Practical English Hindi Dictionary
Author:
Ed. Dr. Badri Nath KapoorPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Academics-and-references0 Ratings
Price: ₹ 320
₹
400
Available
यह अद्यतन कोश है और इसमें अंग्रेज़ी के उन सभी शब्दों तथा पदबंधों का संकलन किया गया है जो जीवन के विविध क्षेत्रों से संबद्ध हैं तथा विद्यार्थियों- अध्यापकों, लेखकों- अनुवादकों, संपादकों-पत्रकारों, अधिकारियों-कर्मचारियों आदि को जिनके हिंदी समानार्थी जानने की नित्य आवश्यकता होती है ।
अंग्रेज़ी के सभी शब्दों को अक्षरक्रम से रखा गया है । अन्य प्रमुख अंग्रेज़ी-हिंदी कोशों में विकारी शब्दों तथा समस्त पदों को मूल शब्द के अंतर्गत अर्थात् पेटे में रखा गया है, परंतु इस कोश में ऐसे शब्दों की स्वतंत्र प्रविष्टियाँ हैं । आशा है, इससे पाठकों को विभिन्न शब्दों तक पहुँचने में सुगमता होगी ।
अनियमित क्रियाओं के भूतकालिक, भूतकृदंत तथा वर्तमानकालिक कृदंत रूप भी दिए गए हैं ।
प्राय : विशेषणों के उत्तरावस्था और उत्तमावस्था कें विशिष्ट रूप भी दिए गए हैं ।
शब्दों का उच्चारण अधिक सुगमतापूर्वक तथा व्यवस्थित ढंग से किया जा सके, इसके लिए शब्दों को अक्षरों (syllables) में विभाजित किया गया है और उन्हें योजिका (hyphen) से अलग- अलग करके दिखलाया भी गया है । शब्द के जिस अक्षर पर बलाघात है उसपर चिह्न भी लगाया गया है ।
आवश्यकता प्रतीत होने पर शब्दों के ब्रितानवी और अमेरिकी दोनो प्रकार के उच्चारण भी दिए गए हैं ।
हर शब्द के अर्थ अंग्रेज़ी और हिंदी दोनो भाषाओं में दिए गए हैं । चष्टा रही है कि अंग्रेजी अर्थ की प्रमुख विवक्षा हिंदी समानार्थी से स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो । पदबंधों और मुहावरों की व्याख्या करते समय उनके अर्थ-सौष्ठव को यथावत् प्रतिबिंबित करने का प्रयास भी किया गया है ।
इस कोश में भारत सरकार द्वारा स्थिर किए हुए विधि, प्रशासन, न्याय, प्रौद्योगिकी तथा विभिन्न शास्त्रों और विज्ञानों के शब्दों को प्रमुखता दी गई है ।
उच्चारण-तालिका अन्यत्र दी गई है । इसमें अंग्रेज़ी की कुछ विशिष्ट ध्वनियों के लिए अंतरराष्ट्रीय संकेत चिह्नों के आधार पर कुछ हिंदी वर्णो में विशेष चिह्न जोड़े गए हैं । आशा है, पाठकों को इससे सही उच्चारण करने में सुविधा होगी ।
ISBN: 9789351865575
Pages: 1156
Avg Reading Time: 39 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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और उस पर हो रहे आघातों को वे अपनी कविताओं का विषय बनाते हैं। मनुष्य की स्वाधीनता में उन्हें धर्म जहाँ भी बाधक लगता है वे उसका मुँहतोड़ प्रतिकार करते हैं। इस बिन्दु पर वे बड़े सेक्युलर (सांसारिक) हो जाते हैं जो निर्भय होकर किसी भी सत्ता से भिड़ना जानता है। राजनीति वह क्षेत्र है जहाँ से नंद बाबू का कवि ऊर्जा ग्रहण करता है। वे आततायी राजनीति का चेहरा उघाड़ते हैं और मनुष्यधर्मी राजनीति की प्रस्तावना भी करते हैं। उनका स्वाधीन भारत के समाजवादी दलों से सीधा जुड़ाव भी रहा और वे किसी कार्यकर्ता की तरह आन्दोलनों, रैलियों और चुनावों में भागीदारी करते रहे। उनके ये जीवनानुभव जब कविताओं में रूपान्तरित होकर आते हैं तब नॉस्टेल्जिया उनकी कविताओं की रूढ़ि नहीं शक्ति प्रतीत होता है। युवा आलोचक पल्लव ने परिश्रमपूर्वक रचनावली का सम्पादन किया है। उनकी भूमिका कवि के कृतित्व को गहराई से जानने-समझने के लिए आकृष्ट करती है। नंद चतुर्वेदी की काव्य यात्रा केवल कविताएँ लिखने तक सीमित नहीं थी। इस काव्य यात्रा में प्रभूत गद्य भी लिखा गया है। यह गद्य मोटे तौर पर दो प्रकार का है। चिन्तन-आलोचना-समीक्षा का गद्य और स्मृतियों का गद्य। ‘रचनावली’ के दूसरे खंड में चिन्तन-आलोचना-समीक्षा का गद्य संकलित कर लिया गया है। इस गद्य को पढ़ना नंद बाबू के काव्य सरोकारों को समझने का रास्ता देता है। ‘सप्त किरण’ शीर्षक से उन्होंने राजस्थान के कवियों की एक पुस्तक का सम्पादन भी किया था और इसे वे अस्तित्व रक्षा की संज्ञा देते थे। तो कहना न होगा कि अस्तित्व रक्षा के साथ प्रारम्भ हुआ आलोचना, सम्पादन और समीक्षा का यह सिलसिला पूरी शताब्दी तक नंद बाबू को सक्रिय बनाए रखता है। उन्होंने राजस्थान के हिन्दी कवियों के एक बड़े चयन का सम्पादन भी किया। गद्य लेखन नंद बाबू के लिए जीवनपर्यन्त आपद धर्म बना रहा। वे कवि थे और कविता के सम्बन्ध में निरन्तर विचार करना उन्हें प्रिय था। नंद बाबू कवि होने के साथ सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक विचार के समर्थक भी हैं। वे साहित्य को लोक शिक्षण का सस्ता औजार भले न मानते रहे हों तब भी उन्हें लोक रुचियों के विविध पक्षों पर लिखना जरूरी लगता था। उनके ऐसे ही निबन्धों की किताब ‘यह हमारा समय’ में उनके दो दर्जन से अधिक निबन्ध संकलित हैं जो हमारे जीवन और समय के विविध समकालीन पक्षों पर विचार करते हैं। नंद 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राममनोहर लोहिया पर भी उन्होंने लिखा। उनकी डायरी और अपने पत्रों में वे अपने निजी दायरे सार्वजनिक करते हैं। दो-टूक टिप्पणियाँ और निर्भीक कथन। इनमें बहुधा आत्मीयता का रस भी है तो बेहद निजी निराशाएँ भी। कथेतर की विभिन्न विधाओं में संकलित इस खंड में नंद चतुर्वेदी की रचनाशीलता के अनेक रूप विद्यमान हैं जो कवि के व्यापक दाय का प्रमाण बन गए हैं। ‘नंद चतुर्वेदी रचनावली’ के चौथे और अन्तिम खंड में मुख्यत: कवि का अनुवाद कर्म है। नंद बाबू ने कविता और गद्य दोनों का अनुवाद किया। माना जाता है कि काव्यानुवाद बहुत मुश्किल साहित्य कर्म है क्योंकि अनुवादक ऐसा ही व्यक्ति होना चाहिए जो दोनों भाषाओं को ठीक से जानता हो। नंद बाबू ने साहित्यिक पत्रिकाओं के आग्रह पर काव्यानुवाद किये। ये काव्यानुवाद बहुत पुरानी प्राकृत की कविताओं के थे जो हाल कवि की गाथा सप्तशती से अंग्रेजी के रास्ते आए थे। ठीक इसी तरह कुछ संथाली कविताओं का अनुवाद भी उन्होंने किया जिन्हें अंग्रेजी में कवि सीताकांत महापात्र ने प्रस्तुत किया था। इन दोनों काव्यानुवादों में नंद बाबू की अपनी मेधा दिखाई देती है जो इन कविताओं की मूल संवदेना तक पाठकों को 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कभी कला प्रयोजन के सम्पादक हेमन्त शेष के आग्रह पर तो कभी और किसी पत्रिका के कहने पर। असल बात यही है कि साहित्य में जिस जीवन दृष्टि के लिए नंद बाबू संकल्पवान थे उसे बनाए रखने और गति देने के लिए अनुवाद भी एक जरूरी रास्ता लगता था।
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