Baal Hanuman - Hindi
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केसरी और अंजना के पुत्र हनुमान का मुख वानर जैसा क्यों है ? हनुमान ने पहाड़ क्यों उठाया ? हनुमान ने स्वर्ण नगरी लंका को क्यों जलाया ? भगवान इंद्र ने उन पर प्रहार क्यों किया ? इस पुस्तक में आपके क्यों के सभी जवाब हैं। आइए हमारे छोटे हनुमान की विशाल और अद्भुत दुनिया में, सुंदर चित्रांकन और सरल भाषा में लिखी यह किताब मज़ेदार है।
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केसरी और अंजना के पुत्र हनुमान का मुख वानर जैसा क्यों है ? हनुमान ने पहाड़ क्यों उठाया ? हनुमान ने स्वर्ण नगरी लंका को क्यों जलाया ? भगवान इंद्र ने उन पर प्रहार क्यों किया ? इस पुस्तक में आपके क्यों के सभी जवाब हैं। आइए हमारे छोटे हनुमान की विशाल और अद्भुत दुनिया में, सुंदर चित्रांकन और सरल भाषा में लिखी यह किताब मज़ेदार है।
Book Details
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ISBN9788119745869
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Pages56
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Avg Reading Time2 hrs
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Age0-11 yrs
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Country of OriginIndia
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- Description: It's one of the oldest books in the world and India's biggest blockbuster bestseller! - But isn't it meant only for religious old people? - But isn't it very long... and, erm, super difficult to read? - But isn't the stuff it talks about way too complex for regular folks to understand? Prepare to be surprised. Roopa Pai's spirited, one-of-a-kind retelling of the epic conversation between Pandava prince Arjuna and his mentor and friend Krishna busts these and other such myths about the Bhagavad Gita. Lucid, thought-provoking and brimming with fun trivia, this book will stay with you long after you have turned the last page.
Shri Ramayana Mahanveshanam : Vols.1-2
- Author Name:
M. Veerappa Moily
- Book Type:

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Description:
अतीत के दीपक से वर्तमान को प्रकाशित करने का प्रयत्न है ‘श्रीरामायण महान्वेषणम्’।
—नीरज जैन प्रतिष्ठित हिन्दी कवि, सतना (म.प्र.)
“I have no doubt that ‘Sri Ramayana Mahanveshanam’ will remain a milestone not only in the history of Kannada literature or Hindi literature, but in the history of Indian literature also. It is his distinct contribution to Ramayana literature.”
—Indira Goswami Professor, Modern Indian Languages & Literary Studies, Delhi University
‘‘मोइली जी को इतनी बड़ी साहित्यिक परियोजना पर सोचने के लिए, उसे पूरा करने के लिए, और भारतीय परम्परा में उसके उचित सन्निवेश के हेतु प्रयास करने के लिए बधाई देना चाहता हूँ...।
—डॉ. वागीश शुक्ल कवि, दार्शनिक, समालोचक तथा प्रोफ़ेसर, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी, नई दिल्ली
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