Main Buddha Bol Raha Hoon
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गौतम बुद्ध का जन्म ईसा से 563 वर्ष पहले नेपाल के लुंबिनी नामक वन में हुआ। विद्वानों ने महात्मा बुद्ध के बारे में पहले ही सूचित कर दिया था कि यह बालक या तो चक्रवर्ती राजा होगा या विरक्त होकर संसार का कल्याण करेगा। चूँकि बुद्ध का मन संसार से बिलकुल ही विरक्त रहता था, इसलिए अपने राज-सुखों को त्यागकर तथा मानव जाति एवं जीव-जंतुओं के कल्याण हेतु छोटी अवस्था में ही वे एक दिन आधी रात को अपनी पत्नी व पुत्र को सोया छोड़कर अमरता की खोज में निकल पड़े। बुद्ध को न तो स्वर्ग पाने की लालसा थी, न ही ऐश्वर्य-सुख भोगने की कामना थी; क्योंकि उन्होंने इन सब चीजों पर विजय प्राप्त कर ली थी। हिंदू धर्म में वेदों का जो स्थान है, बौद्ध धर्म में वही स्थान पिटकों का है। भगवान् बुद्ध ने अपने हाथ से कुछ नहीं लिखा। उनके उपदेशों को उनके शिष्यों ने पहले कंठस्थ किया, फिर उन्हें लिख लिया। महात्मा बुद्ध के विचारों का यह ज्ञान-पुंज आपके जीवन को सद्विचारों, सकारात्मकता व रचनात्मकता से भर देगा और जीवन के प्रति आपकी सोच, आपकी दृष्टि को नया आयाम देगा।
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गौतम बुद्ध का जन्म ईसा से 563 वर्ष पहले नेपाल के लुंबिनी नामक वन में हुआ। विद्वानों ने महात्मा बुद्ध के बारे में पहले ही सूचित कर दिया था कि यह बालक या तो चक्रवर्ती राजा होगा या विरक्त होकर संसार का कल्याण करेगा। चूँकि बुद्ध का मन संसार से बिलकुल ही विरक्त रहता था, इसलिए अपने राज-सुखों को त्यागकर तथा मानव जाति एवं जीव-जंतुओं के कल्याण हेतु छोटी अवस्था में ही वे एक दिन आधी रात को अपनी पत्नी व पुत्र को सोया छोड़कर अमरता की खोज में निकल पड़े।
बुद्ध को न तो स्वर्ग पाने की लालसा थी, न ही ऐश्वर्य-सुख भोगने की कामना थी; क्योंकि उन्होंने इन सब चीजों पर विजय प्राप्त कर ली थी। हिंदू धर्म में वेदों का जो स्थान है, बौद्ध धर्म में वही स्थान पिटकों का है। भगवान् बुद्ध ने अपने हाथ से कुछ नहीं लिखा। उनके उपदेशों को उनके शिष्यों ने पहले कंठस्थ किया, फिर उन्हें लिख लिया।
महात्मा बुद्ध के विचारों का यह ज्ञान-पुंज आपके जीवन को सद्विचारों, सकारात्मकता व रचनात्मकता से भर देगा और जीवन के प्रति आपकी सोच, आपकी दृष्टि को नया आयाम देगा।
Book Details
-
ISBN9788199261358
-
Pages136
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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श्रीमद्भगवद्गीता संपूर्ण मानव जगत् के लिए प्रासंगिक है। यह एक ऐसा ग्रंथ है, जिसमें सृष्टि के समस्त आध्यात्मिक पक्षों का समावेश किया गया है| इसमें संगृहीत सात सौ श्लोक सात महाद्वीपों के समान गंभीर हैं, जिन्हें समझकर भारतीय चिंतन का समस्त सार ज्ञात हो सकता है। युद्धभूमि में श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया ज्ञान सार्वभौमिक है । उसमें किसी भी देश, धर्म, जाति के लिए समान रूप से कर्म का संदेश समाहित है । प्रस्तुत पुस्तक श्रीमद्भगवद्गीता के सात सौ श्लोकों का बहुत सुंदर शब्दों में दोहे रूप में रूपांतरण है । उदाहरण के लिए-- यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाssत्मानं सृजाम्यहम्॥ दोहा-- हानि होय जब-जब धरम, अति अधर्म बढ़ जाय। हे भारत ! संसार में, तब-तब प्रकटूँ आय॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥ दोहा-- पापी करूँ विनाश मैं, करूँ साधु उद्धार । युगों-युगों में प्रकटता, धर्म स्थापना सार ॥ मानवीय संबंधों और जीवनमूल्यों को वर्णित करती सरल-सहज कृति, जो हर पाठक के हृदय को छू लेगी और वे 'गीता-ज्ञान' से संपकृत हो जाएँगे।
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