Vishnu Prabhakar Ki Lokpriya Kahaniyan

(0)

Language:

Hindi

Category:

Other

₹ 150

₹ 120 (20% off)

Unavailable

Ships within 48 Hours

Free Shipping in India on orders above Rs. 1100


"सन् 1931 में जब विष्णु प्रभाकर 19 वर्ष के थे, उनकी पहली कहानी ‘दिवाली की रात’ लाहौर से निकलनेवाले ‘मिलाप’ पत्र में छपी। उसके बाद जो सिलसिला शुरू हुआ, वह 76 वर्ष सन् 2007 तक निर्बाध चलता रहा। उनके लेखन में विचार नारों की तरह शोरगुल में नहीं बदलता। मनुष्य मन की जटिल व्यवस्था हो या अमानवीय असामाजिक परिस्थितियाँ, विष्णु प्रभाकर उस मनुष्य की चिंता करते हैं, जिसे सताया जा रहा है और फिर भी निरंतर मुक्ति संग्राम में जुटा है। उनकी कथावस्तु में प्रेम, मानवीय संवेदना, पारिवारिक संबंध, अंधविश्वास जैसे विषय मौजूद हैं। विष्णुजी की अधिक रुचि मनुष्य में रही। उन्होंने उसके जीवन के झूठ और पाखंड को देखा, उसके छोटे-से-छोटे क्रियाकलाप को बारीकी से परखा, उसके अंतर में चलते द्वंद्व को समझा, अपने दीर्घ अनुभव के साँचे में ढाला और करुणा के अंतर्निहित भावों को शब्द दिए। वे अपने प्रारंभिक त्रासद जीवन के प्रभाव से शायद कभी मुक्त न हो सके। उनका विपुल साहित्य उनके स्वयं के जीवन का ही प्रतिरूप है, जो सरल, सात्त्विक, अकृत्रिम व मानवीय मूल्यों को समर्पित है। मित्र, हमदर्द, सलाहकार, सहभागी और सहयात्री—विष्णु प्रभाकर अनेक रूपों में अपने कथा-पात्रों के साथ जीते हैं। यही जीना उनकी रचनाओं को रोचक बना देता है।"

Read more

ISBN
9789351862925
Pages
184
Avg Reading Time
6 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

Don’t Miss Out

Pick a membership and see exactly what it gets you

  • 15 Free Deliveries
  • 1 Free Book up to ₹500 MRP

Format:

This Book is out of stock
This Book is out of stock

Piracy Free

Express Delivery

Secure Payment

About the Book

"सन् 1931 में जब विष्णु प्रभाकर 19 वर्ष के थे, उनकी पहली कहानी ‘दिवाली की रात’ लाहौर से निकलनेवाले ‘मिलाप’ पत्र में छपी। उसके बाद जो सिलसिला शुरू हुआ, वह 76 वर्ष सन् 2007 तक निर्बाध चलता रहा। उनके लेखन में विचार नारों की तरह शोरगुल में नहीं बदलता। मनुष्य मन की जटिल व्यवस्था हो या अमानवीय असामाजिक परिस्थितियाँ, विष्णु प्रभाकर उस मनुष्य की चिंता करते हैं, जिसे सताया जा रहा है और फिर भी निरंतर मुक्ति संग्राम में जुटा है। उनकी कथावस्तु में प्रेम, मानवीय संवेदना, पारिवारिक संबंध, अंधविश्वास जैसे विषय मौजूद हैं।
विष्णुजी की अधिक रुचि मनुष्य में रही। उन्होंने उसके जीवन के झूठ और पाखंड को देखा, उसके छोटे-से-छोटे क्रियाकलाप को बारीकी से परखा, उसके अंतर में चलते द्वंद्व को समझा, अपने दीर्घ अनुभव के साँचे में ढाला और करुणा के अंतर्निहित भावों को शब्द दिए। वे अपने प्रारंभिक त्रासद जीवन के प्रभाव से शायद कभी मुक्त न हो सके। उनका विपुल साहित्य उनके स्वयं के जीवन का ही प्रतिरूप है, जो सरल, सात्त्विक, अकृत्रिम व मानवीय मूल्यों को समर्पित है। मित्र, हमदर्द, सलाहकार, सहभागी और सहयात्री—विष्णु प्रभाकर अनेक रूपों में अपने कथा-पात्रों के साथ जीते हैं। यही जीना उनकी रचनाओं को रोचक बना देता है।"

Book Details

  • ISBN
    9789351862925
  • Pages
    184
  • Avg Reading Time
    6 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

Recommended For You

Customer Reviews

Be the first to write a review...

(0)

0 out of 5

Book

Vishnu Prabhakar Ki Lokpriya Kahaniyan gathers stories written across seven decades, from 1931, when the author was nineteen and published 'Diwali Ki Raat' in Lahore's Milap newspaper, to 2007, the twilight of his career. What makes this collection singular is Prabhakar's refusal to let ideology harden into slogans. He writes about the persecuted—those crushed by inhuman social conditions—yet always engaged in a quiet, unrelenting struggle for freedom. His subject matter spans love, family relationships, superstition, and human sensitivity, but the treatment is never abstract. Each story grounds itself in the psyche of individuals navigating both inner turbulence and outer injustice. Prabhakar's prose does not shout; it observes with surgical patience the complex machinery of the human mind and the social forces that seek to suppress it. For readers seeking socially conscious Hindi fiction that honours character over rhetoric, this anthology offers a master class in compassionate realism.

Vishnu Prabhakar Ki Lokpriya Kahaniyan का संग्रह पढ़ने का अनुभव कैसा होगा?

यह संग्रह आपको शांत लेकिन गहरी बेचैनी का अनुभव देगा। विष्णु प्रभाकर के पात्र नारे नहीं लगाते, बल्कि अपनी पीड़ा और संघर्ष को जीते हैं। हर कहानी आपको मानवीय संवेदना की जटिल परतों में ले जाती है—प्रेम, पारिवारिक रिश्ते, सामाजिक अन्याय, और मुक्ति की चाहत। पढ़ते समय आप किसी उपदेश की आशा न रखें, बल्कि एक धीमी और सूक्ष्म अवलोकन यात्रा की अपेक्षा करें जो आपकी सोच को हिलाती है, चीखती नहीं।

Vishnu Prabhakar Ki Lokpriya Kahaniyan पुस्तक किस तरह के पाठकों के लिए सबसे उपयुक्त है?

  • सामाजिक यथार्थवाद में रुचि रखने वाले पाठक जो नारों के बजाय मानवीय जटिलता को समझना चाहते हैं।
  • जो 1931 से 2007 तक के भारतीय समाज के बदलावों को साहित्य में देखना चाहते हैं।
  • जो लेखक की करुणा और धैर्यपूर्ण दृष्टि की कद्र कर सकें, जल्दबाज़ी में कथानक नहीं चाहते।

इस पुस्तक की विषयवस्तु आज के भारतीय पाठकों के लिए क्यों प्रासंगिक है?

आज भी भारत में सामाजिक असमानता, अंधविश्वास, और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संघर्ष जारी है। विष्णु प्रभाकर की कहानियाँ उन लोगों की आवाज़ हैं जिन्हें दबाया जा रहा है, लेकिन जो मुक्ति संग्राम में लगे रहते हैं। यह संग्रह दिखाता है कि समाज कितना भी बदल जाए, मानवीय संवेदना और न्याय की तलाश हमेशा समकालीन रहती है।

विष्णु प्रभाकर का इन विषयों पर लेखन अन्य लेखकों से किस तरह अलग है?

विष्णु प्रभाकर विचार को नारों में नहीं बदलते—यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता है। वे मनुष्य मन की जटिल व्यवस्था को ध्यान से खोलते हैं, बिना किसी राजनीतिक शोरगुल के। उनकी कथाएँ उस व्यक्ति की चिंता करती हैं जो पीड़ित है पर हार नहीं मानता। यह संयम और गहराई उन्हें अपने समकालीनों से अलग खड़ा करती है।

Vishnu Prabhakar Ki Lokpriya Kahaniyan पुस्तक पढ़कर मेरे मन में क्या बचेगा?

  • मानवीय गरिमा की गहरी समझ और यह एहसास कि संघर्ष हमेशा व्यक्तिगत भी होता है, और सामूहिक भी।
  • सामाजिक अन्याय के प्रति एक शांत लेकिन दृढ़ संवेदनशीलता।
  • यह विश्वास कि साहित्य चीखने के बजाय सोचने को प्रेरित कर सकता है।

View on Rachnaye →

Hurry! Limited-Time Coupon Code

WORDPOWER
* Terms and Conditions applied.

Offers

Best Deal

Lorem ipsum dolor sit amet, consectetur adipiscing elit, sed do eiusmod tempor incididunt ut labore et dolore magna aliqua

Lorem ipsum dolor sit amet, consectetur adipiscing elit, sed do eiusmod tempor incididunt ut labore et dolore magna aliqua. Ut enim ad minim veniam, quis nostrud exercitation ullamco laboris nisi ut aliquip ex ea commodo consequat.

whatsapp