ग़ज़ल के शास्त्रीय सरोकार
*रमेशराज
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श्री यादराम शर्मा हिन्दी में ग़ज़ल के चर्चित हस्ताक्षर हैं। उनका ‘कहकहों में सिसकियां’ नाम से ग़ज़ल संग्रह भी प्रकाशित हुआ है। वे अपने इस संकलन में ‘जैसा मैंने पढ़ा’ भूमिका के अन्तर्गत ग़ज़ल के शिल्प पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि-‘‘ग़ज़ल की बहर पर विशेष ध्यान दिया जाये। इसके अतिरिक्त अन्य बिन्दुओं पर भी ध्यान देना जरूरी है-जैसे मतला, मक्ता, शे’र, रदीफ एवं काफिया।’’ रदीफ और काफियों को वे ग़ज़ल की प्राणवायु बताते हुए कहते हैं-‘‘यह जानना आवश्यक होता है कि रदीफ पूरी ग़ज़ल में एक ही रहता है। काफिया, तुकान्त का प्रतीक होता है, यह स्वरांत भी हो सकता है जैसे ‘हवा’ के साथ ‘लगा’ और ‘हुआ’ या ‘गयी’ के साथ ‘सदी’, ‘सगी’ और ‘सभी’ आदि।
श्री यादराम शर्मा की कही हुई बात को ही यदि थोड़ा-सा विस्तार दें तो अगर रदीफ पूरी ग़ज़ल में बदलता नहीं है तो काफिये का समान स्वर में आये बदलाव के आधार पर ही निर्धारण या निर्वाह करते हैं। ‘अ’ की तुक ‘आ’ या ‘इ’ की तुक ‘ओ’ या ‘ई’ से किसी भी प्रकार नहीं मिला सकते। काफिया तभी काफिया है, जबकि वह समान स्वर के आधार पर निरंतर बदलाव का संकेत दे। ग़ज़ल के मतला शे’र से ही यह निर्धारित किया जाता है कि स्वर के बदलाव का आधार किस स्थान पर या किस प्रकार किया जाये। मतला में यदि ‘नदी’ की तुक ‘सदी’ से मिलायी गयी है तो ‘दी’ दोनों में समान होने के कारण ‘न’ और ‘स’ बदलाव के आधार बनेंगे, अतः आगे की तुक ‘बदी’ या ‘लदी’ आदि ही हो सकती हैं। इन तुकों के स्थान पर अगर कोई ग़ज़लकार ‘सभी’, ‘रखी’, ‘बची’ आदि तुकों का प्रयोग करता है तो हर प्रकार अशुद्ध हैं। यदि मतला ‘सदी’ की तुक ‘सभी’ से मिलाकर कहा गया है तो ग़ज़ल के आगे के शे’रों के क़ाफिये ‘बची’, ‘बानगी’ ‘रोशनी’, ‘जी’, ‘चली’ आदि के साथ हर प्रकार शुद्ध होंगे। लेकिन इसमें ध्यान देने की बात यह है कि मतला में आयी ‘सदी’ और ‘सभी’ तुकें आगे के शे’रों में ‘सभी’, सदी, ‘नदी’ ‘कभी’ आदि के रूप में नहीं आ सकतीं, वर्ना स्वर बदलने के आधार ही खत्म हो जायेंगे। अतः एक तुक का एक बार निर्वाह करने के बाद उसी तुक का दूसरी बार प्रयोग में लाना भी त्रुटिपूर्ण है। संयुक्त रदीफ-काफियों की ग़ज़ल के अन्तर्गत यदि मतला में ‘कहां’ की तुक ‘जहां’ है तो ‘धुआं’, ‘निशां’, ‘बयां’ आदि तुकें आगे के शे’रों में किसी प्रकार सम्भव नहीं। ऐसी ग़ज़ल में सिर्फ ‘हां’ को तुक के रूप में प्रयोग करना, इस बात का संकेत है कि कवि ने इस ग़ज़ल से रदीफ़ को ही ग़ायब कर डाला है। ऐसी रचना ग़ज़ल नहीं कही जा सकती।
*रमेशराज
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