🇮🇳 India’s home-grown full-stack ecosystem for Publishers, Authors, Writers, and Readers. 🎊🎊 Celebrate Your Language, Authors from Your Own Land, with Rachnaye!!! 🎊🎊 Enjoy 🎧 Audiobooks at Rachnaye, download the Rachnaye App from Play Store or App Store

Sanskriti Bhasha Aur Rashtra

Ships within 48 Hours

Free Shipping in India on orders above Rs. 1100


About the book

‘संस्कृति, भाषा और राष्ट्र’ राष्ट्रकवि दिनकर के सारगर्भित भाषणों, आलेखों और निबन्धों का कालातीत और हमेशा प्रासंगिक रहनेवाला संकलन है। ‘संस्कृति के चार अध्याय' के लेखक के रूप में साहित्य-जगत् को कवि दिनकर की विराट प्रतिभा के दर्शन हुए थे। वे कवि तो थे ही, साथ-साथ विद्वान् चिन्तक और अनुसन्धानकर्ता भी थे। इस पुस्तक में दिनकर की गम्भीर चिन्तन-दृष्टि की झाँकी हमें मिलती है। उनके निबन्ध, लेख और भाषण प्रमाणित करते हैं कि हिन्दू-धर्म और हिन्दू-संस्कृति के निर्माण में केवल आर्यों और द्रविड़ों का ही नहीं, बल्कि उनसे पूर्व के आदिवासियों का भी काफ़ी योगदान है। यही नहीं, हिन्दुत्व, बौद्ध मत और जैन मत के पारस्परिक मतभेद भी बुनियादी नहीं हैं। पुस्तक में दिनकर बेहद सरल, सुबोध भाषा-शैली में हमें बताते हैं कि जातियों का सांस्कृतिक विनाश तब होता है, जब वे अपनी परम्पराओं को भूलकर दूसरों की परम्पराओं का अनुकरण करने लगती हैं तथा सांस्कृतिक दासता का भयानक रूप वह होता है जब कोई जाति अपनी भाषा को छोड़कर दूसरों की भाषा अपना लेती है। फल यह होता है कि वह जाति अपना व्यक्तित्व खो बैठती है और उसके स्वाभिमान का विनाश हो जाता है। प्रस्तुत पुस्तक प्राचीन भारत के विभिन्न सम्प्रदायों, धर्मों, जातियों और संस्कृतियों की मूलभूत एकता और उनकी विषमता को रेखांकित करनेवाली अमूल्य कृति है।

Read more

₹ 400

320 20% off

Unavailable

Rachnaye membership

Pick a membership and see exactly what it gets you

  • 15 Free Deliveries
  • 1 Free Book up to ₹500 MRP

Format

This Book is out of stock
Frequently bought together
Sanskriti Bhasha Aur Rashtra This book ₹320
Kavishree Ramdhari Singh Dinkar ₹199
Lokdeo Nehru Ramdhari Singh Dinkar ₹250
3 books selected ₹849 ₹769
This Book is out of stock

100% Original

Fast Dispatch

Secure Payment

About the Book

‘संस्कृति, भाषा और राष्ट्र’ राष्ट्रकवि दिनकर के सारगर्भित भाषणों, आलेखों और निबन्धों का कालातीत और हमेशा प्रासंगिक रहनेवाला संकलन है।

‘संस्कृति के चार अध्याय' के लेखक के रूप में साहित्य-जगत् को कवि दिनकर की विराट प्रतिभा के दर्शन हुए थे। वे कवि तो थे ही, साथ-साथ विद्वान् चिन्तक और अनुसन्धानकर्ता भी थे।

इस पुस्तक में दिनकर की गम्भीर चिन्तन-दृष्टि की झाँकी हमें मिलती है। उनके निबन्ध, लेख और भाषण प्रमाणित करते हैं कि हिन्दू-धर्म और हिन्दू-संस्कृति के निर्माण में केवल आर्यों और द्रविड़ों का ही नहीं, बल्कि उनसे पूर्व के आदिवासियों का भी काफ़ी योगदान है। यही नहीं, हिन्दुत्व, बौद्ध मत और जैन मत के पारस्परिक मतभेद भी बुनियादी नहीं हैं।

पुस्तक में दिनकर बेहद सरल, सुबोध भाषा-शैली में हमें बताते हैं कि जातियों का सांस्कृतिक विनाश तब होता है, जब वे अपनी परम्पराओं को भूलकर दूसरों की परम्पराओं का अनुकरण करने लगती हैं तथा सांस्कृतिक दासता का भयानक रूप वह होता है जब कोई जाति अपनी भाषा को छोड़कर दूसरों की भाषा अपना लेती है। फल यह होता है कि वह जाति अपना व्यक्तित्व खो बैठती है और उसके स्वाभिमान का विनाश हो जाता है।

प्रस्तुत पुस्तक प्राचीन भारत के विभिन्न सम्प्रदायों, धर्मों, जातियों और संस्कृतियों की मूलभूत एकता और उनकी विषमता को रेखांकित करनेवाली अमूल्य कृति है।

Book details

Fast dispatchShips within 48 hours
Secure paymentOnline, or cash on delivery on eligible orders
100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2008
Weight
200 grams
ISBN-13
9788180313295
Pages
291
Reading time
~10 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 22 cm
Language
Hindi

Recommended for you

Customer reviews

Be the first to write a review

Read this one? Tell other readers what you thought about the story, the translation and the print.

Offers

Loading offers…

whatsapp