Paryavaran Sanrakshan
Author:
Yogendra SharmaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
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Price: ₹ 476
₹
595
Available
वर्तमान में बढ़ता प्रदूषण, कम होते वन, घटते वन्य जीव, प्राकृतिक सम्पदा का अत्यधिक दोहन, प्रकृति के संसाधनों की ओर बढ़ती उपभोग की प्रवृत्ति, अवैध एवं अनियोजित ढंग से वनों की कटान, जलवायु परिवर्तन, जनसंख्या वृद्धि, पृथ्वी का अन्धाधुन्ध दोहन, ओजोन परत का क्षरण, तेजाबी वर्षा, ग्लोबल वार्मिंग, जल में अपशिष्ट का 'मिलना, भूस्खलन, सूखा, बाढ़ एवं जैव विविधता पर कुप्रभाव आदि कारकों के कारण पर्यावरण 'असन्तुलित हो रहा है जिससे यह विश्वव्यापी समस्या बन गयी है जो चिन्ताजनक है।</p>
<p>भारतीय संस्कृति सदैव पर्यावरण की पोषक रही है। इसमें पर्यावरण के अवयव तथा जल, आकाश, सूर्य, चन्द्र, वनस्पति एवं कतिपय जीव-जन्तुओं को पूज्य मानने की मान्यताएँ रही हैं जो पर्यावरण के 'संरक्षण से जुड़ी हैं। पर्यावरण का सम्बन्ध केवल संस्कृति से ही नहीं है अपितु संस्कारों तथा सरोकारों से भी है। हमारी संस्कृति में स्वच्छता को भक्ति का स्थान दिया गया है। वृक्ष, वन एवं वनस्पति पृथ्वी के आभूषण और प्रकृति के उपहार हैं और धरती तो माँ है। जब तक मानव प्रकृति का भाग रहता है, प्रकृति उनका संरक्षण करती है। प्रकृति स्वतः पेड़ लगाती रहती है, हमें तो उनका संरक्षण करना है। इस कृति के द्वारा पर्यावरण संरक्षण के प्रति चेतना जगाने का प्रयास किया गया है।
ISBN: 9789389742312
Pages: 176
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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उसके पति ने अपने वैवाहिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए बम्बई उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटा दिया। उसके इस क़दम ने रख्माबाई के संकल्प को और भी दृढ़ कर दिया—देशी परम्पराओं और उपनिवेशीय क़ानून-व्यवस्था के संयुक्त दमन के विरोध का संकल्प।
मुक़दमा 1884 के शुरू में दायर किया गया। अगले वर्ष इसमें हुए पहले फ़ैसले के आते ही इसने एक सामाजिक नाटक का रूप धारण कर लिया।
इस युवा विद्रोहिणी की विजय या पराजय पर एक विकृत पारिवारिक-सामाजिक व्यवस्था का भविष्य टिका हुआ था।
रख्माबाई का विद्रोह एक असाधारण घटना थी। इससे पहले कभी किसी स्त्री ने ऐसे क्रान्तिकारी साहस और संघर्ष-शक्ति का परिचय नहीं दिया था।
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रख्माबाई के विद्रोह से शुरू हुई यह बहस अभी अप्रासंगिक नहीं हुई है, जैसाकि हम इस पुस्तक के उपसंहार में देखेंगे। इस तरह के विद्रोह को आज भी मर्यादाओं के उल्लंघन के रूप में देखा जाता है।
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