Jeet Ka Jashan
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'जीत का जश्न' कृति में जीवन को दिशा देनेवाली, आपकी सोच को सकारात्मकता देनेवाली एवं आपके छिपे गुणों को उभारनेवाली व्यावहारिक बातें संकलित हैं। ऐसा मत सोचिए कि आपको एक बार में इन्हें आत्मसात् करना है। कुछ विचार आपकी ओर अग्रसर होंगे, पहले उन विचारों के साथ जुडि़ए। यदि आप इसमें कही गई किसी बात से असहमत हैं तो इसे टाल दीजिए। इसे पढ़ते समय आपको आभास होगा कि लेखिका ने शक्ति, बुद्धिमत्ता, अनंत मन, उच्च शक्ति, ईश्वर, सार्वभौमिक शक्ति, आंतरिक बुद्धि इत्यादि जैसे कई शब्दों का प्रयोग किया है। ऐसा यह दरशाने के लिए किया गया है कि इस ब्रह्मांड को चलानेवाली उस शक्ति, जो आपके अंदर भी है, का नाम लेने के लिए आप जिसका भी चयन करें, वह असीम है। यदि आप इस पुस्तक से एक भी अच्छा विचार पा सकें और उसका प्रयोग अपने जीवन की गुणवत्ता सुधारने की दिशा में कर सकें तो यह पुस्तक की सफलता होगी। 'यू कैन हील योर लाइफ’ जैसी बेस्टसैलर लेखिका लुइस एल. हे की एक और प्रभावशाली एवं सशक्त पुस्तक, जो आपको सफल बनाकर 'जीत का जश्न' मनाने में आपकी सच्ची साथी होगी।
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'जीत का जश्न' कृति में जीवन को दिशा देनेवाली, आपकी सोच को सकारात्मकता देनेवाली एवं आपके छिपे गुणों को उभारनेवाली व्यावहारिक बातें संकलित हैं। ऐसा मत सोचिए कि आपको एक बार में इन्हें आत्मसात् करना है। कुछ विचार आपकी ओर अग्रसर होंगे, पहले उन विचारों के साथ जुडि़ए। यदि आप इसमें कही गई किसी बात से असहमत हैं तो इसे टाल दीजिए।
इसे पढ़ते समय आपको आभास होगा कि लेखिका ने शक्ति, बुद्धिमत्ता, अनंत मन, उच्च शक्ति, ईश्वर, सार्वभौमिक शक्ति, आंतरिक बुद्धि इत्यादि जैसे कई शब्दों का प्रयोग किया है। ऐसा यह दरशाने के लिए किया गया है कि इस ब्रह्मांड को चलानेवाली उस शक्ति, जो आपके अंदर भी है, का नाम लेने के लिए आप जिसका भी चयन करें, वह असीम है। यदि आप इस पुस्तक से एक भी अच्छा विचार पा सकें और उसका प्रयोग अपने जीवन की गुणवत्ता सुधारने की दिशा में कर सकें तो यह पुस्तक की सफलता होगी।
'यू कैन हील योर लाइफ’ जैसी बेस्टसैलर लेखिका लुइस एल. हे की एक और प्रभावशाली एवं सशक्त पुस्तक, जो आपको सफल बनाकर 'जीत का जश्न' मनाने में आपकी सच्ची साथी होगी।
Book Details
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ISBN9789350488799
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Pages192
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Avg Reading Time6 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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"एक दोपहर अटलजी और दीनदयालजी जमीन पर चटाई बिछाकर लेट गए। वहीं सिराहने कुछ ईंटें रखी हुई थीं। दोनों ने उन्हीं ईंटों को तकिए की तरह अपने सिर के नीचे लगा लिया। उस समय भारत प्रेस के हिसाब-किताब का काम श्री राधेश्याम कपूरजी देखा करते थे। वैसे तो उनकी अमीनाबाद में अपनी दुकान भी थी, लेकिन वे उसमें कम ही बैठते, क्योंकि उनका दिल तो भारत प्रेस में ही लगा रहता था।...तो अचानक वे आ गए और दोनों को ऐसे सोता देख द्रवित हो उठे, जबकि सच तो यह है कि अटलजी और दीनदयालजी को किसी भी प्रकार का कोई कष्ट महसूस ही नहीं हुआ था, वे दोनों तो थकान के बाद की नींद का आनंद ले रहे थे। बाद में तो यह अकसर ही होने लगा। कोई भी सोता तो उन्हीं ईंटों का तकिया लगा लेता। उन दिनों संघ की शाखा में रोज कबड्डी खेली जाती थी। अटलजी को भी कबड्डी खेलना बड़ा अच्छा लगता था, लेकिन वे ठीक से खेल ही नहीं पाते थे। खेल के नियम तो सारे जानते थे, लेकिन दरअसल कारण यह था कि उन दिनों वे बहुत दुबले-पतले हुआ करते थे, इसलिए वे जिसके भी पाले में आते, उस पाले के स्वयंसेवक अपना सिर पकड़ लेते। —इसी संग्रह से भारत रत्न अटलजी जननायक थे, कवि-साहित्यकार थे, सबको साथ लेकर चलने की अद्भुत क्षमता लिये संवेदना से भरपूर एक महान् विभूति थे। उनकी स्मृतियाँ सँजोने का एक विनम्र उपक्रम है यह पुस्तक, जो पाठकों को प्रेरित करेगी। "
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