Napoleon Bonaparte
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"नेपोलियन बोनापार्ट के कुछ महत्त्वपूर्ण विचार • लोग अपने अधिकारों की अपेक्षा अपने स्वार्थों के लिए ज्यादा मजबूती से लड़ते हैं। • सच्चा आदमी किसी से नफरत नहीं करता। • अवसरों के बिना योग्यता धरी-की-धरी रह जाती है। • चार विरोधी अखबार हजारों संगीनों से ज्यादा डरावने हो सकते हैं। • महत्त्वाकांक्षा किसी महानायक का जुनून हो सकती है। जो इससे प्रेरित होते हैं, वे बहुत अच्छे या बहुत बुरे कार्य कर सकते हैं। • जो जीत के प्रति आशंकित होता है, वह निश्चित रूप से हारता है। • मेरी आपके लिए एक ही सलाह है, त्रुटिहीन बनो। • यदि मुझसे धर्म का चुनाव करने के लिए कहा जाए तो सार्वभौमिक जीवनदाता सूर्य को मैं अपना ईश्वर चुनूँगा। • यदि तुम चाहते हो कि कोई काम एकदम ठीक से हो तो उसे स्वयं करो। • किसी लोकप्रिय शख्सियत को नजदीक से देखा जाए तो उसकी गरिमा का पर्वत भरभरा उठता है। नेपोलियन बोनापार्ट ने फ्रांसीसी क्रांति के एक जनरल से लेकर सम्राट्ï नेपोलियन बोनापार्ट तक का सफर तय किया। वह 11 नवंबर, 1799 से लेकर 18 मई, 1804 तक फ्रेंच रिपब्लिक के पहले काउंसिल के रूप में फ्रांस के शासक रहे। 18 मई, 1804 से लेकर 6 अप्रैल, 1814 तक वे नेपोलियन प्रथम के रूप में फ्रांस के सम्राट्ï और इटली के राजा थे। किसी भी भूमिका में वे पश्चिम के इतिहास के अब तक के सबसे यशस्वी व्यक्तित्वों में से एक हैं। वे फ्रांसीसी राज्य के सैन्य विस्तार के लिए समर्पित थे, जिसके लिए उन्होंने सैन्य संगठन और प्रशिक्षण में क्रांति ला दी। दुनिया भर की सैन्य अकादमियों में उनके अभियानों का अध्ययन किया जाता है और उन्हें अब तक का एक महानतम कमांडर माना जाता है। नेपोलियन के कई सुधारों ने फ्रांस के संस्थानों और पश्चिमी यूरोप के अनेक हिस्सों पर अमिट छाप छोड़ी। अपने जीवनकाल में उन्होंने बहुत सम्मान अॢजत किया और इसीलिए उन्हें इतिहास का एक महानायक माना गया। एक महान् शासक और सेनानायक की प्रेरणादायक एवं पठनीय जीवनगाथा। "
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"नेपोलियन बोनापार्ट के कुछ महत्त्वपूर्ण विचार
• लोग अपने अधिकारों की अपेक्षा अपने स्वार्थों के लिए ज्यादा मजबूती से लड़ते हैं।
• सच्चा आदमी किसी से नफरत नहीं करता।
• अवसरों के बिना योग्यता धरी-की-धरी रह जाती है।
• चार विरोधी अखबार हजारों संगीनों से ज्यादा डरावने हो सकते हैं।
• महत्त्वाकांक्षा किसी महानायक का जुनून हो सकती है। जो इससे प्रेरित होते हैं, वे बहुत अच्छे या बहुत बुरे कार्य कर सकते हैं।
• जो जीत के प्रति आशंकित होता है, वह निश्चित रूप से हारता है।
• मेरी आपके लिए एक ही सलाह है, त्रुटिहीन बनो।
• यदि मुझसे धर्म का चुनाव करने के लिए कहा जाए तो सार्वभौमिक जीवनदाता सूर्य को मैं अपना ईश्वर चुनूँगा।
• यदि तुम चाहते हो कि कोई काम एकदम ठीक से हो तो उसे स्वयं करो।
• किसी लोकप्रिय शख्सियत को नजदीक से देखा जाए तो उसकी गरिमा का पर्वत भरभरा उठता है।
नेपोलियन बोनापार्ट ने फ्रांसीसी क्रांति के एक जनरल से लेकर सम्राट्ï नेपोलियन बोनापार्ट तक का सफर तय किया। वह 11 नवंबर, 1799 से लेकर 18 मई, 1804 तक फ्रेंच रिपब्लिक के पहले काउंसिल के रूप में फ्रांस के शासक रहे। 18 मई, 1804 से लेकर 6 अप्रैल, 1814 तक वे नेपोलियन प्रथम के रूप में फ्रांस के सम्राट्ï और इटली के राजा थे।
किसी भी भूमिका में वे पश्चिम के इतिहास के अब तक के सबसे यशस्वी व्यक्तित्वों में से एक हैं। वे फ्रांसीसी राज्य के सैन्य विस्तार के लिए समर्पित थे, जिसके लिए उन्होंने सैन्य संगठन और प्रशिक्षण में क्रांति ला दी। दुनिया भर की सैन्य अकादमियों में उनके अभियानों का अध्ययन किया जाता है और उन्हें अब तक का एक महानतम कमांडर माना जाता है।
नेपोलियन के कई सुधारों ने फ्रांस के संस्थानों और पश्चिमी यूरोप के अनेक हिस्सों पर अमिट छाप छोड़ी। अपने जीवनकाल में उन्होंने बहुत सम्मान अॢजत किया और इसीलिए उन्हें इतिहास का एक महानायक माना गया।
एक महान् शासक और सेनानायक की प्रेरणादायक एवं पठनीय जीवनगाथा।
"
Book Details
-
ISBN9789350481509
-
Pages136
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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नलिन जी ने समीक्षा को अत्यन्त उत्तरदायित्वपूर्ण काम मानते हुए न सिर्फ प्रेमचन्द, शुक्ल, निराला आदि रचनाकारों पर बहुत प्रभावशाली आलोचना लिखी बल्कि अपने समकालीन रचनाकारों की रचनाओं पर भी लिखा और उनके माध्यम से आलोचना के कुछ प्रतिमान गढ़ने का प्रयास किया। आधुनिक उपन्यास के विषय में उनका कहना था कि इसे सुबन्धु, दंडी, बाणभट्ट की लुप्त परम्परा के तहत पुनर्जीवित नहीं किया गया बल्कि यह साहित्य का वह पौधा था जिसे अगर सीधे पश्चिम से नहीं लिया गया तो भी उसका बांग्ला कलम तो जरूर लिया गया था। वे कहते थे, समृद्धि और ऐश्वर्य की सभ्यता महाकाव्य में अभिव्यक्ति पाती है तो जटिलता, वैषम्य और संघर्ष की सभ्यता उपन्यास में।
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4 आलोचक, लेखक, अध्यापक, सम्पादक नलिन विलोचन शर्मा का हिन्दी साहित्य में महत्त्वपूर्ण योगदान है। आलोचना, कविता, कहानी, निबन्ध, अनुवाद, पुस्तक समीक्षा आदि सभी विधाओं में उनकी लेखनी अबाध गति से चली है। वे आधुनिकता के प्रबल प्रवक्ता थे तो परम्परा के भी उतने ही गहरे जानकार थे। प्रगतिवाद बनाम आधुनिकता के विवाद से अलग वे आलोचना के एक तीसरे धरातल की खोज में रत रहे। शिविरबद्धता के विरुद्ध उनका तीक्ष्ण आलोचनात्मक संघर्ष रहा।
नलिन जी कहानी को ‘शोधना’ समझते थे। उनके मुताबिक ‘कहानीकार बिन्दु में केन्द्रित विराट और पूर्ण सत्य का उद्घाटन करता है। कहानीकारों के दो काम होते हैं—बिन्दु फैले नहीं और बिन्दु पर से निगाह विचले नहीं। पिंड में ब्रह्मांड का सत्य देख लेना कृच्छ्र-साधना है, यह संत ही नहीं कहानीकार भी जानते हैं।’ यही उनके कहानीकार की आधार-भूमि थी। जितने समय में कुछ लोगों ने उपन्यास पूरे कर लिए उतना समय उन्होंने एक-एक कहानी को दिया। उनका कहानी-लेखन ढाई दशकों में फैला है। इस दौरान कई कहानी आन्दोलन चले लेकिन उन्होंने खुद को उनसे अलग रखा। उनकी कहानियों में सामाजिक समस्याएँ, मनुष्य की मनोग्रन्थियाँ, यौन-मनोविज्ञान और प्रेम जैसे विषय प्रमुख हैं।
कविता में प्रयोगवाद के बरक्स ‘नकेनवाद’ जैसी अवधारणा का सूत्रीकरण नलिन जी ने ही अपने सहयोगी कवियों केसरीकुमार और नरेश के साथ मिलकर किया जिसका उद्देश्य, उनके अनुसार, प्रयोगवाद की आत्मा की रक्षा था। वे अनुवाद में भी दखल रखते थे। मुख्यतः अंग्रेजी से हिन्दी में किए गए उनके अनुवादों को मानक के तौर पर देखा गया। उनका आत्मपरक लेखन उनके व्यक्तिगत और रचनात्मक जीवन का महत्त्वपूर्ण संकेतक है।
रचनावली के इस चौथे खंड में नलिन जी की सभी उपलब्ध कहानियाँ, कविताएँ, संस्मरण, निबन्ध, डायरी, अनुवाद और साक्षात्कार सम्मिलित किए गए हैं।
5. आलोचक, लेखक, अध्यापक, सम्पादक नलिन विलोचन शर्मा का हिन्दी साहित्य में महत्त्वपूर्ण योगदान है। आलोचना, कविता, कहानी, निबन्ध, अनुवाद, पुस्तक समीक्षा आदि सभी विधाओं में उनकी लेखनी अबाध गति से चली है। वे आधुनिकता के प्रबल प्रवक्ता थे तो परम्परा के भी उतने ही गहरे जानकार थे। प्रगतिवाद बनाम आधुनिकता के विवाद से अलग वे आलोचना के एक तीसरे धरातल की खोज में रत रहे। शिविरबद्धता के विरुद्ध उनका तीक्ष्ण आलोचनात्मक संघर्ष रहा।
उन्होंने भाषा और साहित्य को अलग-अलग करके नहीं देखा। इस दृष्टि से हम नलिन जी के अंग्रेजी में लिखे साहित्य को देखते हैं तो पाते हैं कि उनमें औपनिवेशिक दौर की भाषाई हीनता या श्रेष्ठता की ग्रन्थि नहीं है।
रचनावली के इस पाँचवें और अन्तिम खंड में नलिन जी की अंग्रेजी में लिखी रचनाएँ रखी गई हैं जिनमें तीन कहानियाँ, दो साहित्य और संस्कृति पर लिखे गए वैचारिक निबन्ध और किसी रचनाकार या शख्सियत पर लिखी एकमात्र प्रबन्ध पुस्तक जगजीवन राम शामिल हैं। यह बाबू जगजीवन राम की जीवनी है जो जगजीवन राम अभिनन्दन समिति, पटना के लिए 1954 में लिखी गई। यह जीवनी और इस खंड की अन्य रचनाओं को देखने-पढ़ने के बाद ‘क्लासिक’ अंग्रेजी का जो एक सहज प्रवाह मिलता है, कहीं-कहीं ‘सबलाइम्स’ की जो बानगी मिलती है, उससे नलिन जी की अंग्रेजी का पता चलता है।
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