Prabandhan Ke Gurumantra
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प्रबन्धन आत्म-विकास की एक सतत प्रक्रिया है। अपने को व्यवस्थित-प्रबन्धित किए बिना आदमी दूसरों को व्यवस्थित-प्रबन्धित करने में सफल नहीं हो सकता, चाहे वे दूसरे लोग घर के सदस्य हों या दफ़्तर अथवा कारोबार के। इस प्रकार आत्म-विकास ही घर-दफ़्तर, दोनों की उन्नति का मूल है। इस लिहाज़ से देखें, तो प्रबन्धन का ताल्लुक़ कम्पनी-जगत के लोगों से ही नहीं, मनुष्य मात्र से है। वह इनसान को बेहतर बनाने की कला है, क्योंकि बेहतर इनसान ही बेहतर कर्मचारी, अधिकारी, प्रबन्धक या कारोबारी हो सकता है।</p> <p>‘प्रबन्धन के गुरुमंत्र’ में विद्वान् लेखक ने ‘व्यक्तिगत विकास’, ‘औद्योगिक सम्बन्ध’ और ‘निर्णयकारिता’ पर विभिन्न आयामों से विचार किया है। लेखक के अनुसार अपनी क्षमताओं की पहचान, अच्छी आदतों का विकास, निरन्तर ज्ञान-वृद्धि और अनुशासन ऐसे मूल्य हैं जिन पर चलकर आप एक सफल प्रबन्धक बन सकते हैं। कर्मचारी को प्रतिबद्ध कैसे बनाया जाए, असहमति को कैसे सुफलदायक बनाया जा सकता है और अनिर्णय किस तरह घातक हो सकता है, इन बिन्दुओं पर भी इस पुस्तक में विचार किया गया है।</p> <p>प्रबन्धकीय कौशल व क्षमता के विकास हेतु अवश्यमेव पढ़ी जानेवाली पुस्तक।
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प्रबन्धन आत्म-विकास की एक सतत प्रक्रिया है। अपने को व्यवस्थित-प्रबन्धित किए बिना आदमी दूसरों को व्यवस्थित-प्रबन्धित करने में सफल नहीं हो सकता, चाहे वे दूसरे लोग घर के सदस्य हों या दफ़्तर अथवा कारोबार के। इस प्रकार आत्म-विकास ही घर-दफ़्तर, दोनों की उन्नति का मूल है। इस लिहाज़ से देखें, तो प्रबन्धन का ताल्लुक़ कम्पनी-जगत के लोगों से ही नहीं, मनुष्य मात्र से है। वह इनसान को बेहतर बनाने की कला है, क्योंकि बेहतर इनसान ही बेहतर कर्मचारी, अधिकारी, प्रबन्धक या कारोबारी हो सकता है।</p>
<p>‘प्रबन्धन के गुरुमंत्र’ में विद्वान् लेखक ने ‘व्यक्तिगत विकास’, ‘औद्योगिक सम्बन्ध’ और ‘निर्णयकारिता’ पर विभिन्न आयामों से विचार किया है। लेखक के अनुसार अपनी क्षमताओं की पहचान, अच्छी आदतों का विकास, निरन्तर ज्ञान-वृद्धि और अनुशासन ऐसे मूल्य हैं जिन पर चलकर आप एक सफल प्रबन्धक बन सकते हैं। कर्मचारी को प्रतिबद्ध कैसे बनाया जाए, असहमति को कैसे सुफलदायक बनाया जा सकता है और अनिर्णय किस तरह घातक हो सकता है, इन बिन्दुओं पर भी इस पुस्तक में विचार किया गया है।</p>
<p>प्रबन्धकीय कौशल व क्षमता के विकास हेतु अवश्यमेव पढ़ी जानेवाली पुस्तक।
Book Details
-
ISBN9788183611404
-
Pages176
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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प्रबन्धन आत्म-विकास की एक सतत प्रक्रिया है। अपने को व्यवस्थित-प्रबन्धित किए बिना आदमी दूसरों को व्यवस्थित-प्रबन्धित करने में सफल नहीं हो सकता, चाहे वे दूसरे लोग घर के सदस्य हों या दफ़्तर अथवा कारोबार के। इस प्रकार आत्म-विकास ही घर-दफ़्तर, दोनों की उन्नति का मूल है। इस लिहाज़ से देखें, तो प्रबन्धन का ताल्लुक़ कम्पनी-जगत के लोगों से ही नहीं, मनुष्य मात्र से है। वह इनसान को बेहतर इनसान बनाने की कला है, क्योंकि बेहतर इनसान ही बेहतर कर्मचारी, अधिकारी, प्रबन्धक या कारोबारी हो सकता है।
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‘आदर्श प्रबन्धन के सूक्त’ में संकलित आलेखों को पाँच खंडों में विभाजित किया गया है—व्यक्तित्व-विकास, कैरियर निर्माण, औद्योगिक सम्बन्ध, समय-प्रबन्धन और कौशल-विकास। इस पुस्तक से आप अपनी व्यक्तिगत क्षमताओं की लगातार जाँच-परख और आशावाद की उपयोगिता को समझ सकते हैं। साथ ही ख़ुश रहने, अपनी भीतरी शक्तियों के विकास, अपनी सामर्थ्य के भरसक उपयोग और सटीक लक्ष्य-निर्धारण की व्यावसायिक उपादेयता का आकलन कर सकते हैं। इसके अलावा संघर्षों की महत्ता, पेशा बदलने से सफलता, सलाहकार व कार्यपालक के आपसी रिश्तों, और साख आदि विषयों पर भी इसमें प्रकाश डाला गया है।
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प्रबन्धन आत्म-विकास की एक सतत प्रक्रिया है। अपने को व्यवस्थित-प्रबन्धित किए बिना आदमी दूसरों को व्यवस्थित-प्रबन्धित करने में सफल नहीं हो सकता, चाहे वे दूसरे लोग घर के सदस्य हों या दफ़्तर अथवा कारोबार के। इस प्रकार आत्म-विकास ही घर-दफ़्तर, दोनों की उन्नति का मूल है। इस लिहाज़ से देखें, तो प्रबन्धन का ताल्लुक़ कम्पनी-जगत के लोगों से ही नहीं, मनुष्य मात्र से है। वह इनसान को बेहतर बनाने की कला है, क्योंकि बेहतर इनसान ही बेहतर कर्मचारी, अधिकारी, प्रबन्धक या कारोबारी हो सकता है।
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"वालेस डी. वॉटल्स ने संसार को सकारात्मक सोच की शक्ति से परिचित कराया। अपनी पुस्तक में वॉटल्स मानव मन की शक्ति पर जोर देते हैं कि हमारे सोचने का तरीका धन को हमारे करीब ला सकता है या उसे दूर कर सकता है। उनका कहना है कि ऐसे कुछ नियम हैं, जिनका धन कमाने की प्रक्रिया पर नियंत्रण होता है। एक बार इन नियमों का पालन कर लिया जाए तो कोई भी व्यक्ति निश्चित रूप से अमीर बन सकता है। अतः धन कमाने के नियम को उनसे जानिए, अमीर बनने के रहस्य को जानिए, जिसकी शुरुआत आप जहाँ हैं, वहीं से होती है और जो कुछ आपके पास है, उसी से होती है। अमीर बनने का विज्ञान इस रहस्य को बताता है कि दौलत को व्यावहारिक तरीके से, इच्छा के अनुसार और किसी प्रकार की होड़ किए बिना ही, जीवन के साथ स्नेह और सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखकर हासिल किया जा सकता है। अमीर बनने का यह विज्ञान के 100 वर्षों से भी अधिक समय बाद भी प्रासंगिक बना हुआ है। जब तक किसी व्यक्ति के पास पर्याप्त पैसा नहीं है, तब तक वह अपनी प्रतिभा या सोच के सर्वोच्च स्तर तक नहीं पहुँच सकता है, क्योंकि मन और प्रतिभा के विकास के लिए उसके पास इस्तेमाल की चीजें होनी चाहिए, और जब तक उसके पास इनके लिए पैसा नहीं होगा, तब तक वह इन्हें खरीद नहीं सकता। "
Atalji Ki Prerak Kahaniyan
- Author Name:
Dr. Rashmi
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"एक दोपहर अटलजी और दीनदयालजी जमीन पर चटाई बिछाकर लेट गए। वहीं सिराहने कुछ ईंटें रखी हुई थीं। दोनों ने उन्हीं ईंटों को तकिए की तरह अपने सिर के नीचे लगा लिया। उस समय भारत प्रेस के हिसाब-किताब का काम श्री राधेश्याम कपूरजी देखा करते थे। वैसे तो उनकी अमीनाबाद में अपनी दुकान भी थी, लेकिन वे उसमें कम ही बैठते, क्योंकि उनका दिल तो भारत प्रेस में ही लगा रहता था।...तो अचानक वे आ गए और दोनों को ऐसे सोता देख द्रवित हो उठे, जबकि सच तो यह है कि अटलजी और दीनदयालजी को किसी भी प्रकार का कोई कष्ट महसूस ही नहीं हुआ था, वे दोनों तो थकान के बाद की नींद का आनंद ले रहे थे। बाद में तो यह अकसर ही होने लगा। कोई भी सोता तो उन्हीं ईंटों का तकिया लगा लेता। उन दिनों संघ की शाखा में रोज कबड्डी खेली जाती थी। अटलजी को भी कबड्डी खेलना बड़ा अच्छा लगता था, लेकिन वे ठीक से खेल ही नहीं पाते थे। खेल के नियम तो सारे जानते थे, लेकिन दरअसल कारण यह था कि उन दिनों वे बहुत दुबले-पतले हुआ करते थे, इसलिए वे जिसके भी पाले में आते, उस पाले के स्वयंसेवक अपना सिर पकड़ लेते। —इसी संग्रह से भारत रत्न अटलजी जननायक थे, कवि-साहित्यकार थे, सबको साथ लेकर चलने की अद्भुत क्षमता लिये संवेदना से भरपूर एक महान् विभूति थे। उनकी स्मृतियाँ सँजोने का एक विनम्र उपक्रम है यह पुस्तक, जो पाठकों को प्रेरित करेगी। "
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