Sri Aurobindo and Shakespeare
(1)
Author:
Dr. Meenu Sodhi SharmaPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
EnglishCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
800
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In this book an attempt has been made to compare the two legendary writers by comparing the eastern way of thinking with the western way. Shakespeare is amongst the writers Sri Aurobindo holds in high esteem. Sri Aurobindo’s admiration for the great dramatist resulted in obvious Shakespearean influences on him. He adopts for his plays Elizabethan model of drama perfected by Shakespeare’s genius. Shakespeare’s influence is traceable also in Sri Aurobindo’s sonnets. It is said that Sri Aurobindo had Shakespearean literature on his bed-side when he left his mortal remains. Both the great writers were not satisfied by merely holding mirror to the nature but due to their greater and deeper life power, they recreated the human life in its beauty and completeness. Therefore, there is an obvious need to compare and contrast Shakeapeare and Sri Aurobindo so as to bring out affinities that may be there between their creative ideal and vision as well as their poetic and dramatic art, along with the former’s influence on the later. In this book an attempt has been made to fulfill the need and to contribute, in some measure to the appreciation of Sri Aurobindo’s poetry and plays. It also briefly touches upon Indian response to Shakespeare. It focuses mainly on Sri Aurobindo’s numerous insights and critical observations on him. To sum up writings of the two such outstanding writers, who represent two very different ways of thinking. On one hand Shakespeare potrays lot of blood shed, gory tales and a wild kind of poetic justice in his writings, but on the other hand Sri Aurobindo truely follows Indian ethos of non violence or ‘Ahimsa’. The author underlines the stark similarities and differences in both the writer’s exploring their plays and sonnets. The structure of plays and sonnets may be same of both the greatest minds but ethos and personna ingrained in their writings is quite different.
Read moreAbout the Book
In this book an attempt has been made to compare the two legendary writers by comparing the eastern way of thinking with the western way.
Shakespeare is amongst the writers Sri Aurobindo holds in high esteem. Sri Aurobindo’s admiration for the great dramatist resulted in obvious Shakespearean influences on him. He adopts for his plays Elizabethan model of drama perfected by Shakespeare’s genius. Shakespeare’s influence is traceable also in Sri Aurobindo’s sonnets.
It is said that Sri Aurobindo had Shakespearean literature on his bed-side when he left his mortal remains. Both the great writers were not satisfied by merely holding mirror to the nature but due to their greater and deeper life power, they recreated the human life in its beauty and completeness. Therefore, there is an obvious need to compare and contrast Shakeapeare and Sri Aurobindo so as to bring out affinities that may be there between their creative ideal and vision as well as their poetic and dramatic art, along with the former’s influence on the later.
In this book an attempt has been made to fulfill the need and to contribute, in some measure to the appreciation of Sri Aurobindo’s poetry and plays. It also briefly touches upon Indian response to Shakespeare. It focuses mainly on Sri Aurobindo’s numerous insights and critical observations on him. To sum up writings of the two such outstanding writers, who represent two very different ways of thinking. On one hand Shakespeare potrays lot of blood shed, gory tales and a wild kind of poetic justice in his writings, but on the other hand Sri Aurobindo truely follows Indian ethos of non violence or ‘Ahimsa’.
The author underlines the stark similarities and differences in both the writer’s exploring their plays and sonnets. The structure of plays and sonnets may be same of both the greatest minds but ethos and personna ingrained in their writings is quite different.
Book Details
-
ISBN9789394534971
-
Pages296
-
Avg Reading Time10 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Sachin Tendulkar
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- Description: मेरे पिता ने मुझे 11 साल की उम्र में ही आजाद पंछी की तरह छोड़ दिया और मुझसे बोले, ‘‘अपने सपनों का पीछा करो, लेकिन यह शर्त है कि तुम उनको पाने के लिए शॉर्टकट नहीं ढूँढ़ोगे।’’ अपने 24 साल के लंबे कॅरियर के दौरान शायद ही ऐसा कोई क्रिकेट रिकॉर्ड होगा, जो सचिन तेंदुलकर से अछूता रहा हो। टेस्ट और एक दिवसीय मैचों में सबसे ज्यादा रन बनाने के अलावा वे पहले और एकमात्र ऐसे बल्लेबाज बने, जिसने 100 अंतरराष्ट्रीय शतक लगाए और 200 टेस्ट मैचों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। उनकी स्ट्रोक खेलने की विशिष्ट शैली ने उनको ऐतिहासिक हस्ती बना दिया, क्योंकि यह उनकी ही विलक्षण क्षमता थी कि वह दुनिया के किसी भी हिस्से में और मैदान के किसी भी कोने पर गेंद मार सकते थे। बंबई में एक मध्यवर्गीय परिवार में जनमे सचिन ने, जो कि एक शरारती बच्चे थे, बड़े हुए तो दिखाया—एक खिलाड़ी और कप्तान के रूप में कैसे लक्ष्यों को हासिल किया जाता है और कैसे सपनों को सच किया जाता है! हैरत की बात नहीं, खेल के प्रति उनका जुनून, देश के लिए उनके मन में सम्मान और मैदान एवं उससे बाहर उनका शानदार व्यवहार ही वे बातें रहीं, जिन्होंने उनको करोड़ों लोगों का चहेता और आनेवाली पीढ़ी के लिए रोल मॉडल बनाया था। सचिन तेंदुलकर के शिखर को छूने की रोचक और प्रेरणाप्रद यात्रा, उन्हीं की जुबानी। यह पुस्तक न केवल पठनीय है, वरन् असंख्य युवाओं और खेल-प्रेमियों के लिए प्रेरणा का खजाना है।.
Guruji Ki Kheti-Bari
- Author Name:
Vishwanath Tripathi
- Book Type:

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Description:
आलोचक के रूप में अपनी सृजनात्मक अप्रोच के लिए सराहे जानेवाले विश्वनाथ त्रिपाठी की सवा-सराहना बतौर गद्यकार हमेशा ही सुरक्षित रहती है। आलोचना से इतर अपनी हर पुस्तक के साथ उन्होंने ‘दुर्लभ गद्यकार' की अपनी पदवी ऊँची की है। उनकी भाषा और कहाँ चलते-फिरते साकार मनुष्य की प्रतीति देती है। ऐसे कम ही लेखक हैं जिनकी लिखी पंक्तियों के बीच रहते हुए आप एक तनहा पाठक नहीं रह जाते, अपने आसपास किसी की उपस्थिति आपको लगातार महसूस होती है।
इन पृष्ठों में आप राजनीति का वह ज़माना भी देखेंगे जब ‘अनशन, धरना, जुलूस, प्रदर्शन, क्रान्ति, उद्धार-सुधार, विकास, समाजवाद, अहिंसा जैसे शब्दों का अर्थपतन, अनर्थ, अर्थघृणा और अर्थशर्म नहीं हुआ था।’ और विश्वविद्यालय के छात्र मेजों पर मुट्ठियाँ पटक-पटककर मार्क्सवाद पर बहस किया करते थे। जवाहरलाल नेहरू, कृपलानी, मौलाना आज़ाद जैसे राजनीतिक व्यक्तित्वों और डॉ. नागेन्द्र, विष्णु प्रभाकर, बालकृष्ण शर्मा नवीन, शमशेर और अमर्त्य सेन जैसे साहित्यिकों-बौद्धिकों की आँखों बसी स्मृतियों से तारांकित यह पुस्तक त्रिपाठी जी के अपने अध्यापन जीवन के अनेक दिलचस्प संस्मरणों से बुनी गई है। क़िस्म-क़िस्म के पढ़नेवाले यहाँ हैं। हरियाणा से कम्बल ओढ़कर और साथ में दूध की चार बोतलें कक्षा में लेकर आनेवाला विद्यार्थी है तो किरोड़ीमल के छात्र रहे अमिताभ बच्चन, कुलभूषण खरबंदा, दिनेश ठाकुर और राजेन्द्र नाथ भी हैं।
शुरुआत उन्होंने बिस्कोहर से अपने पहले गुरु रच्छा राम पंडित के स्मरण से की है। इसके बाद नैनीताल में अपनी पहली नियुक्ति और तदुपरान्त दिल्ली विश्वविद्यालय में बीते अपने लम्बे समय की अनेक घटनाओं को याद किया है जिनके बारे में वे कहते हैं : ‘याद करता हूँ तो बादल से चले बाते हैं मजमूँ मेरे आगे।’
Jalak
- Author Name:
Shivani
- Book Type:

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Description:
कथाकार और उपन्यासकार के रूप में शिवानी की लेखनी ने स्तरीयता और लोकप्रियता की खाई को पाटते हुए एक नई ज़मीन बनाई थी, जहाँ हर वर्ग और हर रुचि के पाठक सहज भाव से विचरण कर सकते थे। उन्होंने मानवीय संवेदनाओं और सम्बन्धगत भावनाओं की इतने बारीक और महीन ढंग से पुनर्रचना की कि वे अपने समय में सबसे ज़्यादा पढ़े जानेवाले लेखकों में एक होकर रहीं।
कहानी, उपन्यास के अलावा शिवानी ने संस्मरण और रेखाचित्र आदि विधाओं में भी बराबर लेखन किया। अपने सम्पर्क में आए व्यक्तियों को उन्होंने क़रीब से देखा, कभी लेखक की निगाह से तो कभी मनुष्य की निगाह से, और इस तरह उनके भरे-पूरे चित्रों को शब्दों में उकेरा और कलाकृति बना दिया।
‘जालक’ शिवानी के अन्तर्दृष्टिपूर्ण संस्मरणों का संग्रह है जिसमें उन्होंने अपने परिचय के दायरे में आए विभिन्न लोगों और घटनाओं के बहाने से अपनी संवेदना और अनुभवों को स्वर दिया है।
आशा है, शिवानी के कथा-साहित्य के पाठकों को उनकी ये रचनाएँ भी पसन्द आएँगी।
Mrityu Mere Dwar Par
- Author Name:
Khushwant Singh
- Book Type:

- Description: पुस्तक अंग्रेज़ी के मशहूर लेखक खुशवन्त सिंह की पुस्तक ‘डेथ एट माई डोरस्टेप : ओबिट्युअरीज़’ का अनुवाद है जिसमें उन्होंने कई महान हस्तियों को श्रद्धांजलि देते हुए मृत्यु के विषय में अपना नज़रिया व्यक्त किया है। पुस्तक के पहले खंड में उन्होंने दलाई लामा एवं आचार्य रजनीश के मृत्यु के बारे में विचारों को रखा है और बुढ़ापा, मृत्यु का अनुभव, मृत्यु के पश्चात् जीवन और मृतकों से ज्ञान के बारे में काफ़ी दिलचस्प अन्दाज़ में लिखा है। पुस्तक के दूसरे खंड में कई हस्तियों की मृत्यु के पश्चात् लिखी गई श्रद्धांजलियाँ जिनमें जेड.ए. भुट्टो, संजय गांधी, माउंटबेटन, रजनी पटेल, धीरेन भगत, प्रभा दत्त, हरदयाल, मुल्कराज आनन्द, नीरद बाबू, बलवन्त गार्गी, फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’, आर.के. नारायण, प्रोतिमा बेदी, नरगिस दत्त, अमृता शेरगिल, भीष्म साहनी सहित अपनी दादी माँ, राज-विला के छज्जू राम और अपने कुत्ते सिम्बा के अलावा अपने ऊपर भी समाधि लेख लिखा है। इस पुस्तक को पढ़ते हुए खुशवन्त सिंह के चुटीले और खिलंदड़े अन्दाज़ की झलक मिलेगी और उनकी तटस्थता पाठकों को बेहद प्रभावित करेग
Joothan-2
- Author Name:
Omprakash Valmiki
- Book Type:

- Description: जूठन’ ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा है। इसका पहला भाग बरसों पहले प्रकाशित होकर, आज हिन्दी दलित साहित्य और खासकर आत्मकथाओं की शृंखला में एक विशेष स्थान प्राप्त कर चुका है। वाल्मीकि जी अब हमारे बीच नहीं हैं, अपने जीवन-काल में उन्होंने 'जूठन’ के बाद साहित्य, समाज और संवेदना के दायरों में एक लम्बी यात्रा पूरी की। कई कथात्मक और आलोचनात्मक कृतियों के साथ उनके काव्य-संग्रह भी आए। 'जूठन’ का यह दूसरा भाग उनके उसी दौर का आख्यान है। आत्मकथा के इस दूसरे भाग की शुरुआत उन्होंने देहरादून की आर्डिनेंस फैक्ट्री में अपनी नियुक्ति से की है। नई जगह पर अपनी पहचान को लेकर आई समस्याओं के साथ-साथ यहाँ मजदूरों के साथ जुड़ी अपनी गतिविधियों का जिक्र करते हुए उन्होंने अपनी साहित्यिक सक्रियता का भी विस्तार से उल्लेख किया है। सहज, प्रवाहपूर्ण और आत्मीय भाषा में लिखी गई यह पुस्तक देहरादून से जबलपुर और वहाँ से पुन: देहरादून की यात्रा करती हुई शिमला उच्च अध्ययन संस्थान और फिर उनके अस्वस्थ होने तक जाती है। दलित साहित्य के वर्तमान परिदृश्य में 'जूठन’ के इस दूसरे भाग को पढ़ना एक अलग अनुभव है।
Ambedkar : Chitramaya Jeevani
- Author Name:
Rajendra Patoria
- Book Type:

- Description: भारतीय संविधान के पिता डॉ. भीमराव अम्बेडकर की सचित्र जीवनी
Customer Reviews
5 out of 5
Book
26/02/2023
Richa
This book attempts to compare the two illustrious authors by contrasting eastern and western modes of thought. An effort has been made in this book to meet a need and, in a small way, advance understanding of Sri Aurobindo's plays and poems. It also briefly mentions how Shakespeare's plays were received in India. It largely focuses on Sri Aurobindo's multiple discoveries and insightful criticisms of him. To summarise the works of these two exceptional writers, who reflect two very distinct worldviews. The author highlights the striking parallels and contrasts between the two writers' explorations of their plays and sonnets. The two greatest brains may have used the same structures in their plays and sonnets, but their compositions reflect very distinct attitudes and personalities. Talking about the quality of the book and services provided by Rachnaye, I must say it's the best platform to get original copies of the books and not the pirated ones which we usually come across various other platforms/applications.