Alochna Ki Paridhi
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श्री गजेन्द्र पाठक हिंदी आलोचना में एक सार्थक और जीवंत उपस्थिति हैं। उन्होंने हिंदी नवजागरण पर प्रमुखता से काम करने के साथ-साथ आलोचना को अपने विमर्शात्मक लेखन से समृद्ध किया है। उनकी आलोचना का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यही है कि वे कृति, व्यक्ति और विवेच्य विषय पर विचार करते हुए उसको अनेक संदर्भों के साथ देखते हैं और उसे वर्तमान परिप्रेक्ष्य में घटित कर उसके फलाफल का परीक्षण करते हैं। इससे उनकी आलोचना पाठक को अनेक स्तरों पर समृद्ध तो करती ही है, एक प्रबुद्ध नागरिक के रूप में भी उसे तैयार करती है। कृति के निहितार्थ के परीक्षण के साथ आज के आलोचक का यह बड़ा दायित्व है जिसे श्री पाठक बहुत मनोयोग से निभा रहे हैं। यह आलोचना अपनी संवादात्मकता में हमें साथ-साथ ले चलती है और विवेच्य विषय के साथ-साथ अनेक संदर्भों से परिचित कराती है। इसे पढ़ते हुए भान ही नहीं रहता कि हम कोई आलोचना पढ़ रहे हैं। श्री पाठक की आलोचना इसीलिए सर्जनात्मक आलोचना लगती है... इन सभी विशेषताओं को देखना हो, तो यह आलोचना पुस्तक ‘आलोचना की परिधि’ ध्यान आकृष्ट करती है। पुस्तक में बीस आलोचनात्मक निबंध हैं जो किसी एक विधा पर केन्द्रित नहीं हैं। इसमें कविता, उपन्यास, आत्मकथा और आलोचना की अनेक पुस्तकों पर विचार किया गया है, तो अनेक रचनाकार अपनी समस्त सर्जनात्मक उपादेयता में प्रकट भी होते है... इस रूप में उनकी आलोचना अपनी एक नागरिक जवाबदेही पूरी करती हुई हमें एक सचेत और आलोचनात्मक विवेक से सम्पन्न करती है। --ज्योतिष जोशी
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श्री गजेन्द्र पाठक हिंदी आलोचना में एक सार्थक और जीवंत उपस्थिति हैं। उन्होंने हिंदी नवजागरण पर प्रमुखता से काम करने के साथ-साथ आलोचना को अपने विमर्शात्मक लेखन से समृद्ध किया है। उनकी आलोचना का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यही है कि वे कृति, व्यक्ति और विवेच्य विषय पर विचार करते हुए उसको अनेक संदर्भों के साथ देखते हैं और उसे वर्तमान परिप्रेक्ष्य में घटित कर उसके फलाफल का परीक्षण करते हैं। इससे उनकी आलोचना पाठक को अनेक स्तरों पर समृद्ध तो करती ही है, एक प्रबुद्ध नागरिक के रूप में भी उसे तैयार करती है। कृति के निहितार्थ के परीक्षण के साथ आज के आलोचक का यह बड़ा दायित्व है जिसे श्री पाठक बहुत मनोयोग से निभा रहे हैं। यह आलोचना अपनी संवादात्मकता में हमें साथ-साथ ले चलती है और विवेच्य विषय के साथ-साथ अनेक संदर्भों से परिचित कराती है। इसे पढ़ते हुए भान ही नहीं रहता कि हम कोई आलोचना पढ़ रहे हैं। श्री पाठक की आलोचना इसीलिए सर्जनात्मक आलोचना लगती है... इन सभी विशेषताओं को देखना हो, तो यह आलोचना पुस्तक ‘आलोचना की परिधि’ ध्यान आकृष्ट करती है। पुस्तक में बीस आलोचनात्मक निबंध हैं जो किसी एक विधा पर केन्द्रित नहीं हैं। इसमें कविता, उपन्यास, आत्मकथा और आलोचना की अनेक पुस्तकों पर विचार किया गया है, तो अनेक रचनाकार अपनी समस्त सर्जनात्मक उपादेयता में प्रकट भी होते है... इस रूप में उनकी आलोचना अपनी एक नागरिक जवाबदेही पूरी करती हुई हमें एक सचेत और आलोचनात्मक विवेक से सम्पन्न करती है। --ज्योतिष जोशी
Book Details
-
ISBN9788195182749
-
Pages232
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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