🇮🇳 India’s home-grown full-stack ecosystem for Publishers, Authors, Writers, and Readers. 🎊🎊 Celebrate Your Language, Authors from Your Own Land, with Rachnaye!!! 🎊🎊 Enjoy 🎧 Audiobooks at Rachnaye, download the Rachnaye App from Play Store or App Store

Khushhal Basti

(1)

Ships within 48 Hours

Free Shipping in India on orders above Rs. 1100


About the book

शहर से कुछ दूर सूखी-बंजर जमीन पर अनेक झुग्गियाँ थीं। उनमें रहने वाले लोग मेहनत-मजूरी कर अपनी गुजर-बसर करते। गृहणियाँ भी अपनी घिसी-पिटी दिनचर्या से निपट आपस में गप्प-शप्प करतीं। उनके बच्चे भी अगल-बगल में बैठते या इधर-उधर खेलते। नंग-धड़ंग या फटे-पुराने कपड़ों में लिपटे हुए बच्चों में से किसी के हाथ में रूखी-सूखी रोटी का टुकड़ा होता व किसी के हाथ में कोई अन्य चीज। बच्चे जब आपस में खेलेंगे तो झगड़ा भी होगा और फिर यदि उनमें झगड़ा हुआ तो बड़े कोई चुप थोड़ा ही रहेंगे अर्थात् बड़ों में भी तू-तू मैं-मैं हो ही जानी है। कई बार तो यह क्लेश इतना बढ़ जाता कि मर्द जब घर आते तो उन्हें भी इसमें घसीट लिया जाता। अतः उनका प्रत्येक दिन ऐसे ही बीत रहा था, पर मजे की बात कि उनको अपने जीवन के इस ढाँचे से कोई शिकायत न थी। जिस स्‍थान पर यह बस्ती थी, वहीं एक सड़क भी थी। उस सड़क से प्रतिदिन एक लड़की साईकल चलाती हुई निकलती और उसकी साईकल के आगे एक टोकरी लगी हुई थी, जिसमें कुछ पुस्तकें होतीं। साईकल सवार लड़की का, उधर से आने-जाने का एक निश्चित समय था। वह प्रतिदिन उस बस्ती के लोगों को देखती तो सोचने लगती कि कैसा जीवन है इन लोगों का? इनको इस बात की समझ ही नहीं कि मनुष्य जीवन तो अनमोल है, पर ये किस प्रकार की जिंदगी जी रहे हैं? उस बस्ती के लोग भी उस लड़की को जब इधर से निकलते देखते तो सोचते कि कितनी अच्छी लगती है यह बच्ची? —इसी पुस्तक से

Read more

₹ 95

₹ 76 20% off

Unavailable

Rachnaye membership

Pick a membership and see exactly what it gets you

  • 15 Free Deliveries
  • 1 Free Book up to ₹500 MRP

Format

This Book is out of stock
Frequently bought together
Khushhal Basti This book ₹76
1000 Kalam Prashnottari Anita Gaur ₹400
3 books selected ₹695 ₹676
This Book is out of stock

100% Original

Fast Dispatch

Secure Payment

About the Book

शहर से कुछ दूर सूखी-बंजर जमीन पर अनेक झुग्गियाँ थीं। उनमें रहने वाले लोग मेहनत-मजूरी कर अपनी गुजर-बसर करते। गृहणियाँ भी अपनी घिसी-पिटी दिनचर्या से निपट आपस में गप्प-शप्प करतीं। उनके बच्चे भी अगल-बगल में बैठते या इधर-उधर खेलते।

नंग-धड़ंग या फटे-पुराने कपड़ों में लिपटे हुए बच्चों में से किसी के हाथ में रूखी-सूखी रोटी का टुकड़ा होता व किसी के हाथ में कोई अन्य चीज। बच्चे जब आपस में खेलेंगे तो झगड़ा भी होगा और फिर यदि उनमें झगड़ा हुआ तो बड़े कोई चुप थोड़ा ही रहेंगे अर्थात् बड़ों में भी तू-तू मैं-मैं हो ही जानी है। कई बार तो यह क्लेश इतना बढ़ जाता कि मर्द जब घर आते तो उन्हें भी इसमें घसीट लिया जाता। अतः उनका प्रत्येक दिन ऐसे ही बीत रहा था, पर मजे की बात कि उनको अपने जीवन के इस ढाँचे से कोई शिकायत न थी।

जिस स्‍थान पर यह बस्ती थी, वहीं एक सड़क भी थी। उस सड़क से प्रतिदिन एक लड़की साईकल चलाती हुई निकलती और उसकी साईकल के आगे एक टोकरी लगी हुई थी, जिसमें कुछ पुस्तकें होतीं।

साईकल सवार लड़की का, उधर से आने-जाने का एक निश्चित समय था। वह प्रतिदिन उस बस्ती के लोगों को देखती तो सोचने लगती कि कैसा जीवन है इन लोगों का? इनको इस बात की समझ ही नहीं कि मनुष्य जीवन तो अनमोल है, पर ये किस प्रकार की जिंदगी जी रहे हैं?

उस बस्ती के लोग भी उस लड़की को जब इधर से निकलते देखते तो सोचते कि कितनी अच्छी लगती है यह बच्ची? —इसी पुस्तक से

Book details

Fast dispatchShips within 48 hours
Secure paymentOnline, or cash on delivery on eligible orders
100% OriginalGenuine copy from Prabhat Prakashan
Format
Paperback
Publisher
Prabhat Prakashan
Weight
100 grams
ISBN-13
9789392573200
Pages
40
Reading time
~3 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 21.5 cm
Language
Hindi

Recommended for you

Customer reviews

5.0
★★★★★★★★★★
1 rating
5 star 100%
4 star 0%
3 star 0%
2 star 0%
1 star 0%

Review this book

Share your thoughts with other readers.

Customer reviews

S Sagar
Reviewed on 27 March 2025

nice

Offers

Loading offers…

whatsapp