Yog Aur Yogasan
About the book
"महर्षि पतंजलि ने एक सूत्र दिया है- ' योगश्चित्त: वृत्ति निरोध: ' । इस सूत्र का अर्थ है-' योग वह है, जो देह और चित्त की खींच-तान के बीच, मानव को अनेक जन्मों तक भी आत्मदर्शन से वंचित रहने से बचाता है । चित्तवृत्तियों का निरोध दमन से नहीं, उसे जानकर उत्पन्न ही न होने देना है । ' ' योग और योगासन ' पुस्तक में ' स्वास्थ्य ' की पूर्ण परिभाषा दी गई है । स्वास्थ्य की दासता से मुक्त होकर मानवमात्र को उसका ' स्वामी ' बनने के लिए राजमार्ग प्रदान किया गया है । ' स्वास्थ्य ' क्या है? ' स्वस्थ ' किसे कहते हैं? मृत्यु जिसे छीन ले, मृत्यु के बाद जो कुछ हमसे छूट जाए वह सब ' पर ' है, पराया है । मृत्यु भी जिसे न छीन पाए सिर्फ वही ' स्व ' है, अपना है । इस ' स्व ' में जो स्थित है वही ' स्वस्थ ' है । कहावत है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ आत्मा का वास होता है । यदि शरीर ही स्वस्थ नहीं होगा तो आत्मा का स्वस्थ रहना कहाँ संभव होगा । इस पुस्तक को पढ़कर निश्चय ही मन में ' जीवेम शरद: शतम् ' की भावना जाग्रत होती है । प्रस्तुत पुस्तक उनके लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है जो दवाओं से तंग आ चुके हैं और स्वस्थ व सबल शरीर के साथ जीना चाहते हैं ।
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About the Book
"महर्षि पतंजलि ने एक सूत्र दिया है- ' योगश्चित्त: वृत्ति निरोध: ' । इस सूत्र का अर्थ है-' योग वह है, जो देह और चित्त की खींच-तान के बीच, मानव को अनेक जन्मों तक भी आत्मदर्शन से वंचित रहने से बचाता है । चित्तवृत्तियों का निरोध दमन से नहीं, उसे जानकर उत्पन्न ही न होने देना है । '
' योग और योगासन ' पुस्तक में ' स्वास्थ्य ' की पूर्ण परिभाषा दी गई है । स्वास्थ्य की दासता से मुक्त होकर मानवमात्र को उसका ' स्वामी ' बनने के लिए राजमार्ग प्रदान किया गया है ।
' स्वास्थ्य ' क्या है? ' स्वस्थ ' किसे कहते हैं?
मृत्यु जिसे छीन ले, मृत्यु के बाद जो कुछ हमसे छूट जाए वह सब ' पर ' है, पराया है । मृत्यु भी जिसे न छीन पाए सिर्फ वही ' स्व ' है, अपना है । इस ' स्व ' में जो स्थित है वही ' स्वस्थ ' है ।
कहावत है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ आत्मा का वास होता है । यदि शरीर ही स्वस्थ नहीं होगा तो आत्मा का स्वस्थ रहना कहाँ संभव होगा । इस पुस्तक को पढ़कर निश्चय ही मन में ' जीवेम शरद: शतम् ' की भावना जाग्रत होती है ।
प्रस्तुत पुस्तक उनके लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है जो दवाओं से तंग आ चुके हैं और स्वस्थ व सबल शरीर के साथ जीना चाहते हैं ।
Book details
- Format
- Hardbound
- Publisher
- Prabhat Prakashan
- Weight
- 327 grams
- ISBN-13
- 9789383111886
- Pages
- 200
- Reading time
- ~7 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14 × 21.5 cm
- Language
- Hindi
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Yog Aur Yogasan opens with Maharshi Patanjali's foundational sutra—yogash chitta-vritti nirodhah—and proceeds to dismantle the common misreading of yoga as suppression. The book argues that mental fluctuations (chitta-vrittis) are not to be crushed but understood so deeply that they cease to arise. This is yoga not as a catalogue of physical postures but as a philosophical discipline for atmadarshan, self-realization that eludes seekers across lifetimes when the body and mind remain in conflict.
Central to the book is a radical redefinition of swasthya—health. Rather than the absence of disease, health here means self-sovereignty: moving from being ruled by the body's demands to commanding it. The text provides what it calls a rajmarg, a royal highway, to this mastery through both conceptual clarity and practical guidance on yogasan. For readers seeking yoga as philosophy rather than fitness, this work situates ancient Indic wisdom within a framework accessible to contemporary Hindi readers.
योग और योगासन की पुस्तक पढ़ने से मुझे कैसा अनुभव मिलेगा?
यह पुस्तक आपको शारीरिक व्यायाम की सूची नहीं, बल्कि एक गहरी दार्शनिक यात्रा देती है। पतंजलि के सूत्र 'चित्तवृत्ति निरोध' को समझाते हुए यह बताती है कि मानसिक शांति दमन से नहीं, समझ से आती है। पढ़ते समय आप महसूस करेंगे कि योग केवल आसन नहीं, बल्कि आत्मदर्शन का मार्ग है। यह पुस्तक धीरे-धीरे पढ़ी जाने वाली है, जो आपको अपने शरीर और मन के बीच के संघर्ष को समझने का नया नज़रिया देती है।
Yog Aur Yogasan पुस्तक किस प्रकार के पाठकों के लिए उपयुक्त है?
यह पुस्तक उन पाठकों के लिए है जो योग को केवल फिटनेस नहीं, बल्कि जीवन दर्शन के रूप में समझना चाहते हैं। यदि आप पतंजलि के योग सूत्रों को हिंदी में गहराई से जानना चाहते हैं, या स्वास्थ्य की परिभाषा को नए सिरे से समझना चाहते हैं, तो यह आपके लिए है। इसे पढ़ने के लिए आध्यात्मिक जिज्ञासा और धैर्य चाहिए—यह त्वरित समाधान देने वाली पुस्तक नहीं है, बल्कि आत्मचिंतन को प्रोत्साहित करने वाली रचना है।
आज के भारतीय पाठकों के लिए इस पुस्तक का सांस्कृतिक महत्व क्या है?
आधुनिक भारत में जहां योग को अक्सर व्यायाम या ब्रांड के रूप में देखा जाता है, यह पुस्तक उसकी प्राचीन दार्शनिक जड़ों की ओर लौटाती है। पतंजलि के सूत्रों को समझाकर यह बताती है कि स्वास्थ्य का अर्थ बीमारी का अभाव नहीं, बल्कि शरीर और मन पर स्वामित्व है। आज जब तनाव और मानसिक अशांति बढ़ रही है, यह पुस्तक भारतीय पाठकों को अपनी ही परंपरा से आत्मनिर्भरता का मार्ग दिखाती है।
Yog Aur Yogasan विषय पर लेखक का दृष्टिकोण क्या विशेष बनाता है?
लेखक ने योग को केवल आसनों की सूची के रूप में प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि पतंजलि के 'चित्तवृत्ति निरोध' सूत्र को केंद्र में रखा है। वे स्पष्ट करते हैं कि मानसिक उतार-चढ़ाव को दबाना नहीं, उन्हें इतनी गहराई से समझना है कि वे उत्पन्न ही न हों। स्वास्थ्य को 'स्वामित्व' के रूप में परिभाषित करना और 'राजमार्ग' शब्द का प्रयोग करना—यह दृष्टिकोण पारंपरिक योग ग्रंथों से अलग, अधिक सुलभ और व्यावहारिक है।
Yog Aur Yogasan पुस्तक पढ़ने के बाद पाठक के पास क्या रह जाता है?
- योग के बारे में एक नई समझ—यह केवल शारीरिक अभ्यास नहीं, आत्मसाक्षात्कार का मार्ग है |
- स्वास्थ्य की पुनर्परिभाषा—शरीर का गुलाम नहीं, उसका स्वामी बनने की प्रेरणा
- पतंजलि के सूत्रों की व्यावहारिक व्याख्या जो दैनिक जीवन में लागू की जा सकती है
- मानसिक शांति के प्रति एक दार्शनिक दृष्टिकोण जो दमन के बजाय समझ पर आधारित है।
