीं रखती। ये स्त्रियाँ अपने पुत्रों के समक्ष अपने द्वारा किए गए त्याग और दी गई ममता का प्रत्युत्तर भी माँगती हैं। नारी जगत को एक नए दृष्टिकोण के साथ अभिव्यक्त करने वाली ये कहानियाँ पाठक को आरम्भ से अन्त तक बाँधे रखने की क्षमता से लैस हैं।
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About the Book
इस संकलन की कहानियाँ नारी के उस मनोजगत को अभिव्यक्त करती हैं जिसमें बदलाव की एक प्रक्रिया निरन्तर चल रही है और अपने निर्णय ख़ुद लेने की दिशा में बढ़ती हुई वह यह भी साबित कर रही है कि स्त्रियाँ केवल भावनाओं और संवेदनाओं की प्रतिमूर्ति ही नहीं होतीं, वे समाज में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाने में समर्थ हैं। लेखिका ने बिना बड़बोले नारी-विमर्श और नारी सशक्तीकरण के शोर-शराबे के इन कहानियों को मानवीय संवेदनाओं के धरातल पर उस सामाजिकता के साथ सम्भव किया है जो हमारे समकालीन समाज की पहचान है। इसी वजह से ये कहानियाँ सहज, स्वाभाविक बनकर सर्वग्राही हो सकी हैं।
पुरुषप्रधान समाज द्वारा स्थापित पूजनीयता और दैवीयता जैसी धारणाओं की लक्ष्मण रेखाओं को उलाँघकर आज की नारी एक व्यावहारिक इकाई के रूप में उभरकर आ रही है। थोपी गई पवित्रता के नाम पर आज वह पुनर्विवाह के लिए भी किसी का मुँह नहीं देखती। इन कहानियों के आईने से अपने समाज को देखें तो पता चलता है कि मैथिलीशरण गुप्त की पंक्ति ‘आँचल में है दूध और आँखों में पानी’ की नारी-मूर्ति अब ज़्यादा अर्थ नहीं रखती। ये स्त्रियाँ अपने पुत्रों के समक्ष अपने द्वारा किए गए त्याग और दी गई ममता का प्रत्युत्तर भी माँगती हैं। नारी जगत को एक नए दृष्टिकोण के साथ अभिव्यक्त करने वाली ये कहानियाँ पाठक को आरम्भ से अन्त तक बाँधे रखने की क्षमता से लैस हैं।
Book details
- Format
- Hardbound
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 1st
- Publication year
- 2011
- Weight
- 274 grams
- ISBN-13
- 9788126720200
- Pages
- 128
- Reading time
- ~4 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14 × 22 cm
- Language
- Hindi
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