Khunte Se Bandha Aadmi
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शेखर की ये कहानियाँ मात्र साहित्य की परंपरा की चौंकानेवाली कहानियाँ नहीं, बल्कि सदियों से चले आ रहे अत्याचार से आगाह करने और विषमता से लड़नेवाली कहानियाँ हैं। यह साहित्य की परंपरा की वे कहानियाँ नहीं, जो घटिया संपादकों और शिविरबद्ध आलोचकों की कृपादृष्टि की मोहताज हों, ये कहानियाँ प्रताडि़त मनुष्य की भयावह स्थितियों की कहानियाँ हैं, जो उस दलित मनुष्य के आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि उसके समग्र अस्तित्व के प्रश्नों को उठातीं और उनका उत्तर माँगती भी हैं और आगे बढ़कर उनका उत्तर देती भी हैं। इसीलिए इन कहानियों में तथाकथित साहित्यिक रचनात्मकता से अलग एक नए अर्थपूर्ण और मूल्यपूर्ण रूप से अपने समय को देखने की अभीप्सा है और यही इन कहानियों की मानवीय मूल्यवत्ता है। और शेखर की कहानियों की यह भी विशेषता है, जो रिपोर्ताज को भी अपनी सहज मानवीय लगन के सहारे एक कथात्मक दस्तावेज में तब्दील कर देती हैं और विधागत कहानियों को ज्यादा बड़े मानवीय सवालों और उनके अर्थों से जोड़ देती हैं। —कमलेश्वर
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शेखर की ये कहानियाँ मात्र साहित्य की परंपरा की चौंकानेवाली कहानियाँ नहीं, बल्कि सदियों से चले आ रहे अत्याचार से आगाह करने और विषमता से लड़नेवाली कहानियाँ हैं। यह साहित्य की परंपरा की वे कहानियाँ नहीं, जो घटिया संपादकों और शिविरबद्ध आलोचकों की कृपादृष्टि की मोहताज हों, ये कहानियाँ प्रताडि़त मनुष्य की भयावह स्थितियों की कहानियाँ हैं, जो उस दलित मनुष्य के आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि उसके समग्र अस्तित्व के प्रश्नों को उठातीं और उनका उत्तर माँगती भी हैं और आगे बढ़कर उनका उत्तर देती भी हैं।
इसीलिए इन कहानियों में तथाकथित साहित्यिक रचनात्मकता से अलग एक नए अर्थपूर्ण और मूल्यपूर्ण रूप से अपने समय को देखने की अभीप्सा है और यही इन कहानियों की मानवीय मूल्यवत्ता है। और शेखर की कहानियों की यह भी विशेषता है, जो रिपोर्ताज को भी अपनी सहज मानवीय लगन के सहारे एक कथात्मक दस्तावेज में तब्दील कर देती हैं और विधागत कहानियों को ज्यादा बड़े मानवीय सवालों और उनके अर्थों से जोड़ देती हैं।
—कमलेश्वर
Book Details
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ISBN9789384344627
-
Pages200
-
Avg Reading Time7 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Sachchidananda Hirananda Vatsyayan 'Ajneya'
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- Description: अज्ञेय का लेखन इतना विपुल और वैविध्यपूर्ण है कि उसमें से उद्धरणों के एक चयन की बात सोचते ही पहला सवाल तो उसकी क्रम-प्रक्रिया को लेकर ही सामने आया। लगभग सभी साहित्यिक विधाओं में उत्कृष्ट लेखन के साथ-साथ अज्ञेय ने मानव-जीवन और समाज से जुड़ी सभी समस्याओं पर भी स्वतन्त्र रूप से सम्यक् विचार किया है। अज्ञेय के लिए न केवल साहित्य बल्कि पूरा मानव-जीवन ही मूल्यान्वेषण की प्रक्रिया है। इस क्रम से आरम्भ करने पर सहज ही केन्द्रीय मूल्य स्वतन्त्रता और उनसे जुड़े सवालों को अलगे चरण में रख पाना उचित लगा और साहित्य क्योंकि मूल्यान्वेषण की प्रक्रिया है, अत: भाषा, साहित्य आदि से जुड़े चिन्तन से चयन किये जाने वाले उद्धरणों का क्रम भी तय हो गया। इस चयन से गुज़रते हुए पाठक को यह महसूस हो सकता है कि अज्ञेय जब किसी दार्शनिक या तर्कशास्त्रीय गुत्थी पर भी विचार करते हैं तो उनका चिन्तन अधिकांशत: किसी अकादेमिक दार्शनिक की तरह का नहीं, बल्कि एक संवेदनात्मक दृष्टि, या कहें कि कवि-दृष्टि से किया गया चिन्तन होता है। अज्ञेय का चिन्तन कवि-दृष्टि का चिन्तन है, अकादेमिक नहीं। शायद, इसलिए इस कवि-दृष्टि के विमर्शात्मक चिन्तन और कविताओं के बीज-संवेदन का अहसास भी सुधी पाठकों को हो सकेगा। पाठक यदि चयन की इन मोटी रेखाओं के सहारे अज्ञेय के चिन्तन और कवि-कर्म की विपुलता, विविधता और सूक्ष्मता में प्रवेश करने की प्रेरणा पा सकें, तो यही इस चयन की सार्थकता होगी। अज्ञेय के कवि-कर्म और चिन्तन के द्वन्द्वों-समाधानों और प्रक्रियाओं-निष्कर्षों में ऐसा बहुत कुछ है जो किसी भी समय के लेखक-पाठक के लिए सदैव प्रासंगिक रहेगा। —प्रस्तावना से
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