Kunnu Kayari Thirinju Nokumpol
(0)
Author:
Vijaya, Sudhakaran RamanthaliPublisher:
Sahitya AkademiLanguage:
MalayalamCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
350
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കുന്നു കയറി തിരിഞ്ഞുനോക്കുമ്പോൾ: ആത്മകഥനങ്ങ ളും ഓർമ്മപ്പുസ്തകങ്ങളും സ്വയം മഹത്വവൽക്കരിക്കു വാനുള്ള ഉപാധികളായി മാറുന്ന ഒരു കാലഘട്ടത്തിൽ ത ന്റെ അനുഭവങ്ങൾക്കും ചെയ്തികൾക്കും നൈതികമായ സാധൂകരണം നൽകാൻ ഒട്ടും ശ്രമിക്കാതെ ഡോ. വിജയ ജീവിതം പറയുന്നു. ഈ കൃതി ഇതിൻ്റെ തുറന്ന പ്രകൃ തംകൊണ്ടുതന്നെ നാനാരീതിയിലുള്ള ചോദ്യങ്ങൾക്ക് പ്രചോദനമാവുന്നുണ്ട്. ചോദ്യങ്ങൾക്കൊന്നിനും ഉത്ത രം നൽകാൻ എഴുത്തുകാരി മുതിരുന്നില്ല എന്നതാണ് ഇ തിന്റെ വൈശിഷ്ട്യം.
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കുന്നു കയറി തിരിഞ്ഞുനോക്കുമ്പോൾ: ആത്മകഥനങ്ങ
ളും ഓർമ്മപ്പുസ്തകങ്ങളും സ്വയം മഹത്വവൽക്കരിക്കു വാനുള്ള ഉപാധികളായി മാറുന്ന ഒരു കാലഘട്ടത്തിൽ ത ന്റെ അനുഭവങ്ങൾക്കും ചെയ്തികൾക്കും നൈതികമായ സാധൂകരണം നൽകാൻ ഒട്ടും ശ്രമിക്കാതെ ഡോ. വിജയ ജീവിതം പറയുന്നു. ഈ കൃതി ഇതിൻ്റെ തുറന്ന പ്രകൃ തംകൊണ്ടുതന്നെ നാനാരീതിയിലുള്ള ചോദ്യങ്ങൾക്ക് പ്രചോദനമാവുന്നുണ്ട്. ചോദ്യങ്ങൾക്കൊന്നിനും ഉത്ത രം നൽകാൻ എഴുത്തുകാരി മുതിരുന്നില്ല എന്നതാണ് ഇ തിന്റെ വൈശിഷ്ട്യം.
Book Details
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ISBN9788119499441
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Pages440
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Avg Reading Time15 hrs
-
Age18+ yrs
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Country of OriginIN
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Shivani
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- Description: कथाकार और उपन्यासकार के रूप में शिवानी की लेखनी ने स्तरीयता और लोकप्रियता की खाई को पाटते हुए एक नई ज़मीन बनाई थी, जहाँ हर वर्ग और हर रुचि के पाठक सहज भाव से विचरण कर सकते थे। उन्होंने मानवीय संवेदना और सम्बन्धगत भावनाओं की इतने बारीक और महीन ढंग से पुनर्रचना की कि वे अपने समय में सबसे ज़्यादा पढ़े जानेवाले लेखकों में एक होकर रहीं। कहानी, उपन्यास के अलावा शिवानी ने संस्मरण और रेखाचित्र आदि विधाओं में भी बराबर लेखन किया। अपने सम्पर्क में आए व्यक्तियों को उन्होंने क़रीब से देखा, कभी लेखक की निगाह से तो कभी मनुष्य की निगाह से, और इस तरह उनके भरे-पूरे चित्रों को शब्दों में उकेरा और कलाकृति बना दिया। इस पुस्तक में ‘गुरुपल्ली’, ‘गुरुदेव की कर्मभूमि’, ‘शान्तिनिकेतन की गुरुपल्ली’, ‘आश्रम के पर्व’, ‘कुछ महत्त्पूर्ण उत्सव’, ‘आश्रम के विकास में गुरुदेव का योग’, ‘गांधीजी और गुरुदेव’, ‘अनेक विभूतियों का आगमन’, ‘श्रीनिकेतन का मेला’, ‘खेलकूद और मनोरंजन’, ‘आश्रमवासियों के लिए गुरुदेव के गीत’, ‘छात्रों का अतिथि-प्रेम’, ‘गुरुदेव की आत्मीयता’, ‘सादा पर कलापूर्ण रहन-सहन’, ‘गुरुर्ब्रह्मा’, ‘ओ रे गृहवासी’, ‘तुई जे पुरुष मानुष रे!’, ‘आश्रम पर काले बदल’ शीर्षक निबन्ध शामिल हैं, जिनका सम्बन्ध लेखिका के शान्तिनिकेतन प्रवास से है। आशा है, शिवानी के कथा-साहित्य के पाठकों को उनकी ये रचनाएँ भी पसन्द आएँगी!
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