यमकदार तेवरी
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प्यार का *जलसा* गया, *जल-सा* गया
छाँव भी शीतल नहीं, नित ताप दे चन्दन यहाँ।
*पीर ही* नित *पी रही* अब जिन्दगी
प्रीति के-सदरीति के सब जल गये मधुवन यहाँ।
आरजू-जिन्दादिली, जिन्दा दली
आज है सिसकन यहाँ सुबकन यहाँ, उलझन यहाँ।
क्या करें आँखों-तले तम-सा घिरा
थामते *सर जन* यहाँ, मिलता नहीं *सर्जन* यहाँ।
क्या खिलेंगी *बेकली* में *वे कली*
जब सिसकती-सी मिले हर फूल में चटकन यहाँ।
+रमेशराज की तेवरी
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