Vyatha Kahe Panchali
(0)
Author:
Urvashi Agrawal "Urvi"Publisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Academics-and-references₹
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पाँच पिया स्वीकारे क्यूँ थे। खुद ही भाग बिगाड़े क्यूँ थे। काश विशेधी हो जाती मैं। थोड़ा क्रोधी हो जाती मैं। काश न मेरे हिस्से होते। शुरू नहीं फिर किस्से होते। काश वर्ण को वर लेती मैं। वाणी वश में कर लेती मैं। कर्ण अगर ना होता शायद। तो संग्राम न होता शायद। दुःशासन मतिमंद न होता। रिश्तों में फिर द्वंद न होता। जो दुर्योधन क्रुद्ध न होता। तो शायद ये युद्ध न होत। यूँ ना काश विभाजन होता। अर्जुन ही बस साजन होता। खुले अगर ये बाल न होते। श्वेत् पृष्ठ फिर लाल न होते यदि मेरा अपमान न होता। गिद्धों का जलपान न होता। मौन अगर गुरुदेव न होते। रण आँगन में प्राण न खोते। काश सत्य का साथ निभाते। और बड़े भी कुछ कह पाते। सत्य यही जो समर न होता। कुरुक्षेत्र फिर अमर न होता। नारी का अपमान न होता। कुरुक्षेत्र शमशान न होता।
Read moreAbout the Book
पाँच पिया स्वीकारे क्यूँ थे।
खुद ही भाग बिगाड़े क्यूँ थे।
काश विशेधी हो जाती मैं।
थोड़ा क्रोधी हो जाती मैं।
काश न मेरे हिस्से होते।
शुरू नहीं फिर किस्से होते।
काश वर्ण को वर लेती मैं।
वाणी वश में कर लेती मैं।
कर्ण अगर ना होता शायद।
तो संग्राम न होता शायद।
दुःशासन मतिमंद न होता।
रिश्तों में फिर द्वंद न होता।
जो दुर्योधन क्रुद्ध न होता।
तो शायद ये युद्ध न होत।
यूँ ना काश विभाजन होता।
अर्जुन ही बस साजन होता।
खुले अगर ये बाल न होते।
श्वेत् पृष्ठ फिर लाल न होते
यदि मेरा अपमान न होता।
गिद्धों का जलपान न होता।
मौन अगर गुरुदेव न होते।
रण आँगन में प्राण न खोते।
काश सत्य का साथ निभाते।
और बड़े भी कुछ कह पाते।
सत्य यही जो समर न होता।
कुरुक्षेत्र फिर अमर न होता।
नारी का अपमान न होता।
कुरुक्षेत्र शमशान न होता।
Book Details
-
ISBN9789390923045
-
Pages648
-
Avg Reading Time22 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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