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'सोच' एक शब्द होने के साथ-साथ एक भावना भी है। 'सोच' एक ऐसा भाव है, जिसके माध्यम से सदैव ही कोई भी किसी भी विषय का मनन करते हुए एक निर्णायक स्थिति तक पहुंच सकता है। ‘सोच’ विषय पर इस बात का सदैव ही स्मरण रखा जाना चाहिए कि एक स्वस्थ सोच, स्वस्थ चिंतन व मनन से ही मनुष्य के चरित्र का एवं उसके भविष्य का निर्माण होता हैइसलिए ही हमें किसी भी प्रकार के मनन के समय गम्भीरतापूर्वक सकारात्मक सोच पर ही अपने ध्यान को केंद्रित करना चाहिए। किसी के भी दृष्टिकोण से कुछ भी सही या गलत हो सकता है, किन्तु विचारणीय तो यह है कि आप की दृष्टि में क्या सही है। कोई भी दूसरे की सोच या कहे हुए पर ही निर्भर नहीं रह सकता ! सभी के पास अपनी बुद्धि है। अपना मत है। अपनी सोच है। विचारधारा है। हर कोई किसी भी विषय पर भली भांती सोच विचार कर सही निर्णय ले पाने में सक्षम है। तो फिर किसी द्वारा भी किसी के भी दृष्टिकोण पर ही निर्भर क्यों रहा जाए ? इस प्रकार की स्थिति में एक बात अवश्य ही स्मरण रखी जानी चाहिए कि किसी भी विचार या मत की उत्पत्ति या प्रस्तुति से पूर्व तो उसका कोई अस्तित्व नहीं था। जब किसी दूसरे की सोच से ही इसकी उत्पत्ति हुई है तो आपकी सोच से उसमें उचित परिवर्तन भी संभावित हो सकता है। सदैव के लिए कोई दूसरा ही सही नहीं हो सकता, आप भी सही हो सकते हैं। ऎसी बात को सदैव स्मरण रखा ही जाना चाहिए।
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'सोच' एक शब्द होने के साथ-साथ एक भावना भी है। 'सोच' एक ऐसा भाव है, जिसके माध्यम से सदैव ही कोई भी किसी भी विषय का मनन करते हुए एक निर्णायक स्थिति तक पहुंच सकता है। ‘सोच’ विषय पर इस बात का सदैव ही स्मरण रखा जाना चाहिए कि एक स्वस्थ सोच, स्वस्थ चिंतन व मनन से ही मनुष्य के चरित्र का एवं उसके भविष्य का निर्माण होता हैइसलिए ही हमें किसी भी प्रकार के मनन के समय गम्भीरतापूर्वक सकारात्मक सोच पर ही अपने ध्यान को केंद्रित करना चाहिए।
किसी के भी दृष्टिकोण से कुछ भी सही या गलत हो सकता है, किन्तु विचारणीय तो यह है कि आप की दृष्टि में क्या सही है। कोई भी दूसरे की सोच या कहे हुए पर ही निर्भर नहीं रह सकता ! सभी के पास अपनी बुद्धि है। अपना मत है। अपनी सोच है। विचारधारा है। हर कोई किसी भी विषय पर भली भांती सोच विचार कर सही निर्णय ले पाने में सक्षम है। तो फिर किसी द्वारा भी किसी के भी दृष्टिकोण पर ही निर्भर क्यों रहा जाए ?
इस प्रकार की स्थिति में एक बात अवश्य ही स्मरण रखी जानी चाहिए कि किसी भी विचार या मत की उत्पत्ति या प्रस्तुति से पूर्व तो उसका कोई अस्तित्व नहीं था। जब किसी दूसरे की सोच से ही इसकी उत्पत्ति हुई है तो आपकी सोच से उसमें उचित परिवर्तन भी संभावित हो सकता है। सदैव के लिए कोई दूसरा ही सही नहीं हो सकता, आप भी सही हो सकते हैं। ऎसी बात को सदैव स्मरण रखा ही जाना चाहिए।
Book Details
-
ISBN9798887337418
-
Pages120
-
Avg Reading Time4 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIN
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